तरंगित मन

स्वयं अपरिचित थे तुम
छेड़ने जा रहे थे कोई पुराना सितार
सालों से कोने में उपेक्षित पड़ा हो जैसे
जिसके वक्ष पर तुम्हारा अछूता स्पर्श
कोई हल्का सा स्पंदन उपजा देगा और
जन्मने की क्षमता से परिपूर्ण होगा
असीम संगीत की मद्धम लहरियाँ

विसंगतियों में तुमसे मिलना
गहरे तक असर कर गया
तुम्हारा मुझमें ठहरे रह जाना ….प्रमाण कोई नहीं
देखो न, अभी तक अनजान हो तुम
प्रेम की हमारी पांडुलिपियों से
जिन्हें तुम ……
दृष्टि की पैनी कलम से
अनजाने में मेरे मन की कच्ची मिट्टी वाली
सीली सी दीवार पर खुरच के लिख गए

कोई कंकड़ उठाया हो जैसे
और फेंक दिया शांत सरोवर में
समय बीत नहीं रहा था अकारण
बस यूं ही अनायास
बोला होगा – तुमसे प्रेम हो गया है
और देखो मुझमें प्रेमोदय हो गया

प्रेम की स्वीकारोक्ति से मनोहर कुछ नहीं
अपेक्षाहीन सी मैं उलझी हूँ अपने बुने जालों में
लिपटी रहती हूं लाखों तरंग दैर्घ्यों में
बदलता कुछ भी नहीं, सम्भलता भी नहीं

तुम्हारा गमन आगमन प्रश्न ही नहीं
पर तुम ….कहीं जाते ही नहीं मुझमें से
मुझमें ठहर गया हो वो एक लम्हा
जैसे सफ़र कोई आधा अधूरा सा हो

अपरिचित हो मेरी क्षमताओं से
प्रेम माध्यम बना सीमित से असीम होने की ओर
पूर्व पश्चिम से इतर क्षितिज़ की ओर
पर्याप्त मिठास है जीवन की तमाम कड़वाहटों से इतर
कभी लिखी जाएंगी प्रेम कविताएं, तुम्हारी कलम से
तुम्हारी डायरी में, मेरे चले जाने के बाद

मगर कभी मेरा न होना खटकेगा नहीं तुम्हें
मैं कहीं भी जा कहाँ पाऊँगी
कोई कब जा पाता है,
अवचेतन मन में ठहर जाता है
स्वप्न बन जाने के लिए ……
मैं स्वप्न बन लौट आऊँगी, सबसे करीब तुम्हारे

– प्रिया वर्मा

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