कैलाश पर है अलौकिक निवास

मैंने अभी बताया, कैलाश पर अलौकिक निवास है. नियमित रूप से. नियम कैलाश का रहा है कि कम से कम पाँच सौ चैतन्य बौद्ध वहां रहे ही, उससे कम नहीं. पाँच सौ बुद्धत्‍व को प्राप्‍त व्‍यक्‍ति कैलाश पर रहेंगे ही. और जब भी एक उनमें से विदा होगा किसी और यात्रा पर, तो दूसरा जब तक न हो तब तक वह विदा नहीं हो सकता. पाँच सौ की संख्‍या वहां पूरी रहेगी. उन पाँच सौ की मौजूदगी कैलाश को तीर्थ बनाती है. काशी का भी नियमित आंकड़ा है कि उतने संत वहां रहेंगे ही. उनमें कभी कमी नहीं होगी. उनमें से एक को विदा तभी मिलेगी जब दूसरा उस जगह स्‍थापित हो जाएगा.

ये रहस्योद्घाटन ओशो ने कई साल पहले अपने एक प्रवचन में किया था. चैतन्य मनुष्यों की एक निश्चित संख्या ही किसी स्थान को तीर्थ बनाए रखती है. उनकी सामूहिक ऊर्जा तीर्थ की आध्यात्मिकता को पुष्ट करती रहती है. कैलाश पर्वत के समग्र प्रभाव को लेकर काफी कुछ लिखा गया है. कई पर्वतारोही कैलाश पर विजय पाने के रोमांच में वहां गए लेकिन कोई भी सफल न हो सका. उनमें से कुछ गहरे अवसाद में चले गए और कुछ गहन शांति के अनुभव से गुज़रे. 11वीं सदी में तिब्बती बौद्ध योगी मिलारेपा का उल्लेख मिलता है कि अविजित कैलाश ने उन्हें ‘आने दिया’ था. मिलारेपा का तो रिकॉर्ड है लेकिन कई ‘चैतन्य जन’ वहां जाते रहे हैं, जिनका कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं है. आध्यात्मिकता के शिखर पर विराजमान ऐसे कुछ ‘विशिष्ट’ लोगों को ‘रास्ता’ मिल जाता है.

अब तक कैलाश को लेकर काफी शोध छप चुके हैं. प्राचीन ग्रंथों के अनुसार आज का कैलाश ‘मेरु’ पर्वत है. उसे एक्सिस मुंडी और ब्रम्हांड का केंद्र भी कहा गया है. कैलाश पर सबसे अधिक शोध करने वाले रुसी शोधकर्ता हैं. इन लोगों ने अत्याधिक कठिन परिस्थितियों में यहाँ शोध किया है. ये बात और है कि कैलाश ने अपने क्षेत्र में विचरण करने वालों की ‘सीमा’ बाँध रखी है. उससे आगे कोई नहीं जा सकता. अभी कुछ दिनों से मैंने लगातार कैलाश पर्वत का गहन सेटेलाइट अध्ययन किया है. कुछ फोटोग्राफर्स और शोधकर्ताओं के अनुभव भी पढ़े. यहाँ बहुत कुछ ऐसा है, जो आश्चर्यजनक है. केवल कैलाश ही नहीं बल्कि समीप के बड़े क्षेत्र में शोध किया गया है. यहाँ प्राचीन मानव बसाहट के संकेत मिले हैं. ये कैलाश के क्षेत्र में निवास करते थे.

गूगल अर्थ सेटेलाइट इमेजनरी के माध्यम से किसी वस्तु या स्थान को पास में जाकर देखना बड़ा उबाऊ और थका देने वाला काम है. कई बार नेट साथ नहीं देता. कई बार गूगल अर्थ किसी ख़ास स्थान को आपसे छुपाकर रखता है, ‘ब्लर’ कर देता है. तो कई दिन तक चला ये उबाऊ और थका देने वाला काम कुछ तो रंग लाया है. कैलाश की दिव्यता को समझने जितनी बुद्धि तो मुझमे नहीं है. इन्हे स्वयंभू शिवलिंग भी कहा जाता है. आज इनके दर्शन समीप से कीजिये.

१- शिखर के तल में (पर्वत के नहीं) में बना ये सुंदर आर्क, प्रकृति की अद्भुत, अविश्वसनीय इंजीनियरिंग या स्वयं महादेव कृत
२ – तल में शंखनुमा सरंचना, जिसका उल्लेख वायुपुराण में भी किया गया है.

वैज्ञानिक तथ्य

कैलाश लद्दाख पर्वतमाला के पचास मील पीछे सिंधु नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित है. भू वैज्ञानिक कहते हैं कैलाश आर्कोज, बलुआ पत्थर और कांग्लोमिरेट से बना है. कांग्लोमिरेट की परत दो हज़ार मीटर मोटी है. कैलाश पर्वत पर ‘इओसीन युग’ (तृतीय कल्प) के बाद की कोई चट्टान नहीं मिलती. ध्यान रहे कैलाश की ‘नपती’ करने के लिए पुराने समय में सरकारों को बहुत पापड़ बेलने पड़े थे. हालांकि अब ज्ञात है कि ये 21,778 फ़ीट ऊँचा है.

(वायु पुराण से मिली जानकारी के अनुसार कैलाश और मानसरोवर का निकटतम क्षेत्र ‘मानस खंड’ कहा जाता था. उस समय तिब्बत का क्षेत्र ‘इलावृत’ के नाम से जाना जाता था. सुवर्ण मणियों से चित्रित अनेक विशाल भवन पंक्तियों से भूषित वहां एक लंबा-चौड़ा नगर है.)

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