बतंगड़ मत बनाइये, भारत ने इज़रायल नहीं ट्रम्प के विरुद्ध किया है वोट

बेवजह किसी बात का बतंगड़ मत बनाइये. भारत ने इज़रायल के विरुद्ध नहीं डॉनल्ड ट्रम्प के विरुद्ध वोट किया है.

यरुशलम को इज़रायल की राजधानी के रूप में मान्यता देने के पीछे अमरीका के निहित स्वार्थ हैं.

अमरीका यह जानता है कि संयुक्त राष्ट्र में सर्वसम्मति से यरुशलम को इज़रायल की राजधानी स्वीकार नहीं किया जायेगा.

ट्रम्प के आने के पश्चात इज़रायल-अमरीका के मध्य सामरिक सम्बंध और प्रगाढ़ हुए हैं.

इसीलिए दिखावा करने के लिए ट्रम्प ने यरुशलम को इज़रायल की राजधानी के रूप में मान्यता देने हेतु प्रस्ताव किया.

अब जब 100 से अधिक देश ट्रम्प के साथ नहीं हैं तो भारत क्यों उसमें अपनी टांग घुसाये? भारत अपने हित देखेगा कि अमरीका के स्वार्थ देखेगा?

भारत को अपनी ऊर्जा की जरूरतें देखनी हैं. गाड़ी में डालने के लिए तेल अमरीका नहीं देगा. वह तो अरब से ही मिलने वाला है.

इसके अतिरिक्त सितम्बर में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भारत का पक्ष स्पष्ट किया था –

In her intervention at the non-aligned movement’s ministerial meeting on Palestine on the sidelines of the UN General Assembly in September, External Affairs Minister Sushma Swaraj had said the path to Israel-Jerusalem peace clearly lay in an early negotiated solution between Israel and Palestine based on mutual recognition and security arrangements. (स्रोत: इंटरनेट)

अर्थात् इज़रायल और फलस्तीन यरुशलम का मसला स्वयं सुलझा सकते हैं. इसमें भारत क्या करेगा?

कल को हम कश्मीर मुद्दे पर स्वयं बिना कोई समाधान निकाले संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव रखें कि पाक अधिकृत कश्मीर हमारा है और उसे पाकिस्तान से मुक्त कराने के लिए वैश्विक समुदाय सैन्य सहायता प्रदान करे, तो क्या सभी देश अपनी सेना भेज देंगे?

किसी भी देश को अपने आंतरिक मसले सुलझाने के लिए पहले स्वयं कोई रास्ता खोजना पड़ता है फिर उसे संयुक्त राष्ट्र में रखा जाता है. उस प्रस्ताव पर विचार कर वोटिंग की प्रक्रिया होती है.

अमरीका जैसे देश का कोई भरोसा नहीं. आज अमरीका यरुशलम को इज़रायल की राजधानी की मान्यता दे रहा है कल को PoK को पाकिस्तान का अंग बता देगा. क्या यह भी हम मान लेंगे?

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