निजी अस्पतालों में होती अनियमितताएं, उनके कारण और निवारण

स्वास्थ्य संस्थाओं मे होने वाली आज की परेशानियों के लिए हमें अपनी नज़र इसके इतिहास पर डालनी होगी. जिससे हम समझ सकें कि इसमें कहाँ त्रुटि रह गयी और इसके निवारण पर काम कर सकें. आज किसी चिकित्सक पर या किसी भी चिकित्सालय पर आरोप लगाना एक काम है. मैं अपने इस लेख से किसी भी अस्पताल का पक्ष नहीं रख रहा हूँ. पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि न तो मैं स्वयं चिकित्सक हूँ और न ही किसी नामी अस्पताल में मेरे किसी निजी मित्र या संबंधी पर इस प्रकार के आरोप लगे हैं जिसके लिए मैं स्पष्टीकरण दे रहा हूँ.

याद करें कि आज़ादी के समय भारत में चिकित्सक और गुरु का लगभग भगवान का दर्जा था और इस दोनों ही कामों को धन कमाने की अपेक्षा समाज सेवा के रूप में अधिक देखा जाता रहा है. उसी समय यानि 1943 में जोजेफ भोर की अध्यक्षता एक कमेटी ने भारत की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कुछ संस्तुति (recommendation) प्रदान की जिसके अनुसार निकट भविष्य के लिए और दूरगामी परिणामों के लिए सरकार को कुछ कार्य करने थे.

लेकिन शायद हम नयी आज़ादी के नशे के कारण देश को भूल कर व्यक्तिगत या पार्टीगत स्वार्थ तक सीमित रह गए. फिर भी ऐसी निकम्मी योजनाओं और सरकारों पर होने वाले कर्ज़ के कारण 1990 तक हम उसी गुलामी की अंग्रेजों की व्यवस्थाओं को पालते रहे. हो सकता है कुछ अच्छा बुरा रहा हो परंतु एक बात स्पष्ट थी कि स्वास्थ्य अभी भी सामाजिक काम होने के कारण अपनी अस्मिता बचाए हुए था.

इसीलिए तब तक अधिकांश निजी अस्पताल किसी न किसी ट्रस्ट से संचालित होते थे जहां पर धन कमाना मुख्य उद्देश्य नहीं रहा. और इस के साथ साथ सरकारी अस्पताल देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का बोझ उठाए हुए थे. उदाहरण के लिए तब दिल्ली जैसे शहर मे मूलचंद अस्पताल, स्टीफन अस्पताल, सर गंगाराम अस्पताल और होली फॅमिली अस्पताल ही अच्छे माने जाते थे निजी क्षेत्र में. हमारे नेता हों या बड़े उद्योगपति या बड़े अफसर सब सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए जाते थे.

तभी 1990 में वैश्वीकरण और भूमंडलीकरण की सुनामी आई. जिसे भारत पर थोप दिया गया. जिसके साथ कर क्षेत्र में निजी निगमित या corporate का पदार्पण हुआ. बड़े बड़े अस्पताल अपने पैर फैलाने आ गए. भारतीय लोग अपने आप को समाजवाद और पूंजीवाद के बीच में असमंजस्य में पाता है. समझ नहीं आता कि क्या ठीक है क्या गलत? पर लगभग 5 साल में ही देश में गोविंदाचार्य, गुरुमूर्ति और राजीव दीक्षित जैसे लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि यह व्यवस्था देश के लिए घातक है.

परंतु तब तक शायद विदेशी मीडिया का भी पदार्पण हो गया तो सब जगह से इस व्यवस्था के सद्गुणों का गाना गया जाने लगा. भारत में वर्षों से जो नीतियाँ बनाने वाले थे वह सब विदेशों से अध्ययन करके आए थे इसीलिए उनके भारत की समझ ही नहीं थी. दरअसल यह सारी वैश्वीकरण की व्यवस्था एक झूठ फैला कर की गयी थी. और वह झूठ था कि विदेशी पूंजी भारत में FDI के नाम पर आएगी. RTI के 2014 के आंकड़ों के अनुसार 24 वर्षों में FDI से 10 लाख करोड़ रुपया आया है और इसी दौरान हमारे देश की बचत या पूंजी बनी है 32 लाख करोड़. अब किस FDI का रोना रोएँ. हाँ एक बात है कि हमें डॉलर चाहिए आयात के लिए.

