फिसलती हुई ज़ुबानवाला हास्यास्पद नहीं, निडर और ज़िम्मेदार शासक चाहती हैं जनता

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजे दिमाग को मथने वाले रहे.

एक कलमकार होने के नाते मैं न तो बीजेपी, न कांग्रेस, न किसी और पार्टी, किसी की भी पक्षधर नहीं हूँ. मैं सिर्फ देशहित में काम करने वाले नेता और पार्टी की पक्षधर हूँ.

यदि विश्लेषण करूँ तो मेरे अनुसार कांग्रेस की हार के कई कारण रहे.

जनता शक्तिशाली और जिम्मेदार शासक चाहती है जो निडर हो दबंग फैसले ले सकता हो.

फिसलती हुई जुबान वाला शासक कतई स्वीकार्य नहीं है न ही अपरिपक्व. हास्यास्पद बयानबाजी, और कई अर्थ निकलने वाली बात भी सुनने वाले को कन्फ्यूज कर देती है.

मोदी की बेदाग ईमानदार छवि बीजेपी को ऊँचाइयाँ देती जा रही है और कांग्रेस का भ्रष्टाचार फैलाने वाली पार्टी का टेग उसे ले डूबेगा.

मुखिया हमेशा ताकतवर को ही चुना जाता है. राहुल कहीं भी ताकतवर दिखाई नहीं दिये बल्कि हास्यास्पद से दिखे. मुखिया बनने वाले उम्मीदवार को बोलते समय बेहद सतर्क, सावधान और पूरी तरह तैयारी के साथ होना बहुत जरूरी होता है.

..पार्टी के मुख्य चेहरे का असरदार बात असरकारक तरीके से कहना बेहद महत्वपूर्ण व आवश्यक है अन्यथा दूसरी पार्टियों के ही नहीं बल्कि अपनी पार्टी में भी मतभेद हो जाते हैं.

झूठी आक्रामकता और सच्ची आक्रामकता का फर्क भी जनता समझने लगी है क्योंकि ग्रामीण जनता भी अब पहले जैसी ग्रामीण कहाँ रही है.

राजनीति की सफलता, किसी भी पार्टी की छवि, किसी भी सुविधा का सदुपयोग, ये सब कुशल और उत्कृष्ट प्रबंधन के अन्तर्गत आता है , बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का उत्कृष्ट कुशल प्रबंधन बीजेपी की और मोदी जी की असली ताकत है. कांग्रेस के पास न तो कुशल मुखिया है, न कुशल प्रबंधक और उसका ख़ामियाजा पार्टी और स्वयं राहुल भुगत रहे हैं.

डोकलाम विवाद के समय , कश्मीर मामले में प्रधानमंत्री ने जिस कुशलता, निडरता और दबंगाई से भारत का रुख पेश किया वो काबिले तारीफ़ है. हिंदुस्तान ही नहीं विदेशों ने भी उसकी तारीफ की, यहाँ तक कि स्वयं चीन में भी उनकी सराहना की गई. मोदी जी साफ़ हैं, स्पष्ट हैं, जमीन से जुड़े हुये हैं, संघर्ष किया है, देखा है घर में, जीवन में, इसलिये आम लोगों की जिंदगी को आसानी से समझ सकते हैं उनके दुःख दर्द को पहचान सकते हैं. कांग्रेस के मुख्य चेहरे के पास न वो अनुभव है न वो महसूस कर पाने की योग्यता , और यदि महसूस कर भी सके तो जताने की योग्यता नहीं है.आमजन के दिलों तक पहुंच है मोदी की. बीजेपी की सफ़लता में उनकी उच्चस्तरीय कूटनीति और दूरदर्शिता का बहुत योगदान रहा.

