कृतघ्नता का रोना रोएँगे तो रोना ही नसीब होगा

आज एक पोस्ट घूम रही है फेसबुक और WhatsApp पर कि 22 वर्षों तक मोदी जी और भाजपा ने गुजरात को क्या क्या दिया है. बहुत कुछ है, आप ने भी वह पोस्ट सुबह से कई बार पढ़ी ही होगी, रिपीट नहीं करूंगा.

उस पोस्ट पर मेरा कमेन्ट इतना ही था – जहां बच्चे माँ बाप का उपकार नहीं मानते, झल्लाकर कहते हैं कि पैदा किया तो परवरिश भी करनी ही पड़ेगी, उसमें कौन सा बड़ा उपकार किया – वहाँ नेता मतदाताओं से कृतज्ञता की अपेक्षा न करें, यही व्यावहारिक होगा.

यह सही है या गलत है इस पर जुगाली से क्या फायदा, जो है सो वास्तविकता सामने है. और यही रहेगा भी. जहां भी चुनाव होंगे, यही वास्तव सामने आयेगा. कल खिलाया हुआ खाना फ्लश हो गया, आज भूख लगी है तो उस खाने की याद से पेट नहीं भर सकता.

इसी वास्तविकता से समाज के सभी घटक भी एडजस्ट कर लें तो पीड़ा कम होगी, खास कर के उनको जो सोचते हैं कि समाज को उनके पूर्वजों का एहसान मानकर इनको सम्मान देते रहना चाहिए. सम्मान हर व्यक्ति को अपना अपना कमाना चाहिए.

पूर्वजों के नाम पर अगर सम्मान किसी का हक़ होता तो राहुल गांधी की पहचान पप्पू न बन जाती. मुग़लों का साम्राज्य था, आज उनके वंशजों की बदहाली यहाँ वहाँ पढ़ने देखने मिलती है.

वंशजों के लिए अभिमान के पात्र बनना, समाज के लिए भी श्रेयस्कर साबित होगा. पूर्वज तो रहते नहीं हम पर गर्व करने को, लेकिन हम अपने वंशजों के लिए कुछ बेंचमार्क सेट कर सकते हैं कि वे कहें कि उन्हें इससे भी अधिक करना है. समय बदला है, कर्तृत्व के परिमाण भी बदलेंगे.

इस विषय पर कुछ अरसा पहले उदाहरण सहित एक पोस्ट लिखी थी, आज फिर यहाँ दे रहा हूँ.

नाम विरासत में मिलता है मगर इज्जत खुद ही कमानी होती है

इन चारों तस्वीरों को देखिये, उनके नाम देखिये. खुले मन के लोगों के लिए बड़ी सीख है इन चार तस्वीरों में, आइये देखते हैं.

Easy Eddie के नाम से जाने जाते Edward O’Hare, शिकागो के कुख्यात माफिया सरगना Al Capone के वकील थे. कपोन के लिए रेस का कारोबार ‘संभालते’ थे. बाद में उन्होने शराफत की जिंदगी जीनी चाही और कपोन के कारोबार की जानकारी पुलिस को दी. कपोन को जेल हुई, लेकिन उनके जेल से निकालने के पहले Easy Eddie की हत्या हुई.

उनका एक पुत्र था, Butch O’Hare. फायटर पायलट बना. WW II में एयरक्राफ्ट कैरियर USS Lexington की रक्षा के लिए इनके साथ और पाँच फायटर विमानों की ड्यूटी लग गई.

ये सेक्शन लीडर थे. गंतव्य की ओर अग्रसर थे कि देखा 9 जापानी bomber विमान “लेक्जिंग्टन’ पर हमला करने आ रहे हैं. अपने साथियों को सावधान करने देखते है तो देखा कि कि केवल वे और उनका विंग मैन दूसरे विमान में आगे निकल आए हैं, बाकी चार बहुत पीछे छूट गए हैं. उतने में विंग मैन ने बताया कि उसकी गन जाम हो गई है, वो नाकाम है.

Butch O’Hare ने निमिषार्ध में निर्णय ले लिया और अकेले ही उन 9 विमानों पर टूट पड़े. पाँच को मार गिराया और छठे को क्षति पहुंचाई. तब तक उनके साथी आ पहुंचे. लेक्जिंग्टन पर एक भी बॉम्ब नहीं गिर पाया.