चलिये मूल मुद्दे की बात करते हैं तो इसके बाद सरकार ने स्वास्थ्य, शिक्षा पर और अन्य सामाजिक कार्यों पर खर्चा करना कम कर दिया. इसके परिणामस्वरूप सरकारी स्वास्थ्य, शिक्षा इत्यादि के स्थान पर निजी क्षेत्र के कब्जा होता गया. इसी के चलते निजी अस्पताल और संस्थाओं का फैलाव होता चला गया. इस काम के लिए भारत सरकार पर WTO जैसी विदेशी संस्थाओं का दबाव भी था. अगर न मानते तो विदेशी नया कर्जा न देते. इस पूरे काम के दौरान हम यह भूल गए कि स्वास्थ्य सेवाएँ अपने आप में काफी महंगी होंगी. सरकार के अनुदान के अभाव में निजी अस्पताल आगे बढ़ने लगे.

और जब यह आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गया तो एक नया अध्याय जुड़ा जिसे आप बीमा कंपनी कहते हैं. यह बीमा कंपनी आपसे पैसा ले कर आपके बीमार होने की स्थिति में आर्थिक मदद करने लगी. पर प्रश्न था कि इस बीमा समुदाय का खर्चा भी तो बीमा धारकों को और अस्पतालों को उठाना था. इसके कारण इलाज भी महंगा हो गया पर इसके साथ साथ cashless insurance भी समाप्त होने लगा. क्योंकि अस्पतालों का पंजीकरण उन बीमा कंपनियों के पास नहीं था.

अचानक से 2010 में GIPSA का जन्म हुआ. General Insurer Public Sector Association Of India नमक संस्था बनी थी कि सभी बीमा कंपनियों और अस्पतालों की मन मर्ज़ी के पर लगाम लग सके. परन्तु हुआ इसके ठीक उलट GIPSA और अस्पतालों ने आपस मे मिल कर ही cashless बन्द कर दिया या पंजीकरण के नाम पर कुछ ही अस्पतालों को इस प्रक्रिया मे रखा गया. फलस्वरूप फिर से आम जनता को लूटने का रास्ता खुल गया. GIPSA के तहत बीमा कंपनियों ने लोगों को कुछ विशेष अस्पतालों मे जाने को बाध्य किया.

अब प्रश्न यह पैदा हुआ कि हमें बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाएँ चाहिए जो महंगी हैं, पैसा पास नहीं है. जहां तक सरकार की बात है सरकार ने अपने सरकारी अस्पतालों जैसे सैनिक अस्पताल, CGHS इत्यादि को बाहर से इलाज करवाने का प्रावधान भी कर दिया. इसी के साथ सरकार ने एक काम और किया कि निजी अस्पतालों को कुछ प्रतिशत गरीबों के लिए बिस्तर रखने का इलाज करवाने का निश्चित किया. अब हो सकता है कि आप सोचें कि यह तो गरीबों का भला है परन्तु निजी अस्पताल इसके लिए सक्षम मरीज से ही पैसा निकलवाते हैं. अब सक्षम व्यक्ति की इलाज की कीमत और बढ़ती गयी.

सरकार को आज आगे बढ़ कर इस स्वास्थ्य व्यवस्था को अपनाना होगा तभी देश के लोगों का स्वास्थ्य सुधरेगा. सरकारी व्यवस्थाएं कुछ उन्नत हो जाएंगी या अपनी जगह निजी संस्थानों को चलने दें. जिसे आवश्यकता होगी और सक्षम होगा वह भले ही निजी संस्थान में जाये.

जब जब भूमंडलीकरण का या निजवाद का विरोध हुआ यह समझा गया कि स्वदेशी का समर्थन का अर्थ देशी वस्तुओं का उपयोग हुआ. परन्तु विदेशी विचार के आने से उस व्यक्तिवाद के विचार का प्रसारण हुआ जो कि भयावह हमेशा से ही रहा था

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