दरवाज़ा बंद तो बीमारी बंद नहीं होगी, बढ़ेगी

एक तरफ वह भारत है, जहां पाव भर पानी के लिए लाखों बच्चे मां की गोद में मरते हों और एक तरफ यह इंडिया है, जहां पाव भर पेशाब को धोने के लिए 15 लीटर पानी बहाया जाता है. इन दोनों हिंदुस्तान की तुलना है क्या?

सरकार बहादुर आर.ओ. का पानी पीते हैं या बिसलेरी का. बिसलरी की बोतल से तो आदमी की प्यास बुझाई जा सकती है. लेकिन मैं तो गोपाल हूँ, गाय कितनी बिसलरी की बोतल पीएंगी. बिसलरी की बोतल से तो हमारी बकरी की प्यास भी नहीं बुझ सकती है, तो बिसलरी की बोतल से भैंस, गाय और बैल की प्यास कहां से बुझा दोगे.

पंचतारा होटल है, राजा-रानी जाते हैं, एक रात के लिए रहते हैं, हजारों लाखों रुपया किराया देते हैं, एक बार शौचालय जाते हैं, पेशाब करते हैं, फ्लश खींचते हैं, 15 लीटर पानी जाता है. दूसरी तरफ इस 15 लीटर पानी के लिए 85,000 गांवों के गरीब पांच किलोमीटर दूर पानी के लिए दौड़ते हैं.

एक शहरी संस्कृति में एक आदमी रोज 200 लीटर पानी खर्च करता है, दूसरी तरफ हरियाणा, पंजाब, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश के इलाके में चले जाओ, जहां एक आदमी को 10 लीटर पानी भी नहीं मिल पाता है.

एक मां, एक गगरी पानी पांच किलोमीटर से लाती है और उसी पानी को पीकर वह बच्चों को भी पिलाती है और अपना काम चलाती है. मां गगरी लेकर जाती है, पानी लेकर आती है, जब तक वापिस आती है, तब तक पानी के बिना लाखों बच्चों के प्राण छूट जाते हैं.

भारत के 120 करोड़ लोग रोज 120 करोड़ किलो टट्टी करते हैं. अगर सब फ्लश वाले टॉयलेट में करे तो 480 करोड़ लीटर पानी सिर्फ़ फ्लश में खर्च होगा. फिर वो 480 करोड़ किलो पानी 120 करोड़ किलो टट्टी लेकर नदियों में मिल जाएगा. रोज. पता नही कौन सी स्कीम है ये दरवाजा बंद करो बीमारी बंद वाली. मेरे हिसाब से तो खुली हवा में खेत में निबट लेना सबसे सस्ता टिकाऊ इकोफ्रेंडली उपाय था.

हमने घर में ही पैथोजेन यानि बीमारी पैदा करने वाले कारकों के लिए हॉट स्पॉट बना दिये हैं. पॉटी के टेंक में हानिकारक बैक्टीरिया, कृमि आदि डायरिया, हैजा हिपेटाइटिस, पीलिया जैसे जलजनित रोगों को जन्म देते हैं. ध्यान रहे कि लाखों बच्चे हर साल डायरिया से मर जाते हैं. और यह water borne bacteria आते कहाँ से है, इन्ही हॉट स्पॉट toilets और शौचालय से.

और फिर हाँ आजकल एंटीबायोटिक तो लोग इसे ले रहे जैसे कोई मजाक चल रहा है. नार्मल फीवर में एंटीबायोटिक, मतलब कुछ भी हो एंटीबायोटिक तो पकड़ा ही देते है फर्जी डॉक्टर.

फिर बैक्टीरिया superbug नहीं बनेंगे तो क्या बनेंगे. WHO की एक report ( 2 मार्च 2017) के अनुसार दिल्ली के घरेलू पानी में NDM11 जैसे खतरनाक सुपरबग की 12 स्ट्रेन्स पाई गईं.

समाधान है तालाब जो आज भी खरे

लेकिन तालाब एक बड़ा शून्य है अपने आप में. तालाब पशुओं के खुर से बन गया कोई ऐसा गड्ढा नहीं कि उसमें बरसात का पानी अपने आप भर जाए. इस शून्य को बहुत सोच-समझकर, बड़ी बारीकी से बनाया जाता रहा है. छोटे से लेकर एक अच्छे बड़े तालाब के कई अंग-प्रत्यंग रहते थे. हरेक का अपना एक विशेष नाम भी. तालाब के साथ-साथ यह उसे बनाने वाले समाज की भाषा और बोली की समृद्धि का भी सबूत था. पर जैसे-जैसे समाज तालाबों के मामले में गरीब हुआ है, वैसे-वैसे भाषा से भी ये नाम, शब्द धीरे-धीरे उठते गये हैं.

तालाबों की कहानी बहुत पुरानी है. पानी से भरे, छमाछम बारिश से भरते तालाब, कितने अनजाने हाथों, अनचीन्हे नामों द्वारा निर्मित तालाब, अच्छे-अच्छे लोगों के अच्छे-अच्छे काम के गवाह तालाब आज भी हमारे देश के कोन-कोने में पाए जाते हैं. विस्मृत लोगों द्वारा निर्मित सुंदर और सुरक्षित तालाब आधुनिक काल में निरन्तर जर्जर होते जा रहे हैं.

हम ज्यों-ज्यों विकासशील होते गए, आधुनिकता के नाम पर प्राचीन वैज्ञानिक तरीकों का भी विरोध करते गए और अनुभव बहुलता के देश में अनुभव कृपणता का शिकार हो गए.

अनुपम मिश्र कहते हैं “एक बंजारा यहाँ आया और विशाल सागर बनाकर चला गया लेकिन नए समाज की ये साधन संपन्न संस्थाएँ इस सागर की देखभाल तक नहीं कर पाई. आज सागर तालाब पर ग्यारह शोध -प्रबंध पूरे हो चुके हैं, डिग्रियाँ बंट चुकी हैं पर एक अनपढ़ माने गए बंजारे के हाथों बने सागर को पढ़ा लिखा माना गया समाज बचा तक नहीं पा रहा है.”

तालाबों का निर्माण कोई रूखी-सूखी प्रक्रिया नहीं है. नक्श निर्माण से लेकर तालाब के लिए स्थान चुनने की प्रक्रिया के मध्य आपस में मिलने, बतियाने से लेकर गीत गाने का क्रियाकलाप लगातार चलता रहता है. नायक को सिर्फ तालाब ही नहीं खोदना है बल्कि उन उत्सुक आँखों में छिपी चमक की भी रक्षा करनी है. उस चमक को और अधिक उमगने देना है-पानी की जल धारा के साथ. जब तालाब बनेगा और बने रहने की मजबूती प्राप्त कर लेगा तब उस चमक का विस्तार हजारों आँखों और मनों तक होगा. इसीलिए तो निर्माण के दौरान अमृत जैसा मीठा पानी (पानी और गुड़ मिलाकर) सभी को पिलाया जाता है ताकि मीठे पानी जैसा मीठा परिणाम आ सके. तभी तो ”अमृत’ का ‘सर’ बनेगा.

तालाब निर्माण की तकनीक जो प्रचलित थी हमारी प्राचीन ग्रामीण सभ्यता में.
कुछ आप भी सोचिये और बताइये.

अन्नादभवन्ति भुतानि, पर्जन्यादन्न संभवः, यज्ञादभवति पर्जन्यो यज्ञ कर्म समुद्धभव”

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