संस्कार

मैं यहाँ विदेश में नौकरी कर रहा हूँ, अभी तक़रीबन एक महीने पहले ही माँ आयी थी और मैं उन्हें लेने ऐरपोर्ट पर लगभग 2 घंटे पहले ही पहुँच गया, सो बेसब्री से इंतज़ार में था क्योंकि माँ पहली बार अकेले सफ़र कर रही थीं. जैसे ही माँ दिखी तो पहले उनके पैर छुए और फिर गले से लिपट गया.

घर जाता हूँ तो हमेशा बड़े भैया मुझे लेने ऐरपोर्ट आते हैं, उनके भी पहले पैर छूता हूँ और फिर गले मिलता हूँ, आज तक उनसे कभी हाथ नहीं मिलाया, हालाँकि हम दोनों की उम्र में केवल 2 साल का ही अंतर है.

पिताजी के भी पैर छूता हूँ, उनसे गले मिलने की हिम्मत नहीं होती तो बस पैर छू कर के किनारा पकड़ लेता हूँ. असल में पिताजी अत्यंत धार्मिक व धीर-गम्भीर स्वभाव के रहे हैं और हमने उन्हें कभी किसी के साथ विनोद करते नहीं देखा था, तो उनके आगे मुँह खोलने की हिम्मत नहीं होती. वैसे अब अपनी पोतियों के साथ उनकी वह गम्भीरता कहाँ गुम हो जाती है हमें पता नहीं चलता. पर फिर भी हम अपने दायरे से बाहर आने की हिम्मत अब भी नहीं जुटा पाते उनके सामने और उनकी इस पूर्णसत्ता का हृदय से आनंद उठाते हैं.

आजकल वीडियो कॉलिंग का ज़माना है ही आप जानते ही हैं, सो घर पर रोज़ ही इस माध्यम से बात होती है, माँ व भाई से तो लेटे हुए ही बात कर लेता हूँ पर पिताजी के फ़ोन पकड़ते ही स्वतः पालथी मार कर बैठ जाता हूँ. जब यह वीडियो कॉलिंग नहीं था तब भी उनसे बात करते हुए शरीर का ख़ुद-ब-ख़ुद पालथी मार कर बैठना तय था, यह एक स्वतः हो जाने वाली शारीरिक प्रक्रिया है.

अब यह मत समझिएगा कि बड़ा सख़्त क़ायदा-क़ानून है घर का, बात असल में यह है हमने अपने माँ-पिताजी को सदैव ही अपने से बड़ों का ऐसा ही सम्मान करते पाया और बस हमने उनका मात्र अनुसरण किया. बच्चे तो आप जानते ही हो नक़लची बंदर होते हैं, तो जी हम भी नक़लची बंदर ही थे. पता ही नहीं चला कि नक़ल करते-करते कब यह आदत बन गई और शुरुआती दिखावे के बाद कब यह श्रद्धा में बदल गई यह भी नहीं पता. तो जी ये सुबह उठ कर नियमित माँ-पिताजी के चरण छूना मुझे तो याद नहीं कितनी उम्र में शुरू कर दिया था हम दोनों भाईयों ने.

यह चरणवंदन व बड़ों का सम्मान करना अनुशासन की श्रेणी में नहीं आता हमारे लिए, यह तो हमारी संस्कृति व सभ्यता का अंश रहा है मने हमारे जीवन का हिस्सा.

वैसे कहीं पढ़ा था कि कलयुग में एक पिता को अपनी वयस्क पुत्री के साथ, एक माँ को वयस्क पुत्र के साथ और वयस्क भाई-भगिनी को भी एकांत में नहीं रहना चाहिए. साथ में समाज में भी उन्हें सभ्यता अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए. बाक़ी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व समाज के खुलेपन के नाम पर….. डू व्हाटएवर यू वॉंट टू डू.

– सुकेत राजपाल त्यागी

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