Butch O’Hare को मेडल तो मिलना ही था. उसके बाद 1943 में दूसरे एक मुहिम में अपने ही एक विमान द्वारा किए गए फायरिंग में मारे गए.

देश ने उनका सम्मान किया. उनके शहर शिकागो के एयरपोर्ट को Butch O’Hare का नाम दिया गया. विश्व का एक बहुत व्यस्त एयरपोर्ट है, कई कथा -उपन्यासों में O’Hare Airport का उल्लेख आता है.

पिता की अपकीर्ति, बेटे के सम्मान के कहीं भी आड़े न आई.

दूसरा उदाहरण जयवंतराव तिलक का है. लोकमान्य तिलक के पौत्र थे. विद्वान थे, सभ्य चारित्र्य के भी थे. लोकमान्य द्वारा स्थापित ‘केसरी‘ के संपादक थे. कॉंग्रेस के नेता थे. कहने को तो लोकमान्य भी कॉंग्रेस के ही नेता थे लेकिन वो कॉंग्रेस से तुलना कैसी?

लोकमान्य का ‘केसरी’ दहाड़ता था. जयवंतराव के समय इन्दिरा कॉंग्रेस की सत्ता थी, उन्होने इमरजेंसी का समर्थन किया. लोगों ने अखबार बदला, “केसरी (सिंह) को काँग्रेस का कुत्ता बनाया आप ने” यह सुना दिया. बहुत अपमानित हुए. दादा लोकमान्य का नाम उन्हें बचा न पाया, अरे, बल्कि उसी नाम को कलंकित करने का दूषण मिला. “तिलक” माथे का दाग बन गया इनके लिए.

और इसका कारण एक ही था – लोगों के मन में लोकमान्य प्रति असीम आदर. अगर ये वही जुझारू वृत्ति दिखाते तो दूसरे तिलक कहलाते. आज विस्मृत हैं, ढूँढने पर गूगल तीन अन्य लोगों के साथ उनकी एक तस्वीर ढूंढ पाया है.

Ayn Rand की Atlas Shrugged का एक नायक Fransisco d’ Anconia एक industrialist घराने का वंशज होता है. एक प्रसंग में कहता है कि उनके घर में हर पीढ़ी में एक ही बेटा पैदा होता है लेकिन ऐसा नहीं होता कि जिंदगी उसके लिए आसान होती है. मेहनत करनी ही होती है और पीढ़ी दर पीढ़ी एक नसीहत मिलती है कि व्यवसाय में अपने दम पर वृद्धि न कर पाये तो इस नाम के लायक नहीं कहलाओगे और अगर सिर्फ नाम की खाना चाहते हो तो नष्ट भी हो जाओगे.

इतिहास, इतिहास होता है और उसमें स्थान पाने के लिए आप के पास वर्तमान है. अगर आप के पूर्वज काबिल थे, पराक्रमी थे तो उनका आदर होगा, आप को अपने लिए आदर खुद ही कमाना होगा. मुग़ल वंश औरंगजेब के बाद बहादुरशाह जफर तक चला. सब के नाम विस्मृति में चले गए हैं, आम आदमी को बिना गूगल के नहीं मिलते. बहादुरशाह जफर भी इसीलिए याद है क्योंकि उनके साथ मुग़ल सल्तनत समाप्त की गई.

और हाँ, आज कितने भी लफड़े जाहिर होते रहें, पर नेहरू, इन्दिरा और राजीव को जनता से आदर और प्रेम दोनों मिला था इसको कोई नकार नहीं सकता. अगर इन्दिरा की काबिलियत उसमें होती तो राहुल नेशनल पप्पू नहीं होता. उतने लफड़े भी नहीं किए उसने – वहाँ भी काबिलियत की कमी है शायद. साढ़े तीन साल ही हुए हैं, उसके घराने की पूरे देश पर सत्ता चलती थी.

नाम विरासत में मिलता है जरूर, इज्जत खुद ही कमानी होती है. और अगर बदनाम नाम की विरासत मिली हो तो खुद नया इतिहास बनाइये, उस से भविष्य को फर्क पड़ेगा! इतिहास को सत्य या असत्य बताने से किसको फर्क पड़नेवाला है?

‘जिनकी आँखें हैं वे देखें, कान हैं वे सुनें’.

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