जब तक आप ‘उनके’ मानकों का पालन कर रहे हैं, तब तक देश पर शासन ‘उन्हीं’ का है

भारत का समाज

आज देश के 80% भूभाग पर भगवा सरकारें हैं… फिर भी मोदी सरकार इतनी कमजोर और लाचार क्यों नज़र आ रही है?

मोदी सरकार की सबसे बड़ी मजबूरी क्या है?

लोग हज़ार मजबूरियाँ गिनाते हैं… 80% जनता भ्रष्ट है इसलिए मोदी लाचार हैं…

70 साल का कांग्रेसी सिस्टम है इसलिए मोदी लाचार हैं…

लोग जात-पाँत में बंटे हैं इसलिए मोदी लाचार हैं…

ये सारी गिनती सही है… पर ये चुनौतियाँ हैं, लाचारी नहीं है. ये सारी बातें थीं, फिर लोगों ने कांग्रेस को हटा कर मोदी को चुन तो दिया… वह भी जबरदस्त बहुमत से… फिर मोदी की लाचारी क्या है?

यह बहुत ही मूलभूत और अंदरूनी लाचारी है… और यह हममें से ज्यादातर की लाचारी है… और वह है पॉलिटिकल करेक्टनेस.

मोदी की सबसे बड़ी मानसिक मजबूरी है कि वे सचमुच और हृदय से उन्हीं सिद्धांतो और आदर्शों पर विश्वास करते हैं जिन्हें हमारे शत्रुओं ने स्थापित कर रखा है…

वे बेईमान जजों को नहीं बदल सकते क्योंकि उनकी नज़र में न्यायपालिका का सम्मान महत्वपूर्ण है…

वे मीडिया के ज़हर उगलने पर लगाम नहीं लगा सकते क्योंकि मीडिया की स्वतंत्रता लोकतंत्र का मूलभूत सिद्धांत है…

वे अल्पसंख्यकों को कुछ नहीं कर सकते क्योंकि संविधान भारत को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित करता है… और संविधान तो मोदीजी का एकमात्र धर्मग्रंथ है यह तो वे पचहत्तर दफा कह चुके हैं…

और तो और… विश्वविद्यालय परिसर में भारत तोड़ो के नारे लगाने वालों को भी पुलिस घुस के नहीं तोड़ सकती… क्योंकि वह विश्वविद्यालय परिसर है… पवित्र विद्या का मंदिर है….

कौन सी बात पॉलिटिकली करेक्ट है यह कौन तय करता है? संविधान की मर्यादा राष्ट्रहित से बड़ी कैसे हो जाती है?

मीडिया की स्वतंत्रता को राष्ट्र की स्वतंत्रता से बड़ा किसने घोषित किया है? चोरों की जमात यह न्यायपालिका कैसे पवित्र है?

ये मानक किसने स्थापित किये हैं और आप इन्हें क्यों सब्सक्राइब कर रहे हैं…

क्यों एक पाकिस्तानी औरत के एक ट्वीट पर पिघल कर सुषमा स्वराज एक पाकिस्तानी को भारत में लिवर ट्रांसप्लांट कराने के लिए वीज़ा दिलवाती हैं?

क्यों मोदीजी एक ईसाई पादरी को काबुल से छुड़वा कर फूले नहीं समाते और ट्वीट पर ट्वीट करते जाते हैं? उसमें क्या राष्ट्रहित छुपा था? या उदारता और मानवता की इन महान कसौटियों पर खरा सिद्ध होने की आतुरता भर है?

जब तक आप इन मानकों को सब्सक्राइब करते हैं तब तक देश पर शासन उन्हीं का है जिन्होंने ये मानक स्थापित किये हैं. शासन और सत्ता उसी के पास है जिनके पास इन मानकों को स्थापित करने की शक्ति है.

बाकी तो प्रधानमंत्री का पद एक कुर्सी भर है… उस पर बैठे आदमी का नाम क्या है, और उसने भगवा पगड़ी बांधी है या हरी टोपी पहनी है… क्या फर्क पड़ता है?

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