आखिर हमारे ‘युवा’ नेताओं की भारत के बारे में क्या महत्वाकांक्षा है?

कुछ समय से मीडिया युवा नेताओं कन्हैया कुमार, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी, अल्पेश ठाकोर इत्यादि को प्रमोट करता आ रहा है.

कुछ तो चुनाव भी जीत गए है. भारत के टुकड़े करने की परिकल्पना करने वाले देशद्रोहियों को छोड़कर अन्य युवा नेताओं को मेरी शुभकामनाएं.

लेकिन प्रश्न यह उठता है कि इन नेताओं की सोच क्या है? उनका हमारे राष्ट्र के बारे में क्या विज़न है? क्या उनके विचार भारत के बहुसंख्यक लोगो को प्रेरित करते हैं?

क्या उन्होंने ऐसा कोई उच्च विचार प्रस्तुत किया जो सभी भारतीयों की भलाई और प्रगति के बारे में हो?

क्या वे सभी समुदाय और महिलाओं को प्रेरित कर सकने की क्षमता रखते हैं? ऐसी क्या बात है कि उनके विचार आज के युवाओं और युवतियों की आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा को संबोधित नहीं करते?

मैं यह क्लेम तो कर ही सकता हूँ कि मैं फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल माक्रों (Emmanuel Macron) के साथ पढ़ा हूँ और उनकी जीवन-यात्रा को नज़दीक से देखा है. क्या बात थी कि 39 वर्ष की आयु में उन्हें फ्रांस की बहुसंख्यक जनता ने राष्ट्रपति चुन लिया (फ्रांस का राष्ट्रपति जनता चुनती है)?

क्या विज़न था उनका? ऐसा क्या प्रोग्राम था उनका कि शहरी जनता, किसान, फैक्ट्री वर्कर, छात्र, महिलाएं, सभी के वोट उन्हें मिल गए, एवं अनुभवी अधेड़ और प्रौढ़ नेतागणो को उन्होंने पछाड़ दिया?

कैंडिडेट माक्रों ने फ्रांस के सभी युवाओ को यह बतलाया कि उन्हें बेरोजगारी क्यों झेलनी पड़ रही है?

माक्रों के अनुसार, अगर कोई प्राइवेट कंपनी किसी युवा को जॉब देती है, तो फ्रांस के नियमानुसार उस कर्मचारी को जॉब से नहीं निकाला जा सकता, भले ही कंपनी को घाटा हो रहा हो, या कंपनी के उत्पाद की लागत अन्य प्रतियोगियों से महँगी हो.

माक्रों ने समझाया कि कैसे यह नियम नयी कंपनी और उद्यमों को फ्रांस में आने से रोकता है, कैसे यह नए लोगो को जॉब देने में असहायक सिद्ध होता है क्योंकि कंपनियों को डर लगता है कि वे किसी भी कर्मचारी को नहीं निकाल पाएंगे भले ही कंपनी दिवालिया हो जाए.

उन्होंने कहा कि अगर वह राष्ट्रपति बन गए तो वह नौकरी पर रखने और निकालने के नियम में ढील दे देंगे.

ध्यान दीजिये – माक्रों क्या कह रहे है? यह सिर्फ एक उदाहरण है. ऐसी बहुत सी बातें है जिसमे माक्रों ने सभी फ्रेंच नागरिको को कठिन निर्णयों के लिए आगाह किया और फ्रांस को आतंकी हमले से सुरक्षित करने का विश्वास दिलाया.

इसके विपरीत, हमारे युवा नेता सिर्फ और सिर्फ जातिवाद और आरक्षण की बात कर रहे है. उनका पूरा प्लेटफार्म ही इस बात का है कैसे ‘उनकी’ जाति वालों को आरक्षण मिल सके, कैसे सेकुलरिज्म के स्लोगन पर भारत के बहुसंख्यक समाज का मज़ाक उड़ा सकें, कैसे किसी एक समुदाय की तुष्टि कर सकें.

दूसरे शब्दों में, उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि वे भारत के सभी – सभी – युवाओं को कैसे रोजगार उपलब्ध कराएँगे, उसके लिए क्या कठिन निर्णय करने होंगे, कैसे प्रदूषण कम करेंगे और साथ ही उद्योगों का विकास करेंगे? कैसे किसानों को उनके उत्पाद का अधिक मूल्य देंगे, साथ ही उपभोक्ताओं को सस्ता अन्न उपलब्ध कराएँगे?

कैसे स्वच्छ और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देंगे? कैसे सड़कें बनवाएंगे, रेलवे का विकास करेंगे, मेधा पटकर के विरोध के बावजूद सिंचाई की व्यवस्था करेंगे, और विदेशी धन पर पलने वाले एनजीओ से मुकाबला करेंगे जो भारत के विकास में आकाओं के इशारों पर बाधा डाल रहे हैं?

आरक्षण को उनके ही अभिजात वर्ग ने कब्ज़िया लिया है. एक ही खानदान की चौथी पीढ़ी आरक्षण का मज़ा ले रही है. इसमें संशोधन की आवश्यकता है, जिससे उन्ही शूद्र और पिछड़े वर्ग के वंचित लोगो को आरक्षण का लाभ पहली बार मिले. इसके बारे में उनके क्या विचार हैं?

कैसे सीमा पार से आने वाले आतंकवाद का मुकाबला करेंगे? कैसे जम्मू और कश्मीर, आतंकवाद, नक्सलवाद से निपटेंगे? कैसे पड़ोस के फर्जी ‘साम्यवादी’ देश के खतरे से मुकाबला करेंगे?

अंत में, कैसे इस बात को सुनिश्चित करेंगे कि राजनीति से वंशवाद को दूर किया जा सके?

क्या उन युवा नेताओं के पास कोई बोल्ड विचार है, जिससे वे सभी भारतीयों के विचारो को प्रभावित कर सके?

मुझे राष्ट्र के विकास के बारे में, उन्नति के बारे में, सभी भारतीयों की प्रगति के बारे में उनके विचार जानने की उत्सुकता है.

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