कहीं साला अपन लोगों के माथे पर @#$# यानी बेवकूफ़ शब्द तो नहीं लिखा!

हमारे देश में ‘जमीयत उलेमा ए हिन्द’ नाम की एक संस्था है जो देश के मुसलमानों से अपील करती है कि वह ज्यादा से ज्यादा जकात दें ताकि आतंकवाद के केसों में जो मुस्लिम युवक पकड़े जाते हैं उनका मुफ्त में केस लड़ा जा सके.

पिछले साल इस संस्था ने 410 मुस्लिम युवकों का केस लड़ने में 2 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम खर्च की थी और अब तक 108 युवकों को छुड़वाया है.

इसी प्रकार मुस्लिम वकीलों की एक संस्था और है जो आतंकवाद के जुर्म में गिरफ्तार किये गए मुस्लिम युवकों की मदद के लिए फ्री में केस लड़ती है. उसका नाम है ‘ऑल इंडिया माइनॉरिटी एडवोकेट्स एसोसिएशन’.

2014 में देश की खुफिया एजेंसियों ने गुलरेज़ मुस्तफा नाम के एक मोस्ट वांटेड आतंकवादी को पकड़ा था.

पूछताछ में मुस्तफा ने खुलासा किया कि वह मध्य प्रदेश में सिमी के लिए चंदा जुटाता है और चन्दे की रकम को आतंकवादियों तक पहुंचाता है. एक अन्य आतंकवादी के बारे में उसने बताया कि अबु फैज़ल भी जकात की रकम जुटाता है.

प्रधानमंत्री मोदी की पटना रैली में धमाकों के आरोपी हैदर अली को फैज़ल ने जकात की रकम से 10 लाख रुपये दिए थे.

मुस्तफा ने बताया कि राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, असम में उसके जैसे कई लोग मौजूद हैं जो मुसलमानों से जकात की रकम जुटाते हैं और उन्हें आतंकवादियों तक पहुंचाते हैं.

एक अनुमान है कि देश में हर साल करीब 30 से 40 हजार करोड़ रुपये की जकात जुटाई जाती है. इस जकात का ठीक ठीक क्या इस्तेमाल होता है कोई नहीं जानता.

इसके अलावा एक संगठन और है, ‘रिहाई मंच’. इस संगठन के तो कहने ही क्या? यह संगठन भी आतंकवाद के केस में गिरफ्त में आये मुस्लिम युवकों को पिछले दस साल से छुड़वाने का काम करता आ रहा है.

रिहाई मंच नाम का यह संगठन आतंकवाद तो छोड़िए सामान्य अपराधियों तक को छुड़वाने का काम करता है. इस संगठन ने पकड़े गए आतंकवादी तारिक कासमी का खुलेआम समर्थन किया था और इसके अध्‍यक्ष मोहम्‍मद शोएब ने पाकिस्‍तान जिंदाबाद के नारे लगाये थे.

रिहाई मंच ने लखनऊ सीरियल बम धमाकों के 8 आरोपियों को जेल से रिहा भी करवाया है. वर्तमान में यह संगठन उत्तर प्रदेश में ‘यूपीकोका’ जैसे सख्त कानून आने का विरोध कर रहा है.

इन सब के अलावा और भी ऐसे सामाजिक संगठन है जो मुस्लिम अपराधियों और आतंकवादियों के परिवारों की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक मदद करते हैं.

आरोपियों के लिए मंहगे वकील करवाना, परिवार के सदस्यों के लिए रुपया-पैसे, राशन-पानी की मदद करना, परिवार के कमाऊ सदस्यों के लिए रोजगार, काम धंधा दिलवाना या दिलवाने में मदद करना इन संगठनों के मुख्य काम हैं.

एक अपन बेवक़ूफ़ हिन्दू हैं जो सिर्फ सीता रैगर और उसके बच्चों की आर्थिक मदद के लिए आगे आते हैं तो देश में हड़कंप मच जाता है. कुख्यात, बर्बर, मुस्लिम आतंकी संगठन ISIS से तुलना होने लगती है… और तो और, देश की सबसे परम सेक्युलर सरकार सीता रैगर का एकाउंट फ्रीज़ कर देती है.

पैसा भेजने वालों वालों को चिह्नित कर लेती है, सोशल मीडया में परिवार की आर्थिक मदद करने वालों पर, और मदद की अपील करने वालों पर नज़र रखी जाने लगती है.

आम जन और रिश्तेदारों को परिवार के सदस्यों तक से मिलने से रोक देती है. कुछ लोग मिलने के लिए उदयपुर-राजसमन्द पहुंचने का प्रयास करते भी हैं तो उन्हें सीधे जेल में ठूंस देती है.

यहां सालों से जकात और उम्मत का खुला खेल चलता आ रहा है, आतंकवादियों को छुड़वाया जा रहा है, उनके परिवार के सदस्यों की हर तरह से मदद की जा रही है… तो कोई ध्यान नहीं देता. न सरकार न मीडिया.

मैं कभी-कभी आईने के सामने घण्टों खड़ा होकर खुद को बड़े ध्यान से देखता हूँ, आप भी देखिएगा, कहीं साला अपन लोगों के माथे पर @#$# यानी बेवकूफ़ शब्द तो नहीं लिखा.

  • आशीष प्रधान

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