राहुल गांधी नहीं, बल्कि मूर्ख हैं उनके मीडिया सलाहकार

सत्तर के दशक में शारदा प्रसाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मीडिया सलाहकार हुआ करते थे… शारदा प्रसाद वो व्यक्तित्व थे जो इंदिरा गांधी के भाषण से लेकर मीडिया में क्या बोलना है और क्या नहीं तक का निर्धारण करते थे…

इंदिरा गांधी ने लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद प्रधानमंत्री का पद भार संभाला… और वो भारतीय राजनीति में सबसे सशक्त और कड़े निर्णय लेने वाली नेता के रूप में उभरीं…

ये शारदा प्रसाद ही थे जिन्होंने इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी के मीडिया सलाहकार का पद संभाला… वो भी तब जब राजीव गांधी को भारतीय राजनीति की abcd भी नहीं पता थी…

इसके बावजूद राजीव गांधी का हर भाषण बेहद संतुलित हुआ करता था… वो इसलिए क्योंकि उनका भाषण शारदा प्रसाद के नेतृत्व में ही तैयार होता था…

आपको बता दूं… शारदा प्रसाद कोई गांधी परिवार के चमचे या तलवे चाटने वाले नहीं थे… शारदा प्रसाद इंडियन एक्सप्रेस जैसे प्रतिष्ठित अखबार के सीनियर जर्निलिस्ट थे… वो प्लानिंग कमीशन के आधिकारिक मुखपत्र ‘योजना’ के एडिटर भी रहे…

इसके बाद साठ के दशक के उत्तरार्ध में इंदिरा गाँधी ने उन्हें अपना मीडिया सलाहकार नियुक्त कर लिया… इंदिरा गांधी के मीडिया सलाहकार रहते हुए उन्होंने भारत की दो महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना में अपना योगदान दिया… ये दो संस्थाएं थी इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ डिजाईन…

शारदा प्रसाद ने एक अपना एक लम्बा समय गांधी परिवार को दिया… और ये शारदा प्रसाद की ही देन थी जो उन्होंने राजनीतिक रूप से अपरिपक्व राजीव गांधी को भारतीय राजनीति का पप्पू बनने से बचा लिया… अन्यथा राजीव गाँधी भारतीय राजनीति में तब केवल खिलौना बन कर रह गए होते…

अपने इसी योगदान के लिए शारदा प्रसाद को 1999 में पद्मभूषण जैसे बड़े नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया… 2008 में इस महान व्यक्तित्व का 84 वर्ष की उम्र में निधन हो गया…

अपने पूरे करियर में शारदा प्रसाद जी ने इंदिरा और राजीव गाँधी के लिए सैकड़ों भाषण लिखे होंगे… लेकिन आज तक हमें उनका एक भी भाषण ऐसा नहीं मिला जो भारत की अखंडता को चुनौती देता हो… जो भारत को तोड़ने की बात करे…

आज 21वीं शताब्दी में गांधी परिवार की अगली पीढ़ी राजनीति में सक्रिय है… सोनिया, राहुल और प्रियंका वाड्रा… प्रियंका और सोनिया को हटा दें तो अब सम्पूर्ण कांग्रेस का भविष्य राहुल गांधी पर ही टिका है…

वही राहुल गांधी जिन्हें आज सोशल मीडिया से लेकर मेन स्ट्रीम मीडिया ने हंसी का पात्र बना दिया है… आपको क्या लगता है राहुल गांधी क्या इतने मूर्ख हैं जो उन्हें सही गलत का ज्ञान नहीं है? क्या राहुल गाँधी में सेन्स ऑफ़ ह्यूमर नहीं है? क्या राहुल गांधी अभी भारतीय राजनीति में बच्चे हैं?

हम आप कितनी भी आलोचना करें लेकिन कोई इंसान हर समय गलत और बेवकूफ नहीं हो सकता… यकीनन इस गुजरात और हिमाचल के चुनावों में राहुल गांधी ने खुद में बदलाव किया है…

इन चुनावों में वो एक परिपक्व नेता बन कर उभरे हैं… पूरे चुनावों के दौरान उन्होंने एक बार भी प्रधानमंत्री के लिये किसी भी प्रकार की अमर्यादित भाषा का प्रयोग नहीं किया है…

सोशल मीडिया पर लोग राहुल गांधी को दिन भर क्या क्या बोलते रहते हैं… पप्पू… युवराज… बकलोल… मंदबुद्धि… और ना जाने क्या क्या…

क्या राहुल गाँधी ये सब कुछ नहीं देखते होंगे? या उन्हें पता नहीं होगा कि लोग उनके बारे में क्या सोचते है? लेकिन धैर्य और सहनशीलता उनके अंदर प्रचुर मात्रा में हैं… ये बात हम सबको माननी पड़ेगी…

और ये बात भी माननी पड़ेगी कि गुजरात और हिमाचल के चुनावों में बीजेपी भले जीत जाए… लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि राहुल गाँधी ने अकेले ही कांग्रेस में मोर्चा संभाला हुआ है…

गुजरात जैसा राज्य जो बीजेपी का गढ़ माना जाता था वहां भी बीजेपी को अपनी हार की चिंता सताने लगी, वो भी एक मंदबुद्धि नेता की वजह से, जिसे हम लोग राष्ट्रीय पप्पू समझते हैं?

राहुल गाँधी का वैचारिक रूप से मैं विरोधी हूँ… मैं क्या हर राष्ट्रवादी विरोधी है… लेकिन आप इस बात को मानिये कि राहुल गांधी मूर्ख नहीं है बल्कि उनके मीडिया सलाहकार मूर्ख हैं… हर कोई इंदिरा गांधी के मीडिया सलाहकार शारदा प्रसाद जैसा नहीं हो सकता…

राहुल गाँधी के भाषण कौन लिखता है जिसकी वजह से हर बार उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है? राहुल गांधी को अपने मीडिया सलाहकार के चयन में गंभीर और शारदा प्रसाद जैसे विद्वानों को रखना चाहिए. फिर देखिएगा कांग्रेस एक सकारात्मक विपक्ष की भूमिका प्रभावी ढंग से निभा पाएगी… क्योंकि लोकतंत्र में अगर विपक्ष कमजोर हो तो लोकतान्त्रिक व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है.

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