किरदारों के बाहर

कहानी के
किरदारों के बाहर खड़ा हो कर देखती हूँ
तो मंद -मंद मुस्कुराती हूँ

एक लड़की भगवद्गीता गीता पढ़ती है
और सोचती है
जब सब फ़िज़ूल है
किसी बात के कोई मायने नहीं
अंत कुछ भी नहीं
तो क्यूँ न अभी मर जाया जाए

एक लड़की ‘मिली’ पिक्चर देखती है
अपने बाबू जी की छाती पे सर रख कर चुपके-चुपके रोती है
ऐसे कैसे बिछुड़ सकता है किसी से कोई
कभी बाबू जी नहीं रहेंगे
यह ख़ौफ़नाक ख़्याल सिहर जाता है उसे

एक लड़की माँ बनती है पहली बार
बेइंताह दर्द से गुज़रती है
सोचती है
फिर कभी नहीं बनेगी माँ
एक बच्चा ही काफ़ी है
कुछ साल बाद भूल जाती है सारा दर्द

एक लड़की बहुत डरती है अकेलेपन से
सहती रहती है सब ज़्यादतियाँ
सिर्फ़ एक स्पर्श की ख़ातिर
एक मीठे बोल की ख़ातिर
अपनी हद से गुज़र जाती है

वही लड़की लड़ती है अपना महाभारत
अकेले
अपने मन में, तन में, घर में
अर्जुन भी ख़ुद, कृष्ण भी ख़ुद
कहती है
बाबू जी जाओ, आराम से जाओ
बहुत दुःख भोग लिए
बहुत जी ली ज़िंदगी

अपनी बेटी को समझाती है
माँ बनना कितना ज़रूरी है
पूरी औरत बनने के लिए

अकेलापन रास आ गया है उसे
अपने आनंद में है, शांति में है
कोई ख़ौफ़ नहीं
किसी के साथ रहना बड़ा बे-आराम कर जाता है

भगवद्गीता गीता पढ़ती है
आँखें मूँद एक-एक शब्द ग्रहण करती है
सोचती है संस्कृत सीख लूँ तो मूल ग्रंथ पढ़ पाऊँगी

ज़िंदगी ड्रामा ही सही, शोर-शराबे से भरी ही सही
पर बेमतलब बिलकुल नहीं है
हमारी रूहें ख़ुद चुनती हैं अपनी ज़िंदगी, जैसी भी
ख़ुद को विकास के कुछ पायदान और ऊपर ले जाने के लिए
अंत अपने मूल में मिल जाने के लिए…

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