इस टेक्निकल युग में बहुत सोच समझकर बयान देना होगा. मंच पर सार्वजनिक स्थलों पर आपका व्यवहार बहुत ही संयमित होना जरूरी है क्योंकि छोटी- छोटी ग़लतियाँ यू ट्यूब पर मौजूद होती हैं और दोहराई जायें तो एक उच्च शिक्षित युवा को ‘पप्पू’ घोषित कर देती हैं.

ग़लत बयानबाजी बहुत बड़ा कारण रही मोदी जी की माँ के लिये ग़लत टिप्पणी, मोदी जी को चायवाला कहकर देश और विदेश में सम्बोधित करना, फिसली हुई जुबानें, लोकसभा में राहुल गाँधी द्वारा स्पीकर को स्पीकर मैडम कहना, बार बार ग़लत बोलकर क्षमा याचना करना और स्वीकार करना कि हाँ मुझसे ग़लतियाँ होती हैं …ऐसे व्यक्ति को देश का प्रधान या प्रतिनिधि कैसे चुन सकेगा कोई ? कई कांग्रेसी नेता तो बयान में कह भी चुके हैं कि कांग्रेस के पास मोदी जैसा नेतृत्व नहीं है.

सदनीयत की ख़िलाफ़त करना भी बहुत बड़ी वजह रही कांग्रेस का कद कम करने में ..आप सदनीयत हैं या नहीं ये इतना मायने नहीं रखता जितना मायने रखता है अच्छी नीयत वाले का पक्ष लेना ..जब मोदी देशहित में फैसला लेंगे तो ये ख़िलाफ़त करेंगे, सेना कोई कार्यवाही करेगी तो ख़िलाफ़त करेंगे ..

भाषण के समय हजारों लोगों के सामने अपरिपक्व वक्तव्य दिये , आलू की फैक्ट्री ??? ऐसी मशीन जिसमें आलू डालेंगे उधर से सोना निकलेगा …ये प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का वक्तव्य होना चाहिये ?? जीतने का प्रयास कम किया गया और सामने वाले को नीचा दिखाने का प्रयास ज्यादा. देश के प्रधान को चायवाला ..फेंकू..ख़ालिस हिन्दुवादी कहकर सम्बोधित करना उसे नीचा दिखाने की कोशिश करना, स्वयं अपना कद खतरे में डालना है.

जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों द्वारा गैरजिम्मेदाराना बयान दिये गये उपराष्ट्रपति के पद पर आसीन रहे व्यक्ति कहते हैं देश में डर लगता है, मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान में जाकर अपने देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ़ ज़हर उगलते हैं, कांग्रेसी नेता नीच सम्बोधन से सम्बोधित करते हैं, जिसकी निडरता पूरा विश्व स्वीकार कर रहा है उसे मौत का सौदागर कहकर पुकार रहे हैं.

देशहित की भावना कम और पार्टी भावना ज्यादा दिखाई दी. देश हित की बात से ज्यादा जुगत सी दिखाई दी कि बस कांग्रेस को जीत मिल जाये.

जिस नेता की छवि अपरिपक्व की है उसे चेहरा बनाना भारी ग़लती है. राहुल की जगह प्रियंका को यदि कांग्रेस की कमान सौंपी जाये तो निश्चित ही अच्छे परिणाम मिलेंगे और देश को भी और विकल्प की जरूरत है नेताओं के रूप में.

ग़लत लोगों को साथ लेने का आत्मघाती कार्य किया गया. आंदोलनकारी ( हार्दिक ) की असलियत जांचने में भूल की. पहले अखिलेश के साथ मिलकर पार्टी को झटका दिया अब हार्दिक अल्पेश के साथ. पहले अच्छी तरह जांच लेना चाहिये था कि असलियत क्या है …राजनीति में एक भूल पूरा करियर खराब कर देती है क्योंकि वोट छवि को मिलता है ‘छवि खराब, वोट खत्म.’

सामने वाले को भी तौलने में भूल की और ख़ुद की क्षमता को भी ठीक-ठीक नाप नहीं पाये और उसी का परिणाम रहे नतीजे.

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