भविष्य में किसी को कुछ समझने का मौका नहीं देगा इस ज्वाला का वृहत रूप

राजसमंद, राजस्थान में हुई दुर्घटना अपने आप मे एक विचित्र घटना है जो जहां भारत में हिन्दुओं के एक वर्ग की अहिंसा व सहनशीलता के परित्याग की उद्घोषणा है, वहीं यह हिंदुत्व द्वारा अपने अस्तित्व की रक्षा की छटपटाहट में उग्रता की स्याही से किया गया हस्ताक्षर है.

मैंने जब इस पर लिखा था और लोगों से शम्भू की धन से सहायता करने का आह्वान किया था तब लोगो ने जहां उसका समर्थन किया था, वहीं मेरे इसका समर्थन करने के विरुद्ध तीव्र प्रतिक्रिया भी हुई थी.

इस प्रतिक्रिया की तीव्रता इसी से समझी जा सकती है कि फेसबुक के कर्णधारों ने मेरी वह पोस्ट हटा दी थी और मुझे अपने होने का सबूत फेसबुक वालों को देना पड़ा था.

मुझे सेक्युलरों के विरोध की कोई चिंता नहीं है लेकिन तथाकथित राष्ट्रवादियों का इस घटना से वितृष्णा करना और हिंदुत्व की दुहाई देकर अपने धर्म की सहृदयता और समावेश करने की संस्कृति की ओट में, इस घटना के मूल को न समझ पाना ज़रूर चिंताजनक है.

यदि यह राष्ट्रवादी लोग राजसमंद को नहीं समझ पाये हैं तो उन्हें कल की उदयपुर की घटना को जरूर समझना चाहिये. यह जो शम्भू की पेशी के दिन अदालत में, भारी पुलिस व्यवस्था और उनकी तरफ से लाठी चार्ज के बाद भी, बिना किसी आह्वान के पहुँची बड़ी भीड़ ने परिसर में घुस कर वहां झंडा फहराया है, वह राजसमंद में किये गये हस्ताक्षर का साक्ष्यांकन है.

मैं कल रात से ही इस घटना को लेकर उलझा हुआ हूँ और दिमाग में 70 के दशक में देखी हुई फ़िल्म बराबर चल रही है. यह फ़िल्म स्टीफन किंग के उपन्यास पर, ब्रायन द पाल्मा निर्देशित ‘कैरी’ है जो नैतिकशास्त्र, नीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, सौहार्द्रशास्त्र और भीरुशास्त्र से बंधे हिन्दुओं को भूतकाल से निकल वर्तमान में भविष्य की झलक दिखाती है.

यह फ़िल्म कैरी नाम की लड़की कहानी जिसकी भूमिका सीसी स्पेक ने निभाई है. हाई स्कूल सीनियर में पढ़ने वाली कैरी एक सहमी हुई, संकोची व शांत लड़की है जिसकी मां अत्याचारी है और वह अपनी बेटी को कड़े बन्धनों में, दबा कर रखती है.

अपनी माँ के इस व्यवहार से कैरी का व्यक्तित्व बड़ा दब्बू हो जाता है और स्कूल में उसके सहपाठी उसे परेशान करते है. अब क्योंकि वह अपनी बात कह नहीं पाती है इसलिये उसे स्कूल के प्रिंसिपल से लेकर टीचर तक प्रताड़ित करते है.

कैरी के व्यक्तित्व में जहां यह सब दुर्बलता दिखती थी, वहीं उसके अंदर ‘टेलेकिनेसिस’ की क्षमता विकसित होती है. वह अपनी मानसिक क्षमता से वस्तुओं को हिला सकती थी. उसकी यह क्षमता सुप्त ही रहती थी लेकिन जब उसे गुस्सा आता था तो उसकी यह टेलेकिनेसिस की शक्ति प्रदर्शित होने लगती थी.

कैरी चूंकि भीरु लड़की थी इसलिये हमेशा इसका ख्याल रखती थी कि वह अपनी इस शक्ति का प्रदर्शन न करे. आखिर में उसके स्कूल का आखिरी दिन आता है और वह ‘प्रोम नाईट’ के आयोजन में जाती है. वहां प्रोम क्वीन का इलेक्शन होता है जिसमें वह जीत जाती है.

कैरी बेहद खुश होती है लेकिन तभी उसके सहपाठी उसको परेशान करने के लिये सुअर के खून से भरी बाल्टी उस पर गिरा देते हैं. अपने सबसे खुशी वाले दिन पर कैरी इस भद्दे मजाक से आहत हो कर क्रोधित हो जाती है.

उसके क्रोधित होने से उसकी टेलेकिनेसिस की शक्ति जागृत हो जाती है और वहां रक्खी वस्तुयें उड़ उड़ कर उसको प्रताड़ित करने वालो पर चलने लगती हैं. लेकिन कैरी का क्रोध और क्षोभ कम ही नहीं होता है और उसकी टेलेकिनेसिस की शक्ति उसके नियंत्रण से बाहर हो जाती है.

उसके बाद कैरी पूरे स्कूल को सहपाठियों सहित जला डालती है. जलते हुये स्कूल को छोड़ वह अपने घर जाती है तो उसका अगला शिकार उसकी माँ ही हो जाती है और पूरा घर जल जाता है.

यह कैरी ही हिन्दू है. उसके अंदर भी सदियों से विध्वंस की सुप्त शक्ति है जिसे उसके धर्म की पाश्चात्य नवविवेचना व उसके शासकों और राजनैतिक नेतृत्व ने हीनता के बोझ में दबा रक्खा है. इस पर हो रही प्रताड़ना को यदि आज भी नहीं समझा गया तो भविष्य में इस शक्ति का नियंत्रण से बाहर निकल जाने को कोई नहीं रोक सकता है.

यह जो हुआ है वह सही है या गलत, नैतिक है या अनैतिक, यह तय करना अब वर्तमान के हाथ में नहीं रह गया है. इसका कारण यह है कि राजसमंद की उत्पत्ति, स्वतंत्र भारत में सेक्युलर शासकों व बुद्धिजीवियों द्वारा भूतकाल में, हिंदुत्व की अस्मिता के साथ किये गये उल्लंघन से हुये गर्भ से हुई है.

उदयपुर तो सिर्फ उसका पहला कदम है, अभी उसे शैशव काल से गुजर कर, युवा होना है, जो कि भविष्य के अधीन है. इसी लिये इस वर्तमान में राजसमंद पर प्रश्न खड़ा करने की बजाय उसको हो रहे समर्थन को समझने की जरूरत है क्योंकि भविष्य में जब इस हवनकुंड से निकली ज्वाला अपना वृहत रूप लेगी तब वह किसी को इसको समझने का वक्त नहीं देगी.

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