Turnover और Profit का अंतर तो आज तक ‘प्रिंस’ न समझे, तो चम्पू कैसे समझेंगे

80 के दशक की बात है. हमारे एक भैया थे. बनारस के यूपी कॉलेज में फारसी पढ़ते थे.

बनारस का यूपी कॉलेज एक बेहद प्रतिष्ठित संस्थान है, कुछ कुछ दिल्ली के स्टीफन कालिज जैसा…

उऊपी कॉलेज का नाम किसी जमाने मे Hewitt Kshatriya High School हुआ करता था.

इसकी स्थापना 1909 में हुई थी और उस ज़माने में इसमे सिर्फ राज घराने, सामंतों, जमींदारों के ठाकुर लड़के ही पढ़ पाते थे.

ऐसा भी नहीं था कि अन्य जातियों के लिए प्रवेश वर्जित था… पर कुछ कुछ वो केर बेर का चक्कर था… बेर के जंगल मे बेचारा केला कैसे पनपेगा?

उस ज़माने में इसके प्रिंसिपल अंग्रेज हुआ करते थे… फिर 1920 के आसपास ये इंटरमीडिएट कॉलेज बन गया और आज़ादी के बाद डिग्री कॉलेज….

समय के साथ इसमें आम आदमी के बच्चे भी पढ़ने लगे… पर ये जान लीजिए कि पूरब के ठाकुरों में यूपी कॉलेज में लड़का पढ़ाना शान की बात थी… तो हमारे भैया भी यूपी कॉलेज गए पढ़ने…

पर समस्या ये है कि गधे को अस्तबल में बांध देने भर से वो घोड़ा नहीं हो जाता… सो भैया जब पढ़ लिख के आये, तो चूंकि किसी काम लायक न थे तो माहपुर स्टेशन पे किराने की दुकान करने लगे.

अब किराने का दुकानदार घर में हो तो कम से कम नून तेल हरदी और अरहर की दाल की समस्या तो हल हो ही जाती है…

सो उनकी दुकान की बदौलत कुछ दिन सबने अरहर की ‘झूर दाल’ खाई… अब आप पूछेंगे की झूर दाल क्या होती है?

झूर दाल समझाने में तो बहुत लिखना पड़ेगा… पर बात ये कि झूर दाल समझे बिना लेख में मज़ा भी तो नहीं आएगा…

तो यूँ समझ लीजे कि देस में रहर की दाल इतनी पॉपुलर इसलिए है कि 100 ग्राम दाल में एक लीटर पानी ठेल दो तो पीले रंग का एक झोल तैयार हो जाता है जिसमें रोटी डुबा के पूरा खानदान रोटी खा लेता है…

पर जब संपन्नता आती है तो पानी में दाल की मात्रा बढ़ती जाती है, और दाल गाढ़ी मने भोजपुरी में झूर (सूखी) होती जाती है… ऐसी जैसे होटल-ढाबे पे मिलती है… दाल फ्राई…

सो हमरे भैया की जब किराने की दुकान हो गयी तो घर मे अब दाल फ्राई बनने लगी… जस जस परिवार दाल फ्राई खाने लगा, दुकान उजड़ने लगी…

एक दिन घर में मचा बमचक… भैया ने घर में दाल और तेल मसाला देने से मना कर दिया… पूछ ताछ हुई… दिन भर में क्या कमाते हो???

आज सुबह से क्या कमाये हो?

मुश्किल से 300 रुपैया…

300 कमाते हो और घर मे 5 रुपिया की दाल देने में प्राण निकल रहे हैं?

जांच कमीशन बैठा… जांच में पाया गया कि जो 300 रूपए की बात हो रही थी वो कमाई नहीं बल्कि कुल बिक्री थी… और पूरा खानदान उसी बिक्री पे ही ऐश कर रहा था कमाई समझ के…

आखिरकार हुआ ये कि भैया हमारे दिवालिया घोषित कर, अगल बगल के साहूकारों का हज़ारों रुपया दबा कर कलकत्ते फरार हो गए…

बिक्री को कमाई समझने वाले और turnover को profit समझने वाले अभी भी देश में बहुत से लोग हैं जिन्हें कांग्रेसी कहते हैं… Turnover और Profit का अंतर आज तक राहुल पप्पू गान्ही नहीं समझ पाए तो उनके चम्पू कांग्रेसी कैसे समझ लेंगे???

जय शाह की फर्म ने 80 करोड़ का turnover किया है न कि profit… Profit के नाम पे तो उनको डेढ़ करोड़ का Loss हुआ है…

कांग्रेसियों को समझ लेना चाहिए कि Turnover मने सभा और Roadshow में उमड़ी हुई भीड़…. और Profit मने प्रत्याशी को मिले कुल वोट…

समझे बे चम्पू???

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