ध्यान ही जीवन : प्रेम ही ध्यान

सवाल : नमस्ते Ma, बहुत दिनों से मन में एक प्रश्न था.. कि क्या चुपचाप बैठना तथा कुछ नहीं सोचना इतना कठिन होता है.. क्यूंकी जैसे ही बैठती हूँ (बिल्कुल शांत) वैसे ही उसी वक़्त सभी तरह के विचार आक्रमण करने लगते हैं, जबकि मन होता है कि उस वक़्त किसी तरह की बाधा ना आए.. कभी कदा हो भी जाता है किंतु ज़्यादातर बार आक्रमण होते ही रहते हैं.. तो मन हुआ कि आपसे यह बात साझा कर, समझने की कोशिश करूँ.. धन्यवाद.

जवाब : ध्यान को लेकर बहुत सारे लोगों को जवाब दिया है. ध्यान को लेकर अमूमन सवाल सबका एक सा ही होता है, लेकिन फिर भी हर बार मेरी तरफ से जवाब अलग अलग होते हैं. क्योंकि सबके लिए ध्यान विधि अलग अलग होती है. स्वभाव के अनुसार ध्यान की प्रक्रिया बदल जाती है. अब कई बार मुझे सामने वाले का स्वभाव पता नहीं होता है और जब कोई वास्तविक जिज्ञासु इस तरह का सवाल करता है तो उस समय “मैं” हट जाती हूँ. तुरंत जवाब नहीं देती. जवाब आने की प्रतीक्षा करती हूँ.

तो यह प्रश्न कल रात आया था. कल मेरे पास कोई जवाब नहीं था, आज ध्यान में बैठते से ही यह सवाल मेरे सामने तैर गया. और जो मेरे साथ घटित हुआ, लगा शायद यही उस मित्र के सवाल का भी जवाब हो. लेकिन जवाब देने से पहले मैं हमेशा कहती हूँ मेरे कहे को सार्वभौमिक सत्य मत मान लेना. ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव भी हो सकता है, मन की मौज और आत्मा से निकली आवाज़ भी हो सकती है और जवाब कहीं और से आया हुआ भी हो सकता है.

ध्यान का अर्थ अक्सर लोग आँख बंद कर परमात्मा में लीन जाने को, जप करने को, किसी एक जगह ध्यान केन्द्रित कर शांत बैठने को समझते हैं. ऐसा कतई आवश्यक नहीं है. ध्यान का अर्थ होता है इस समय आप जिस भावभूमि में हैं, या जिन तरंगों पर सवार है उसके साथ साक्षी भाव से एकाकार हो जाना. और उसे हृदय से स्वीकार कर लेना कि हाँ ऐसा मेरे साथ घटित हो रहा है. फिर चाहे वो क्रोध हो, ईर्ष्या हो या प्रेम हो.

हम अक्सर इसके विपरीत कार्य करते हैं. जो विचार आ रहे हैं उन्हें रोकने का प्रयास करते हैं, उससे लड़ते हैं, उसे जबरदस्ती नज़रअंदाज़ करने की कोशिश करते हैं. वास्तव में जब आप ध्यान में बैठते हैं उस समय सबसे पहले जो विचार आ रहा है वही आपके ध्यान में सहायक होने वाला है. इसलिए उससे लड़िये मत, भगाइए मत. हाँ उस विचार के साथ कई अन्य विचार भी आएँगे लेकिन उसे उसी तरह नज़रअंदाज़ करना है जैसे सड़क पर अपनी गाड़ी पर चलते हुए आसपास से गुज़र रहे लोगों को करते हैं.

सड़क पर साथ चल रहे या सामने से आ रहे हर व्यक्ति के साथ तो हम संवाद शुरू नहीं कर देते. उसे आते हुए देखते हैं और पास से गुज़र जाने देते हैं. बस ऐसे ही ध्यान के समय आ रहे विचारों को गुज़र जाने देना है. हाँ कभी कोई परिचित मिल जाता है तो चलती गाड़ी से ही सलाम नमस्ते कर आगे बढ़ जाना है. उससे बात करने नहीं रुकना है.

हमारे लिए महत्वपूर्ण तो वह विचार या भावभूमि की गाड़ी है जिस पर हम सवार है. पहले ही कदम पर निर्विचार होने का प्रयास मत कीजिये. गाड़ी पर सवार रहिये. आँख बंद करते से ही सबसे पहले और प्रगाढ़ रूप से जो विचार आपके अन्दर प्रवेश कर गया है उस पर सवार हो जाइए.

अक्सर देखा गया है जो लोग प्रेम में होते हैं वे दिन रात बस प्रेम तरंगों पर ही सवार रहते हैं. और जब ऐसे में आप आँख बंद करते हैं तो सबसे पहले उसी का विचार आता है. उस प्रेम की ऊर्जा पर सवार हो जाइए. उसे निराकार बनाने की कोशिश भी मत कीजिये. आप प्रेम में हैं यह अनुभूति ही आपकी ऊर्जा को उस स्तर तक ले जाएगी जहाँ लोग परमात्मा को याद करते हुए पहुंचना चाहते हैं.

‘तुझमें रब दिखता है’ कवि ने यूं ही नहीं कह दिया है. उसे अनुभव कीजिये, सबसे जल्दी जो तरंगे आपकी ऊर्जा को ध्यान की गहराइयों में ले जाएगी वो सिर्फ और सिर्फ प्रेम ही है. उस गहराई में उतरते हुए एक क्षण ऐसा भी आएगा कि प्रेमी की सूरत भी गायब हो जाएगी… रह जाएगा सिर्फ प्रेम.

फिर जब आप प्रेम में होते हैं तो अन्य किसी के बारे में सोचना नहीं चाहते, वैसे ही जब आप ध्यान की ऐसी अवस्था में पहुंच जाते हैं तो कोई अन्य विचार आएगा ही नहीं. और आएगा भी तो आपके लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं रह जाएगा.

ऐसी अवस्था में अधिक से अधिक समय तक बने रहने से ही काफी ऊर्जा संगृहीत हो जाती है फिर यह चिंता छोड़ दीजिये कि ध्यान घटित हुआ या नहीं. क्योंकि इस समय जो आपके साथ घटित हो रहा है उससे अधिक आवश्यक और सुन्दर कम से कम आपके लिए कुछ और नहीं है.

– माँ जीवन शैफाली

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