राहुल गांधी ने गुजरात चुनावों को लेकर आखिर तैयारी की ही क्या थी?

एग्ज़िट पोल के आंकड़ों पर अब तक कुछ नहीं लिखा. क्योंकि ओपिनियन पोल और एग्ज़िट पोल के आंकड़े मुझे तनिक भी उत्साहित नहीं करते. ओपिनयन पोल को तो मैं वैसे भी फिक्स्ड और चुनाव प्रचार का एक तरीका मानता हूं.

एग्ज़िट पोल भले ओपिनियन पोल से थोड़े अलग होते हैं, फिर भी ये महज एक भविष्यवाणी से अधिक कुछ नहीं होते.

बहरहाल, कल से ही लगभग सभी चैनलों और एजेंसियों के पोल नतीजे देख चुका हूं. दोनों राज्यों में लगभग सभी ने भाजपा की सरकार बनते हुये दिखाया है.

हिमाचल में तो पहले से भी यह कहा जा रहा था, लेकिन गुजरात में तीन दौर के ओपिनियन पोल के बाद भाजपा और कांग्रेस की कांटे की टक्कर बताई जा रही थी, तो एग्ज़िट पोल में इसके ठीक उलट नतीजे आये.

इसके बाद कांग्रेस चुनाव आयोग, ईवीएम, वीवीपैट से लेकर टीवी और मीडिया तक को बायस्ड घोषित करने में लगी है.

दो दिन बाद नतीजे क्या होंगे, इसके बारे में मुझे एग्ज़िट पोल का सहारा लेने की जरुरत नहीं. मैं कांग्रेस की दुर्गति पहले से देख रहा था और अब भी उस पर कायम हूं.

दरअसल पिछले चौबीस घंटों से अधिक समय से हर जगह बस इस बात की चर्चा है कि कांग्रेस और राहुल गांधी आखिर कहां चूक गये? लेकिन कोई भी यह नहीं बता रहा है कि राहुल गांधी ने गुजरात चुनावों को लेकर आखिर तैयारी ही क्या की थी, कि चूकने पर चर्चा हो रही है.

बेशक इस चुनाव प्रचार में राहुल गांधी कुछ बदले हुये नज़र आये. विश्लेषकों ने इसे रेखांकित भी किया कि इस बार उनकी बॉडी लैंग्वेज बदली हुई नजर आ रही है और वह पहले से ज्यादा मैच्योर नजर आ रहे हैं.

लेकिन मेरा आंकलन है कि यह बदलाव व्यक्तिगत स्तर पर सिर्फ राहुल गांधी का था, न कि उनकी पार्टी का. पीआर मैनेजमेंट के बलबूते वह अपनी बदली हुई छवि गढ़ने में कामयाब रहे. लेकिन चुनाव किसी की व्यक्तिगत मेहनत से नहीं जीते जाते.

मतलब राहुल गांधी का तो गुजरात में मेक ओवर हो गया, लेकिन क्या कांग्रेस का मेक ओवर चुनावों से पहले हुआ था?

संगठनात्मक ढांचे पर नज़र डाली जाय तो राहुल गांधी ने इस ओर अब तक कोई ध्यान नहीं दिया है. उनके अलावा प्रदेश में कांग्रेस के पहली पंक्ति के नेता राहुल के अगल-बगल दिखने में ही व्यस्त रहते हैं.

चुनाव में उनकी प्रतिद्वंदी भाजपा की तैयारियों से तुलना की जाय तो राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक ने बूथ स्तरीय कार्यकर्ताओं तक के साथ बैठकों की एक पूरी श्रृंखला संपन्न की.

गांव के एक छोटे कार्यकर्ता के उत्साह का अंदाज़ आप लगा सकते हैं जब वह अपने अध्यक्ष के साथ सीधे तौर पर मिलकर या बैठक में शामिल होकर लौटा हो.

जबकि राहुल गांधी जिला अध्यक्षों से भी मुश्किल से बैठक कर पाये. इसके कारण बहुत जगहों पर कांग्रेस के बूथ स्तर के कार्यकर्ता नदारद थे जबकि भाजपा ने बूथों में भी पन्ना प्रमुख तक बना रखे थे.

बाकी कांग्रेस के जिन बूथों पर उत्साही कार्यकर्ता थे वह अपने शीर्ष नेतृत्व के साथ अपना जुड़ाव ही नहीं महसूस कर पा रहे थे.

बाकी कोर कसर जिग्नेश और हार्दिक जैसे नौसिखियों ने पूरी कर दी. युवा जोड़ीदार और जातिगत राजनीति की पैरोकारी के तहत आरक्षण का लालच देकर राहुल गांधी इन्हें अपने साथ जोड़ने में तो कामयाब रहे, लेकिन इनके कहने पर टिकटों का बंटवारा या पहले के उम्मीदवारों में हुये फेर बदल ने सारा गणित चौपट कर दिया.

वास्तव में जिन सीटों पर कांग्रेस संगठन के रुप में थोड़ी मजबूत थी वहां भी ऐन चुनावों से पहले राहुल ने अपने नये दोस्तों की सलाह पर उम्मीदवार बदल दिये जो मूल रुप से कांग्रेस या उसके संगठन से परिचित नहीं थे. लिहाजा चुनाव में उम्मीदवार अकेला रह गया और संगठन उसकी सहायता नहीं कर सका.

वास्तव में किसी भी दल का संगठन समाज में जितनी गहरी पैठ बनाये रखता है, उसके जीत की संभावनाएं उतनी ही बढ़ जाती हैं. संगठन के मज़बूत और पार्टी के प्रति निष्ठावान रहने पर यह बात भी कोई मायने नहीं रखती कि उम्मीदवार कौन है.

मतलब संगठन के मज़बूत होने पर थोड़े कमजोर प्रत्याशी भी मैदान मार जाते हैं. जबकि लगातार हार पर हार का स्वाद चखने के बावजूद भी कांग्रेस इधर उधर की बातों के बजाय अपने संगठन की मज़बूती पर कोई ध्यान देती नहीं दिख रही है.

शायद उसकी भी मजबूरी है, क्योंकि जब पार्टी के आला नेताओं का सारा ध्यान और ज़ोर ही पहले युवराज के मेक ओवर में लगा हो, वहां नीचे के संगठन की मज़बूती पर कोई समय और ज़ोर लगाये भी तो कैसे?

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