भारतीय न्याय व्यवस्था में जज लाचार है, सबूतों गवाहों के सामने बेबस

90 के दशक में वाराणसी के पास पकड़ी नामक गाँव मे एक जघन्य सामूहिक हत्याकांड हुआ था जिसमें एक स्थानीय माफिया ने AK47 से अंधाधुंध फायरिंग कर 6 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था.

उस केस में फैसला सुनाते हुए जज ने कहा था कि हालांकि मैं पूरी तरह जानता हूँ कि ये हत्याएं इन्ही अभियुक्तों ने की हैं पर इसके बावजूद मैं इन्हें बरी करने के लिए मजबूर हूँ क्योंकि इनके खिलाफ गवाही देने की हिम्मत किसी ने नहीं की…

ये फैसला हमारी न्याय प्रणाली की बेचारगी और लाचारी बयान करता है.

हमारी न्याय प्रणाली का मूल भूत सिद्धांत है कि ‘बेशक़ 100 दोषी छूट जाएं पर एक बेगुनाह को सज़ा नही होनी चाहिए’.

जब न्याय का मूलभूत सिद्धांत ही ये है तो दोषियों के सबूतों के अभाव में छूट जाने पर आश्चर्य कैसा???

सुहेब इलियासी ने अपनी पत्नी की हत्या की और निचली अदालत से ही फैसला आने में 17 साल लग गए? अभी तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट बाकी है.

पकड़ी कांड में जज के लाचारी भरे फैसले पर देश मे एक बहस छिड़ी थी… भारत की न्याय व्यवस्था में दोष सिद्धि का सारा भार अभियोजन पक्ष और सबूतों के आधार पर है… इसमें जज या Jury के स्वविवेक के लिए कोई स्थान नहीं है.

उधर अमेरिका में जज स्वविवेक से फैसला देता है. वो तमाम सबूतों, गवाहों और कानून को दरकिनार कर स्वविवेक से न्याय / निर्णय करने के लिए स्वतंत्र है…

भारतीय न्याय व्यवस्था में जज लाचार है… सबूतों गवाहों के सामने बेबस…

2014 में मोदी प्रधानमंत्री बने तो उनसे आशा थी कि वो देश मे आमूल चूल सुधार (Reforms) करेंगे. उन्होंने बहुत से पुराने पड़ चुके कानूनों को बदला भी है पर अभी तक न्यायपालिका पर हाथ नहीं डाल पाए हैं.

देखते हैं कि देश मे न्यायिक सुधार (Judicial Reforms) की प्रक्रिया कब शुरू होती है.

हत्या के मुकदमे में वो दिन कब आएगा जब मुकदमा शुरू होने के 15 दिन में फैसला आ जायेगा जैसा कि अमेरिका में होता है…

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