कोरा कागज़ था यह मन मेरा, लिख लिया नाम जिस पे तेरा

कोरा कागज़ था यह मन मेरा
लिख लिया नाम जिस पे तेरा
चैन गंवाया मैंने, निंदिया गंवाई
सारी-सारी रात जागूं दूं मैं दुहाई
नैना कजरारे मतवाले, ये न जानें
खाली दर्पण था यह मन मेरा
देख लिया मुख जिसमें तेरा
कोरा कागज़ था यह मन मेरा…

वीणा,

कागज़ कोरा हो तो इससे बड़ी और कोई बात नहीं, क्योंकि कोरे कागज़ पर ही वेद उतरते हैं. सिर्फ कोरे कागज़ पर उपनिषदों का जन्म होता है, कुरानें अवतरित होती हैं सिर्फ कोरे-कागजों पर. जिसने चित्त को कोरा कागज बना लिया, बस उसने सब पा लिया. वहीं तो अड़चन है. वहीं कठिनाई है. तुम्हारे चित्त के कागज इतने गुदे पड़े हैं, इतनी लिखावटें, इतने हाथों से लिख दी गई हैं कि अब उन पर कुछ परमात्मा लिखना भी चाहे तो अंकित न हो सकेगा; अंकित हो भी जाये तो समझ में न आ सकेगा कि क्या लिखा गया है.

मन को कोरा बनाना पहला कदम है परमात्मा की यात्रा में. वही तीर्थ है. जिसने मन को कोरा बना लिया, तीर्थ पहुंच गया. उसका काबा आ गया. अब कहीं जाना नहीं है. अब तो इसी कोरे मन में परमात्मा उतरेगा.

लेकिन मन को कोरा करने में बड़ी अड़चन है. कोई मन हिंदू है तो कोरा नहीं है. कोई मन मुसलमान है तो कोरा नहीं है. कोई मन जैन है तो कोरा नहीं है. कोई मन कम्यूनिस्ट है तो कोरा नहीं है. मन का कोई भी पक्षपात हुआ, कोई भी धारणा हुई, कोई भी दृष्टि हुई, कोई भी दर्शन-शास्त्र हुआ–कि मन कोरा नहीं है. फिर मन गुदा है, न मालूम कितने शब्दों से भरा है. और सब शब्द उधार, सब बासे, सब पराये, दूसरों से लिये हुए, अपना अनुभव कोई भी नहीं. अपना अनुभव तो कोरे मन में जगता है.

तुम्हारे चित्त में इतना शोरगुल है कि अगर परमात्मा अपना इकतारा बजाये भी तो सुनाई पड़ेगा? नक्कारखाने में तूती की आवाज होगी. कहां सुनाई पड़ेगा? जैसे भरे बाजार में एक कोयल बोलने लगे, किसको सुनाई पड़ेगा? लोगों के चित्त इतने उपद्रव से भरे हैं कि परमात्मा बहुत बार आता है तुम्हारे द्वार तक, दस्तक देकर लौट जाता है, तुम उसकी दस्तक सुनते नहीं. बहुत बार तुम्हें झंझोड़ देता है, मगर तुम सोये हो गहरी तंद्रा में; तुम जागते नहीं, तुम और करवट लेकर दुबारा नया सपना देखने लगते हो.

तुम जरा कोरे हो जाओ तो उसका बादल घिरे, बरसे जिस अमृत की तलाश तुम कर रहे हो, वह अमृत बरसने को आतुर है. तुम्हीं तलाश नहीं कर रहे हो, अमृत भी तुम्हारी तलाश कर रहा है. प्यासा ही सरोवर नहीं खोज रहा है, सरोवर भी प्यासे की राह देख रहा है, क्योंकि जब प्यासे की प्यास बुझती है तो प्यासे की ही प्यास नहीं बुझती, सरोवर भी सार्थक होता है. यह बात खूब मन में संजोकर रख लेना.

तुम्हीं नहीं खोज रहे परमात्मा को, परमात्मा भी तुम्हें खोज रहा है. जिस दिन मिलन होगा, तुम्हीं आनंदित नहीं होओगे, परमात्मा भी नाच उठेगा. इसलिये कथाएं हैं कि जब बुद्ध को ज्ञान हुआ तो बेमौसम फूल खिल गये. ये तो प्रतीक हैं,काव्य-प्रतीक. ये इतना ही बताते हैं कि सारा अस्तित्व आनंदमग्न हो गया–बेमौसम फूल खिल गये, कि सूखे वृक्षों में हरे पत्ते आ गये, कि देवताओं ने आकाश में दुंदुभी बजाई, कि आकाश से फूल झरे, झरते ही चले गये.

– ओशो

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY