काश्मीरीय शैव-दर्शन : भाग 4

पुस्तक के अंश जो मैं डाल रहा हूँ, मेरा स्वाध्याय और प्रार्थना भी साथ साथ चल रहे हैं. ये अंश जितने में भी समझ आ जायेगा, उतने से ही भारतवर्ष के पूर्व के किये सत्कर्म से बना आधार भी दृष्टिगत होने लगेगा.

इतना सस्ता कुछ नहीं होता, हम मनुष्यों के साथ एक समस्या तो होती है, जैसे तैसे काम निकल जाए बस, मेड सिम्प्लीफाइड वाले युग के हैं.

पर ये समझ लेना चाहिए कि गोपीनाथ जी जितने उदाहरण देकर चल रहे हैं, वो केवल लिटरेचर के हिसाब के उदाहरण नहीं हैं. ये अकेले में किये जाने वाले प्रयोग तो कतई नहीं हैं. ये एक लिविंग सोसाइटी, जिसने कर्म से परिवेश दिया हो, वहीं ये विचार कर्मरूप में फलित हो सकता है.

हम विश्वगुरु इसीलिए कहलाये जाते हैं. इसे गौर से पढ़ने को रिकमेंड कर सकता हूँ, निर्दोष मन से तीव्र आलोचना वाली लेखनी है. बहुत कुछ इशारा करती है भारतवर्ष की थाती का. हम फास्टफूड वाले युग के सही, कभी कभी तो ध्यान दे सकते हैं.

मेरी मेहनत तो लगी है टीपने में भी, विशेषकर संस्कृत वर्तनी के शब्द नहीं मिल पाए जैसे ज्ञ पर ओ की मात्रा. मैं वैसे भी रोमन लिपि में टाइप करता हूँ. अच्छी स्पीड है तब भी.

प्रातः स्मरणीय, वंदनीय श्री म. महो. गोपीनाथ जी कविराज की पुस्तक का तीसरा अंश, गतांक से आगे

 

6. प्रत्यभिज्ञा-दर्शन में ज्ञान और भक्ति का सामंजस्य

इस अद्वयवाद में एक और विशेषता यह है कि यह न तो शुष्क ज्ञानमार्ग है और न ज्ञानहीन भक्तिमार्ग ही, इसमें ज्ञान और भक्ति दोनों का सामंजस्य है. शंकर द्वारा प्रवर्त्तित अद्वैतवाद की चरमावस्था में भक्ति का स्थान नहीं है. शंकर के मत से भक्ति द्वैतमूलक है, इसी कारण अद्वैतावस्था में ज्ञानाविर्भाव में इसकी सत्ता नहीं रहती है.

कहने की आवश्यकता नहीं कि यह साधनरूपा अज्ञान-मूलक भक्ति है. परन्तु, जो अद्वैत-भक्तिरूप पदार्थ है, वह शास्त्र और महात्माओं के अनुभव से जाना जा सकता है. यह नित्य पदार्थ है. साधारणतः जिसे हम मोक्ष कहते हैं, वह वस्तुतः इस नित्यसिद्ध ज्ञान-भक्ति का ही आवरणभंग-जनित समुन्मेष-मात्र है.

[काश्मीरीय शैव-दर्शन : भाग 1]

त्रिकदर्शन में इसी को चिदानंदलाभ अथवा पूर्णाहन्ता चमत्कार रूप में अभिहित किया गया है. चिदंश ज्ञान-भाव है और आनन्दांश भक्ति है. परमतत्व स्वातंत्र्यमय है; स्वतंत्रता ही पूर्णशक्ति है; इसी कारण इस मत में चरमावस्था में भी शिवशक्ति का सामरस्य ही माना गया है. शक्ति के अभाव की अथवा उसके अवास्तवत्व की कल्पना कभी नहीं की गई.

वस्तुतः शिव और शक्ति अभिन्न हैं, दोनों में भेद नहीं है और हो भी नहीं सकता. परन्तु, विश्वदृष्टि से सृष्टि और संहार की, किंवा उन्मेष और निमेष की ओर लक्ष्य देने से शक्तिप्रधान अथवा शिवप्रधान रूप से केवल एक ही परम तत्व का निर्देश किया जाता है. परंतु शक्तिप्रधान अवस्था में भी शिवभाव रहता है. क्योंकि प्रकाशमय शिवभाव में ही विमर्शात्मक शक्ति का विकास-स्वरूप विश्व प्रतिबिंबित होता है, और शिवप्रधान अवस्था में भी शक्तिभाव रहता है, विश्वबीज-शक्ति उस समय प्रकाश में विलीन रहती है.

और इन दोनों की सामरस्य अवस्था को, जहां शिव और शक्ति दोनों साम्य को प्राप्त हैं, न् शिव कहा जाता है और न् ही शक्ति कहा जाता है; परन्तु दोनों ही भाव वहां एकाकार में विद्यमान रहते हैं. यही परमभाव है. हमारे दर्शनों में इसे सर्वभाव की प्रतिष्ठा के रूप में वर्णन किया गया है.

[काश्मीरीय शैव-दर्शन : भाग 2]

यहां चिदंश शिवभाव और आनन्दांश शक्तिभाव परस्पर मिले हुए हैं, इसी कारण यह ज्ञान-भक्ति की सामंजस्य-अवस्था है. यह याद रखना चाहिए कि पूर्वोक्त शिव और शक्ति तथा यह सामरस्य दोनों ही नित्य हैं, केवल एक ही पदार्थ की दो दिशाएं हैं.

कहा जाता है कि *षट् पंजरिकास्तोत्र* श्रीशंकराचार्य का रचा हुआ है. उसमें है –

*सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्.*
*सामुद्रो हि तरङ्ग:क्वचन समुद्रो न तारङ्ग:.।*

यदि यह श्लोक वस्तुतः शंकर का ही है, तो यह कहना पड़ेगा कि वह अद्वैत-भक्ति का प्रचार करते हैं. “सत्यपि भेदापगमे” इस वाक्यांश की योजना के द्वारा समझा जा सकता है कि उनका अभिप्राय, भेद दूर हो जाने पर भी, “मैं तुम्हारा हूँ”, यह कहने का है. सुतरां अभेद-अवस्था में भी “मैं तुम्हारा हूँ”, का भाव रह सकता है.

[काश्मीरीय शैव-दर्शन : भाग 3]

कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह दास्यात्मक भक्तिभाव ही है. यद्यपि ज्ञान के द्वारा “तुम और मैं” का वास्तविक भेद मिट जाता है, तथापि पराभक्ति के प्रभाव से उस अद्वैत-समुद्र में भी कल्पित भाव-द्वैत की लहरी उठती है. यह द्वैत वस्तुतः द्वैत नहीं है, इसलिए इस अवस्था की भक्ति को अद्वैत-भक्ति कहना असंगत नहीं है. यही नित्यभाव है.

बोधसार में (पृ• 200-201) नरहरि कहते हैं –

*द्वैतं मोहाय बोधात्प्राक् प्राप्ते बोधे मनीषया.*
*भक्त्यर्थ कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुंदरम्.।*
*जाते समरसानन्दे द्वैतमप्यमृतोपमम्.*
*मित्रयोरिव दम्पत्योर्जीवात्मपरमात्मनो:.।*

अद्वैतभक्ति क्या है तथा उसके स्वरूप की प्राप्ति कैसे होती है, यह विवरण यहां प्रयोजनीय नहीं है. नारायणतीर्थ अपनी भक्तिचन्द्रिका नामक शांडिल्य-सूत्र के भाष्य में इस भक्ति की विस्तारपूर्वक व्याख्या करते हैं तथा अन्य भी अनेक स्थलों में इसका प्रसङ्ग मिलता है.

त्रिपुरारहस्य ज्ञानखण्ड (20वाँ अध्याय, श्लोक 33-34) में है – प्रकाशसार परम तत्व को अपरोक्ष रूप में आत्माभिन्न-भाव में साक्षात्कार करने पर भी कोई-कोई परम भक्त प्रेमपूर्वक उसकी सेवा किया करते हैं. सेवा करने के लिए सेव्य-सेवकभाव होना आवश्यक है, अद्वयावस्था में यह भाव किस प्रकार संभव हो सकता है? इसलिये कहा गया है कि भेवभाव अवलम्बन करके सेवा की जाती है.

निश्चय ही यह आहार्य-भेद है, वास्तविक भेद नहीं है. जहां परम तत्व साम्य-स्वरूप है वहाँ तो भेद है ही नहीं, वह तो सब अवस्थाओं का सन्धि-स्थल है. परन्तु, इस भेद के आहरण करने का प्रयोजन क्या है ? प्रयोजन और कुछ भी नहीं है, है केवल रुचिभेद, ‘स्वभाव का स्वरस’…

*यत् (अर्थात परं पदं प्रतिभात्मकम्) सुभक्तैरतिशयप्रीत्या कैतववर्जनात्.।33।।*

*स्वभावस्य स्वरसतो ज्ञात्वाsपि स्वाद्वयं पदम्.*
*विभेदभावमाहृत्य सेव्येतेsत्यन्ततत्परै:.।34।।*

इससे ज्ञात होता है कि ज्ञान के अनंतर भी भक्ति रह सकती है. यह कैतवहीन होने के कारण सुभक्ति है. अज्ञानमूलक द्वैत या साधनभक्ति के समान स्वार्थानु-संधानात्मिका नहीं है. अद्वैत भक्ति के पक्ष में भी एक भेद आवश्यक है, यह कल्पित और ज्ञानपूर्वक होती है. परन्तु, एक बात है, ज्ञान के बाद यह अद्वैतभक्ति सभी के होती हो, ऐसी बात नहीं है. जिसका हृदय स्वभावतः भक्ति-प्रवण है, उसी के अद्वैतभक्ति का उदय होता है, ज्ञानार्थी को ऐसा नहीं होता.

किंतु, उदित हो या न हो, अंत में ज्ञान और भक्ति एकाकार हो ही जाते हैं. जिसे पूर्णाहन्ता या स्वात्म-चमत्कार कहा जाता है, वही ज्ञान की सीमा और वही प्रेम की भी पराकाष्ठा है. इसीलिए, समन्वय-भूमि है. यहीं से दोनों स्रोत प्रवाहित होते हैं.

त्रिकदर्शन में दास्यात्मक भक्ति ही स्वीकार की गई है. भगवान प्रभु, पिता अथवा गुरु हैं, भक्त दास, पुत्र अथवा शिष्य. केवल त्रिकदर्शन में ही नहीं, शैवागम मात्र में ही इसी भाव की प्रधानता दीख पड़ती है. वीर शैवादि मत में भी यही सिद्धांत स्वीकृत देखा जाता है.
*(मायिदेवकृत ‘अनुभवसूत्र’ देखिए)*

शाक्तागम में भी मूलतः इस विषय में कोई भेद नहीं दिखाई देता. हाँ, पितृ भाव की जगह उसमें मातृ भाव की कल्पना की जाती है, यही विशेषता है. परन्तु, इस भावत्रयी में दास्यभाव ही मूलभूत है, अतः इसी का प्राधान्य बतलाया गया है.

कहने की आवश्यकता नहीं है कि भक्ति का मूलतत्व ही दास्यभावाश्रित है, इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा. शांत-भक्ति भक्ति की एक स्फुरण-अवस्था-मात्र है. किंचित विकसित होते ही उस पर दास्य-भाव का रंग चढ़ जाता है. अद्वैत से द्वैत की तरंग इसी भाव में उठती है. फिर, चाहे कितना ही विकास हो, यह रंग नहीं छूटता.

यद्यपि गौड़ीय वैष्णव प्रभृति संप्रदायों में सख्य, वात्सल्य, और माधुर्य भाव भी माने गए हैं, तथापि ये सत्य है कि सभी भावों के मूल में यही दास्यभाव अनुस्यूत है. भूत-सृष्टि में जिस प्रकार वेदान्त के अनुसार आकाश से वायु, वायु से अग्नि, इत्यादि क्रम से पृथ्वी का आविर्भाव होता है, रस-विकास में भी इसी प्रकार शांत से दास्य, दास्य से सख्य इत्यादि क्रम से उत्तरोत्तर रसपुष्टि होती है.

आकाश का अपना गुण शब्द है; वायु के उत्पन्न होने पर शब्द-गुण की तो प्राप्ति होती है, इसके अतिरिक्त उसका अपना गुण स्पर्श भी विकसित हो उठता है. इसी प्रकार, क्रमशः एक-एक गुण बढ़ते रहते हैं और पूर्व् गुण क्रमशः अनुवृत्त हो जाते हैं. इसीलिए पृथ्वी में पांचों भूतों के गुण हैं, इनमें से शब्दादि चार उसके समागत सामान्य गुण हैं, गंध उसका विशेष गुण है.

इसी प्रकार भाव के क्रम विकास के विषय में भी समझना चाहिए. शांत भाव का विशेष गुण निष्ठा दास्यभाव में अनुवृत्त होती है और उसका अपना गुण सेवा भी उसी समय विकसित हो उठता है. सख्य में शांत और दास्य दोनों प्रकार के गुण अनुवृत्त होते हैं, तथा अपने गुण असंकोच का भी विकास होता है. इसी प्रकार, माधुर्य में सभी रसों के गुण अर्थात निष्ठा, सेवा, असंकोच, लालन वर्तमान रहते हैं और इनके अतिरिक्त उसका विशेष गुण आत्म-समर्पण भी स्फूर्त हो उठता है.

त्रिकदर्शन दास्यात्मक भक्ति को मानकर भक्ति के मूल-तत्व को ही मान लेता है. पर, केवल मूल को ही मानता हो, सो बात नहीं, भक्ति के चरम फल -माधुर्य प्रेम–को भी @#$$ रूप में स्वीकार करता है. परन्तु याद रखना चाहिए कि यह भक्ति अज्ञानमूलक द्वैतभाव से उत्पन्न नहीं होती है. यह परिस्फुटित अद्वैत की एक अवस्था है और एक हिसाब से यह परिस्फुटित द्वैत-अवस्था भी है — परंतु यह अलौकिक “द्वैत” है, *यही विशेषता है*.

इसलिए यहां एक ही साथ ज्ञान और भक्ति का, चित् और आनंद का समावेश दिखलाई पड़ता है. इसी का नाम शिवशक्ति का सामरस्य है. यह रसतत्त्व ही ऐक्य और वैचित्र्य का पूर्ण सामंजस्य है. यह रस “ब्रह्मानंद” से विलक्षण और विशिष्ट है. ब्रह्मानंद में आस्वादन नहीं, चर्वण नहीं, अहंभाव नहीं, त्रिपुटी नहीं, परंतु रस में सभी कुछ है, पर अलौकिक है.

पूर्णाहन्ता का चमत्कार ही रसबोध है – इसमें अभेद में भी अलौकिक भेद है, नहीं तो आस्वादन ही नहीं हो सकता. परंतु, यह भेद लौकिक भेद के समान नहीं है, यह वैकल्पिकमात्र है. अभिनवगुप्ताचार्य ने नाट्यशास्त्र की अभिनवभारती नामक टीका में रसतत्व की जो प्रत्यभिज्ञा-दर्शनानुसार आलोचना की है, उसमें रस का स्वरूप बहुत कुछ परिष्कृत हो गया है.

प्रश्न हो सकता है कि यह रस केवल शान्तरस है अथवा दास्य भी है. इस प्रश्न का समाधान, पहले जो कुछ कहा जा चुका है, उससे हो जा सकता है. भक्ति के मूल में दास्यभाव रहेगा ही. शांतभाव को भक्ति का बीजभाव कहा जा सकता है सही, किंतु वह परिस्फुट भक्ति नहीं है.

दास्यबोध जब तक नहीं हो जाता, अपने को एक अनंत वस्तु के साथ अभिन्न जानकर भी जबतक तदाश्रित रूप से बोध नहीं हो जाता, तबतक भक्ति राज्य का आरंभ ही नहीं होता. शांतभाव इसी का सूत्रपात करता है. किंतु, यह अनंत वस्तु अपने आत्मा से भिन्न और कुछ नहीं है. इसी से जिस ब्रह्मभाव से शान्तरस और तदनंतर दास्यादि का आविर्भाव होता है, शांत दास्यादि में वही ब्रह्मभाव अनुवृत्त रहता है; परन्तु उसी के ऊपर शुद्ध अप्राकृत सत्त्व की लहर क्रीड़ा करती है.

अंधकार दबा रहता है, आलोक के वक्ष:स्थल पर आलोक की ही तरंगें नाचा करती हैं. यह तरंग ही “उल्लास” या रस है. इसका वैचित्र्य ही लीला-विस्तार है. यह तरंग शुद्ध स्वरूप में सदा वर्तमान रहती है, इसीलिए वैष्णवों के समान शैव भी नित्य लीला मानते हैं. इसीलिए, क्षेमराज ने अपनी स्तवचिंतामणि-टीका पृ• 60-61 में शिव को –

*”कैलासादिषु नित्यप्रवर्त्तमानप्रमोदनिर्भरक्रीड़ामयं लोकोत्तरप्रभावं विस्तारयित्रे.”*

कहा है. परंतु कोई कोई पुरुष, विशेषतः आलंकारिकगण भक्ति को रस-स्वरूप नहीं मानते हैं. काव्यप्रकाशकार मम्मट, रसगंगाधर के कर्त्ता पंडितराज जगन्नाथ प्रभृति आलंकारिकों ने भक्ति को भावकोटि में ही डाल दिया है. परंतु, इससे कोई विरोध नहीं आता है.

साहित्यसार-कर्त्ता अच्युतराय ने दिखलाया है कि गीता जी के *’अद्वेष्टा सर्वभूतानां’* से *’यो मद्भक्तः स मे प्रियः’* पर्यंत के वाक्यों से जाना जाता है कि मुख्य भक्ति जीवन्मुक्ति का ही नामांतर है. जीवनमुक्ति विवेक में विद्यारण्यस्वामी भी यही कहते हैं –

*”जीवनमुक्तिः स्थितप्रग्यो विष्णुभक्तश्च कथ्यते.”*

इस दृष्टि से भक्ति कुछ कुछ शान्तरस के अन्तर्गत हो जाती है. इसीलिए आलंकारिक भक्ति को स्वतंत्र रस नहीं मानना चाहिए. अर्थात, मुख्य भक्ति को रस मानने में आलंकारिक असम्मत नहीं है, किंतु वे उसे शान्तरस से पृथक मानने का कोई कारण नहीं देखते हैं.

दूसरी ओर भक्तगण जो कुछ कहते हैं, वह भी सत्य है. वे कहते हैं कि भक्ति जब अद्वैत-आत्मतत्व-विषयक वृत्ति-विशेष करते हैं, तब उसके रसत्व का अस्वीकार नहीं किया जा सकता. साहित्यसार के टीकाकार ने स्पष्ट शब्दो में कहा है कि भक्ति मुख्य और गौण, अथवा परा और अपरा भेद से दो प्रकार की हैं.

अलंकारशास्त्र में भक्ति मुख्य भक्ति शान्तरस के अंतर्गत है और गौणभक्ति भावमात्र है. भक्तिशास्त्र में शान्तरस स्वयं ही भक्तिविशेष है और मुख्यभक्ति तो रस स्वरूपा है.

शांडिल्य और नारद ने अपने भक्तिसूत्रों में, मधुसूदन सरस्वती ने भक्ति रसायन में और श्रीरूपगोस्वामी ने भक्तिरसामृत-सिंधु में भक्ति के रसत्व का उपपादन किया है. यहां उन सबकी आलोचना आवश्यक नहीं है. यहां केवल इतना ही कहना यथेष्ट होगा कि प्रत्यभिज्ञा-दर्शन के आचार्यों ने भक्ति को रस के रूप में स्वीकार कर अध्यात्म-राज्य के एक गंभीर तत्व को प्रकट कर दिया है. उत्पलाचार्य अपनी शिव स्तोत्रावली के प्रथम स्तोत्र में कहते हैं –

*जयन्ति भक्तिपीयूषरसासववरोन्मदा:.*
*अद्वितीया अपि सदा त्वद्द्वितीया अपि प्रभो.।*

परा भक्ति की यही विशेषता है कि इस अवस्था में दूसरे के न् होते हुए भी दूसरा रहता है. नदिया के श्रीगौरांग महाप्रभु ने इसीलिए अचिन्त्य-भेदाभेद-तत्व का प्रचार किया. *जो यह समझते हैं कि दो होने से ही मिथ्या हो जाएगा, उन्होंने पूर्ण सत्य के केवल एक उपदेश मात्र को देखा है.* अज्ञान के नष्ट हो जाने पर भी, ऐक्य स्फुरण होने पर भी, उस ऐक्य की गोद में दो रह सकते हैं, यद्यपि वे दोनों ही एक का ही शुद्ध भाव में आत्मप्रसारण है –

*नाथ वेद्यक्षये केन न् दृश्योsस्येकक: स्थितः.*
*वेद्यवेदकसंक्षोभेsप्यसि भक्तै: सुदेर्शन:.।*

अन्तरमुखावस्था में कुछ भी जानने योग्य न् रह जाने पर भी एक के रूप में जिसका स्फुरण होता है, ज्ञेय और ज्ञाता के इस संक्षोभ में – इस वैचित्र्य में भी भक्तगण समावेश की अधिकता के कारण उसी को देखते हैं. जो विश्वातीत है, वही तो विश्वात्मक भी है और दोनों समकाल में ही हैं. इसीलिए ज्ञान और भक्ति जहां समरस है, वहां विश्वातीत और विश्वात्मक समभाव में ही प्रकाशमान है. यहीं द्वैताद्वैत का सामंजस्य होता है. यही ईश्वराद्वय की विशिष्टता है.

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