तुम्हारी पॉलिटिक्स हम भी समझते हैं कॉमरेड

शिव भक्त, जनेऊधारी और परशुराम के वंशज परम पंडित राहुल गांधी की मंदिर -मंदिर यात्राओं के बावजूद कृपा नहीं बरसी. उनके भक्तों को भी अंदेशा हो चुका था और अग्रिम जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी डाल दी थी कि ईवीएम के वोटों का पेपर ट्रेल यानी वीवीपैट पर्टी के 25 प्रतिशत का मिलान किया जाए.

याचिका खारिज हो गई पर हार्टिक पटेल और संजय निरूपम अभी भी ईवीएम पर पिले हुए हैं. हालांकि नबी आजाद जैसे खानदान के गुलाम चुनाव बाद चुप हैं. कांग्रेस, केजरीवाल या लालू जैसा पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर एक है. सहिष्णुता ब्रिगेड भी पूरी तरह साथ है.

हर चुनाव से पहले ही मुनादी हो जाती है कि ईवीएम से छेड़छाड़ नहीं हुई तो जीत हमारी ही होगी. चुनाव आयोग घोर दबाव में है. मतगणना के बाद आयोग ने बयान जारी कर कहा कि गुजरात में सभी 182 सीटों पर एक-एक बूथ के पेपर ट्रेल के मिलान में आंकड़े 100 प्रतिशत सही मिले.

पर सिर्फ ईवीएम पर संदेह है या मंशा येन केन प्रकारेण पूरी प्रक्रिया पर संशय खड़ा कर भाजपा की जीत का अवमूल्यन करने की और किसी तरह उसे कमतर करने की है. लिबरल तब तक ही सहनशील हैं, जब तक सत्ता में हों. कुर्सी जाते ही सभ्यता का नकाब उतर जाता है.

एक अमेरिकी पत्रिका ‘न्यूज़वीक’ के स्तम्भकार कैस मुड्डे ने पराजय की स्थिति में सहिष्णुता ब्रिगेड की प्रतिक्रियाओं के तरीकों पर नजर डाली है. आप देखेंगे कि इंग्लैंड हो, अमेरिका हो या भारत, तरीके बिलकुल समान होते हैं. (अनुवाद में थोड़ा देसी तड़का है)

1. उपहास

यह कई दशकों से चल रहा था और इससे उदारवादियों का खुद में विश्वास झलकता था. रूढ़िवादी-परंपरावादी आदिम और अज्ञानी ही रहेंगे. खाकी चड्ढी और हाफ पैंट वाले जाहिल हैं ही उपहास के पात्र.

2. क्रोध

यह दूसरा चरण है. 2016 में पूरी दुनिया के वाम-उदारवादियों पर खासतौर से अमेरिका और ब्रिटेन में क्रोध के दौरे पड़ रहे थे (अपने यहां 2014 कर लें). इस चरण में लिबरल अब भी अपने वर्चस्व के प्रति आश्वस्त हैं पर साथ ही रूढ़िवादियों से मिल रही चुनौती से सकपकाए हुए हैं. इसलिए उनका यह क्रोध सिर्फ साथी उदारवादियों पर ही नहीं है बल्कि रूढ़िवादी नेताओं के संभावित समर्थकों पर भी है और वे उन्हें झटका देकर डराना चाहते हैं.

3. अविश्वास, आश्चर्य

तीसरा चरण है जिसमें लिबरल को पता चलता है कि चाय वाला मोदी जीत चुका है पर वे इस पर विश्वास ही नहीं कर पा रहे. उनकी शुरुआती प्रतिक्रिया होती है कि ऐसा नहीं कि लोग हमारे खिलाफ हैं (मोदी जैसों ने गुमराह कर दिया भोली मासूम जनता को). इंग्लैंड में अकादमिक व राजनीतिज्ञ अब भी दावा करते हैं कि ब्रेक्जिट ब्रिटिश जनता की इच्छा को परिलक्षित नहीं करता, तो अमेरिका में लिबरल मीडिया का दावा है कि ट्रंप को मिले श्वेतों के वोट सिर्फ उनकी आर्थिक परेशानियों के खिलाफ जताया गया विरोध है.

