उत्सव मनाइये क्योंकि गुलामी से बाहर हम अब निकले हैं

यह तो हमें पता है कि हमने गुलामी में कई वर्ष रहे हैं. यह भी पता है कि भारत 70 वर्ष पहले स्वतंत्र हो गया था.

लेकिन उस गुलामी के पद-चिह्न हमारी बोल-चाल, यहाँ तक कि सरकारी भाषा में अभी भी दिखाई देते है.

आज के समय का तो नहीं पता, मेरे समय में सरकारी स्कूल में अंग्रेजी की क्लास में छुट्टी या बीमारी की एप्लीकेशन ऐसे सिखाई – सॉरी, रटाई – गयी थी: आदरणीय महोदय, मैं आपसे यह कहने की भीख (I beg to state…) मांगता हूँ कि क ख ग कारणों से मैं स्कूल नहीं आ पाउँगा… इत्यादि, इत्यादि…

यही हाल संसद का है. प्रधानमंत्री हो या मंत्री, 70 सालों से वे सभापति से सदन में किसी पेपर को रखने की ‘भीख’ मांगते थे.

उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने आज यह प्रथा समाप्त कर दी. अब से, प्रधानमंत्री और मंत्री, दोनों अब सदन के पटल पर पेपर रखने के लिए ‘खड़े’ होंगे.

यह भाषा (भीख मांगना…) मुझे किसी भी विकसित देश में नहीं दिखाई देती. कम से कम अंग्रेजी और फ्रेंच के बारे में तो मैं कह ही सकता हूँ. ‘भीख’ शब्द का प्रयोग कुछ अन्य देशो में भी होता है जो अंग्रेजों के गुलाम रहे हैं.

क्या यह सोचने का विषय नहीं है कि स्वतंत्रता के इतने वर्षो बाद क्यों एक सभापति को सांसदों और मंत्रियों को बतलाना पड़ा कि उन्हें पेपर प्रस्तुत करने के लिए भीख नहीं मांगनी है.

और क्यों वह सभापति किसी अन्य पार्टी से नहीं, बल्कि भाजपा की कोंख से निकले? आप याद दिलाएंगे कि भैरों सिंह शेखावत ने भी अपना राजनैतिक जीवन भाजपा में काटा था. अवश्य.

लेकिन क्या बात है कि यह संशोधन प्रधानमंत्री मोदी के शासन में हो रहा है?

कहीं ऐसा तो नहीं कि हम भौतिक गुलामी से तो निकल चुके थे, लेकिन मानसिक रूप से अभी भी गुलाम थे.

प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम अब हमें मानसिक गुलामी से निकाल रही है.

हमें इस समय के एक-एक क्षण का उत्सव मनाना चाहिए.

क्योंकि हम अब गुलामी से बाहर निकले हैं. अब हम स्वतंत्र हैं.

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