जल्द ही बदलेंगे भाजपा के आंतरिक सत्ता समीकरण

मैंने अभी गुजरात में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान न ही इसको लेकर लेख लिखा है और न ही भाजपा इस चुनाव में कितनी सीटें जीत कर लायेगी इस पर कोई आंकलन दिया है.

अब जब कि परिणाम स्पष्ट हो गये है और गुजरात के साथ हिमाचल प्रदेश में भी भाजपा जीत गई है तब अपने न लिखने के कारणों के साथ मेरा कुछ लिखना बनता है.

मेरा गुजरात पर लिखने या फिर उसकी जीत के अंतर पर आंकलन न करने के पीछे मुख्य कारण यह था कि इस चुनाव में गुजरात में भाजपा के साथ तीन नकरात्मकताएं निहित थीं और वह तीनों ही भयावह थी.

भाजपा का लगातार 22 वर्ष, गुजरात में शासन में रहना पहला कारण था. 22 वर्ष लगातार शासन करने से जो तन्त्र में स्वभाविक कमज़ोरियां व बुराइयां आ जाती है और पार्टी के नेताओ में जो दम्भ व जनता के प्रति उदासीनता का भाव आ जाता है, उसको लेकर स्थानीय जनता के रोष को मापने का कोई साधन मेरे पास नहीं था.

दूसरा यह गुजरात का पहला चुनाव था जब वहां भाजपा 2002 के बाद बिना नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़ रही थी. नरेंद्र मोदी जी एक करिश्माई व्यक्तित्व है और उनके द्वारा गुजरात में छोड़ी गई शून्यता की भरपाई विजय रूपानी से किये जाने की आशा मेरे द्वारा करना फिलहाल व्यर्थ ही था.

राजनीति में अक्सर देखा गया है कि जब किसी पार्टी का दशकों के शासन होता है तो अपने सर्वशक्तिमान मुख्यमंत्री के खोने के बाद उसके उत्तराधिकारी, भले ही वह कितना ही अच्छा हो, उसके नेतृत्व में पार्टी को ही जनता विधानसभा में अस्वीकार कर देती है.

मोदी जी भले ही प्रधानमंत्री बन गये हो लेकिन यह चुनाव गुजरात के मुख्यमंत्री का था इसलिये गुजरात की जनता कितना समर्थन देगी वह इतिहास के उदाहरणों की कसौटी पर नकारात्मक था.

तीसरा सबसे बड़ा कारण भाजपा के सर्वशक्तिशाली अध्यक्ष अमित शाह, जो आज सत्ता के दूसरे केंद्र कहे जाते है, के खुद के गृहप्रदेश में चुनाव होना था. अमित शाह ने जहां पिछले 3 वर्षों में बड़ी सफलतायें और ऊंचाइयां प्राप्त की हैं, वही उनकी संगठन से लेकर भाजपा शासित प्रदेशों में हर तन्त्र को अपने एकल नियंत्रण में रखने की महत्वकांक्षा के कारण पार्टी में उनसे कुपित व भयभीत रहने वालों की लिस्ट भी बढ़ती जा रही है.

दूसरे प्रदेशों में रहने वाले या जिनको गुजरात सरकार के अंदरूनी हालात का ज्ञान नहीं है उनके लिए विजय रुपाणी गुजरात के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन हकीकत में गुजरात की सरकार में अमित शाह ही मतलब रखते हैं.

यहां तक कि गुजरात में रोजमर्रा के काम काज में मोदी जी का कोई मतलब नहीं है क्योंकि मोदी जी गुजरात की सरकार में कोई दखल नहीं देते हैं, वहां सिर्फ अमित शाह ही आखिरी नाम होता है.

अमित शाह की इस कार्यप्रणाली का सबसे बुरा असर गुजरात की सरकार से ज्यादा संगठन और भाजपा समर्थकों पर पड़ा है और इससे निश्चित रूप से नकरात्मकता उपजी है.

अब अमित शाह अपने बूथ मैनेजमेंट के कौशल से अपने ही लोगों की नाराज़गी को कैसे निष्प्रभावी करेंगे और उससे होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे करेंगे, इसका धरातलीय ज्ञान मुझको बिल्कुल भी नहीं था.

हालांकि इन तीनों में प्रथम व द्वितीय नकारात्मकता भाजपा के हाथ में नहीं थी लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान तीसरी नकरात्मकता को मोदी जी ने अवश्य पढ़ लिया था.

यही कारण था कि प्रचार के आखिरी 15 दिनों में अमित शाह नेपथ्य में चले गये थे और कमान स्वयं मोदी जी ने संभाल ली थी और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी द्वारा उस रिक्तता को पूरा किया गया था. गुजरात में मोदी जी के बाद सबसे ज्यादा मांग योगी जी की थी और उनकी मोदी जी के बाद सबसे ज्यादा रैली भी कराई गई थी.

इन तीन लैंडमाइंस को पार कर यदि भाजपा गुजरात में सरकार बना रही है तो यकीन मानिये यह बेहद महत्वपूर्ण विजय है. यह पहली ऐसी जीत होगी जिसमें विपक्ष पूरी ताकत से एकजुट होकर भाजपा से लड़ा है.

इस पर भी यहां वोट शेयर बढ़ा कर भाजपा सत्ता में आई है तो यकीन मानिये 2019 में मोदी जी के नेतृत्व में एक तरफा जीत होगी. मैं समझता हूँ कि यह भी बहुत शुभ है कि भाजपा को 140-150 सीट नहीं मिली, वरना लोग असली तस्वीर न देख कर भाजपा की जीत का सेहरा अमित शाह के सर पर बांधते.

मेरा मानना है कि गुजरात में भाजपा की यह जीत व्यक्तिगत रूप से मोदी जी की जीत है और उसके साथ योगी जी की महत्वपूर्ण भूमिका को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता है.

अभी सूक्ष्म विश्लेषण करने लायक आंकड़े सामने नहीं हैं लेकिन सरसरी नज़र से देखने में जो सामने आया है उसके अनुसार जहां जहां योगी जी ने प्रचार किया है वहां लगभग 90% सीटों पर भाजपा की जीत हुई है.

मुझको ऐसा लग रहा है कि अगले तीन महीनों में भाजपा के आंतरिक सत्ता समीकरणों में महत्वपूर्ण बदलाव होगा.

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