अमरूद का पेड़

मैं जहाँ काम करता हूँ, मुझे उस संस्था से एक घर मिला हुआ है, जिसमें आँगन में आम का एक विशाल पेड़ और इसके अलावा एक बाग़ीचा भी है. जब हम यहाँ आये थे, वह एकदम उजड़ा हुआ था. बहुत मन हुआ कि यहाँ रहना है, तो इस जगह को हरा-भरा करना चाहिए, सुंदर बनाना चाहिए. सो एक दिन बरसात के मौसम में लगभग भीगते हुए पास की नर्सरी में हम लोग गये और कुछ पौधे लाकर यहाँ रोप दिये.

उन्हें सींचने और सँवारने में संध्या ने लगातार मेहनत की. बीच में हालात ऐसे बने कि हमें लगा, हम यहाँ ज़्यादा दिन नहीं रह पायेंगे. इसलिए मैंने एक बार परेशान होकर उससे कहा : ‘तुम क्यों जान देती हो, जब हमें यहाँ से जाना ही है ?’

उसके जवाब से मैं चकित रह गया और मेरे मन में उसके लिए सम्मान का भाव पैदा हुआ : ‘जो भी लोग इस घर में रहने आयेंगे, उन्हें लगेगा कि हम अच्छे लोग थे.’

अभी हम यहाँ से गये नहीं हैं और उसके पहले ही बीते दिनों उसने बताया कि हमने जो अमरूद का पेड़ लगाया था, उसमें फल आ गये हैं. और भी ख़ुशी की बात थी कि यह लाल अमरूद था. सच पूछिये, तो मुझे ऐसा लगा कि हमारा यह प्रवास इस वजह से भी निष्फल नहीं माना जायेगा कि हमारा लगाया पेड़ ‘सफल’ हुआ.

यहाँ मनुष्यों से हमारा जो साहचर्य रहा, उनमें ज़ाहिर है कि कुछ बहुत अच्छे लोग भी थे, जिन्हें छोड़कर जाने का हमेशा मलाल रहेगा. मगर मुझे सबसे ज़्यादा दुख अमरूद के इस पेड़ से अलग होने का होगा ; क्योंकि अच्छे-से-अच्छे इंसान भी कभी-कभार हमसे रूखा और कठोर व्यवहार कर जाते हैं, लेकिन पेड़ कभी ऐसा नहीं करते.

यह एक छोटी-सी कहानी है. छपने के लिए संपादक जी को भेजूँ, तो शायद वह कहें कि ‘घटना तो इसमें है ही नहीं !’ अब आप ही बताइये, अमरूद के पेड़ में फल लग जाना क्या कोई घटना नहीं है?

– पंकज चतुर्वेदी

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