कविता : सभ्य भाषा में दी गयी सबसे गंदी गाली, सबसे गंदी भाषा में की गयी सबसे सभ्य बात

कविता,
भूखे के मुंह से निकाला गया पहला निवाला
भरे पेट के मुंह में ठूंसा जा रहा अंतिम कौर
अंतिम बात कहने की शुरुआत
शुरू होते ही ख़त्म हो जाने की हौड़

कविता,
कायरता और निष्क्रियता को
अकर्म के लबादे से ढंककर
वाहवाही बटोरना
पिछले जन्मों के कर्मों को
भाग्य का लिखा कहकर
चक्करघन्नी की तरह
जन्म मरण में घुमते रहना

कविता
ज्ञात बातों को ज्ञान का मुखौटा पहनाकर
आधुनिक कवि होने का गौरव प्राप्त करना
अज्ञात में कूदने के भय को
शब्दों से अलंकृत कर
अज्ञान से नज़रें चुराना

कविता,
सभ्य भाषा में दी गयी सबसे गंदी गाली
सबसे गंदी भाषा में की गयी सबसे सभ्य बात
भाषा की मजबूरी से निकला अर्थ
अर्थ को अनर्थ पर धकेलती बातें व्यर्थ

कविता कुछ नहीं
एक विरोधाभास है
जब कहने को कुछ ना हो
और मौन मुखर हो
तो जिबरिश करती भावनाएं
कवि की कलम पर बैठ
उसे अपनी ऊंगलियों पर नचाती है

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