4. साज़िश सूंघना

आखिर में जब समझ में आ जाता है कि वे चुनाव/ रेफरेंडम हार चुके हैं तो वे नकार के चौथे चरण में पहुंचते हैं, पर धीरे-धीरे यह भी मानने लगते हैं कि वोटरों ने लिबरल-सहिष्णुता ब्रिगेड के प्रवचनों को खारिज कर दिया है. फिर भी नकार की स्थिति रहती है और वे तर्क देते हैं कि जो नकारा गया है वह असली वामिस्लामी उदारवाद नहीं है. असली की तो अभी भी पूछ है.

फिर कहेंगे- कुछ अदृश्य ताकते हैं जिन्होंने पोस्ट ट्रूथ (उत्तरवर्ती सत्य) विश्व का निर्माण कर लिया है. उत्तरवर्ती सत्य की उदारवादियों की इस कांस्पिरेसी थ्योरी को मानें तो ब्रेक्जिट और ट्रंप के पीछे पूरी तरह पुतिन का हाथ है. इसी थ्योरी से प्रेरित होकर अमेरिका की विद्वान लिबरल जमात ने ‘स्विंग’ राज्यों में पुन: मतगणना की मांग के अभियान के समर्थन में 9.5 मिलियन डालर का चंदा दे दिया.

5. लोकतात्रिक नकार

लिबरल नकार का आखिरी चरण नई राजनीतिक वास्तविकता और इसकी लोकतांत्रिक वैधता का नकार है. यह चाहे ‘साज़िश’ की थ्योरी को लेकर हो या सांस्थानिक तकनीकों की आड़ लेकर हो, लिबरल दलील होती है कि चुनावी नतीजे ‘लोकतांत्रिक’ नहीं हैं और इस आधार पर इन्हें खारिज कर देना चाहिए.

जैसे ब्रिटेन में ब्रेक्जिट विरोधी उदारवादियों ने यूरोपीय यूनियन की सुस्थापित परंपराओं का हवाला देते हुए जनमत संग्रह के नकारात्मक नतीजों को पलटने के लिए ‘दूसरे जनमत संग्रह’ की मांग की और ब्रिटिश संसद से ‘ब्रेक्जिट को खारिज’ करने को कहा. यूरोपीय संसद ने भी इस मांग का समर्थन किया.

अमेरिका में लिबरल हाहाकर मुख्य रूप से ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ पर केंद्रित रहा. ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ अलोकतांत्रिक संस्थान हों या न हों, पर हिलेरी क्लिंटन की हार से पहले किसी ने कभी इस पर चर्चा नहीं की.

पूरा आलेख पढ़ना चाहें तो यहाँ क्लिक कर दीजिए – Why Liberals Must Stop Wallowing in Negativity, Cas Mudde

तो ईवीएम चर्चा जारी रखने का उद्देश्य यह नहीं है कि उसमें गड़बड़ी है. पर जनेऊधारी नेता और उनकी पार्टी के पाले-पोसे विद्वान इसकी चर्चा जारी रखेंगे. उनकी मंशा रहेगी कि संशय का माहौल बना रहे, भगवा जीत पर सवाल खड़े होते रहें और किसी समयानुकूल अवसर पर इसी जीत को जनता के वोटों की लूट बताते हुए एक आंदोलन भी छेड़ दिया जाए.

मैं अलार्मिस्ट नहीं हूं, बेवजह खतरा सूंघने की प्रवृत्ति नहीं है अपनी पर एक बेहद गंभीर खतरा सामने आकार ले रहा है. उस पर अगली बार.

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