जिसे विश्वास नहीं वह इससे अधिक ज्ञान का पात्र भी नहीं

एक पीत से सरोवर में एक भव्यातिभव्य पीत पुष्प प्रफुटित हुआ.

सुमन ने प्रकट हुए पुष्प को प्रणाम करते कहा – ज्ञान चाहिए, पुष्प तो माया है.

इतने में ही एक दिव्य मालाधारी पुरुष प्रकट हुआ. उसने सुमन पर व्यंग्यात्मक दृष्टि डाली और कहा कहा – ज्ञान चाहिए..? पात्रता है जो ज्ञान प्राप्त करोगे?

सुमन ने प्रतिवाद किया – देव, यदि मुझ क्षुद्र को पात्रता नहीं थी तब आपने मुझे क्यों दर्शन दिए?

देव- क्योंकि तुम अर्धज्ञान के अधिकारी हो, इसलिए. मैंने पूर्व में ही कहा था- यथा पात्रता, यथा अनुदान.

सुमन – स्वीकार है.

देव – तो मेरे साथ चलते रहो. जब तक तुम्हारे पग साथ दें.

देव के पीछे-पीछे सुमन चल पड़ा. कुछ पग लांघते ही एक अनन्त उर्ध्वगामी मार्ग दिखाई दिया. बड़ा ही विचित्र मार्ग था. पथ के बायीं ओर बड़े-बड़े ईंटों में जकड़ी हुई आत्माएं थीं जिनके केवल आँखें स्वतंत्र थीं और कुछ भी नहीं. सुमन को यह अनुभूति हुई कि सभी ईंटों से बड़ी-बड़ी आंखों वाली आत्माएं उसे बड़ी कातर दृष्टि से देख रही हैं. उसे तनिक भय हुआ किन्तु तत्क्षण दाहिनी ओर क्रीड़ा करते हुए बालकों का मनभावन कल्लोल दिखाई दिया.

उसने देखा कि सभी बालक एक दूसरे को अपने हाथ से प्रिय वस्तुओं का आदान-प्रदान कर रहे हैं. उन बालकों के मुख पर कहीं कोई पीड़ा नहीं थी, अपितु एक अद्भुत आनंदघन आच्छादित हो रहा था.

सुमन धीरे-धीरे पगों से चलते हुए इन सभी दृश्यों का आनंद ले ही रहा था कि देव ने टोका – क्यों बालक, अभी तुम्हारी यात्रा आरम्भ ही हुई है! अभी यात्रा शेष ही है..

सुमन ने पूछा – देव, इन बायीं ओर और दाहिनी ओर की आत्माओं की भिन्न-भिन्न स्थितियों का कारण क्या है? एक ओर केवल दृष्टि की स्वतंत्रता और दूसरी ओर रमणीक उपवन में स्वछंद जीवन? यह एक साथ क्यों?

देव हंसे और उन्होंने कहा – मनुष्य का शरीर मात्र मांस का पिंड नहीं है, अपितु उसमें भी दो ध्रुव हैं. मानव शरीर के मांस पिंड में मस्तिष्क उत्तरी ध्रुव है और गुदा के अंतराल में दक्षिणी ध्रुव है. मस्तिष्क वाले उत्तरी ध्रुव को सहस्त्रसार चक्र कहते हैं और गुदा के अंतराल दबे हुए चक्र को मूलाधार चक्र कहते हैं. हम उत्तरी ध्रुव से भोजन और प्राणवायु ग्रहण करते हैं और दक्षिणी ध्रुव से अपशिष्ट और मूत्र का उत्सर्जन करते हैं.

ठीक वैसे ही पृथ्वी ग्रह पिंड अपने उत्तरी ध्रुव के मुख से कॉस्मिक रे को ग्रहण करता है और दक्षिणी ध्रुव से प्रदूषण का उत्सर्जन करता है. मध्य में वह अपने समस्त भागों को विद्युत देता है, जिसकी अधिक पात्रता हुई, उसे विद्युत अधिक प्रदान किया जाता है.. और यदि पात्र न्यून मात्रा में विद्युत का अधिकारी हुआ उसे उतना ही प्रदान किया जाता है परन्तु न्यूनाधिक सभी को यह विद्युत प्राप्त होती है.

सुमन, अब तुम कहोगे कि विद्युत एक समान क्यों नहीं? तो इसका उत्तर यह है कि जब पृथ्वी पर दिवस-रात्रि एक समान हो ही नहीं सकते तो एक समान जड़ और चेतन पदार्थों को विद्युत कैसे मिले? ऋषियों ने चतुर्थी तिथि को चन्द्रमा देखना क्यों निषेध किया.. क्योंकि उस समय ब्रह्मांड में कण-कण पर हानिकारक किरणों का नकारात्मक शक्तिपात हुआ करता है. चंद्रमा एक बड़ा दर्पण है जो सूर्य की किरणों को अवशोषित करके पृथ्वी पर किरणों का शक्तिपात करता है यद्यपि चंद्रमा से आ रही किरणों के परमाणुओं की प्राणशक्ति में अत्यधिक जीवनशक्ति होती है.

हाँ, तुम्हारे प्रश्नानुसार जो व्यक्ति इन्द्रियलोलुप जीवन जीते हैं उनके शरीर की विद्युत शक्ति निरन्तर घटती जाती है और यही ह्वास शरीर त्यागने के समय उनके सूक्ष्म शरीर पर प्रभावी होकर उन्हें किंकर्तव्यविमूढ़ बनाकर छोड़ता है. इन्द्रियलोलुप पापों का प्रायश्चित उनकी आत्मा को पक्षाघात दे देता है, अतः यही इन्द्रियलोलुप आत्माएं जीवन-निर्झर पथ के बायीं ओर स्थित होकर यथासमय पाप प्रारब्धवश प्रायश्चित करती रहती हैं, इसलिए केवल इनकी आँखें ही देख पाती हैं. इसलिए यह आँखें ग्लानि से भरी रहती हैं.

और दाहिनी ओर जो आत्माएं एक दूसरों को आदान-प्रदान करने का उपक्रम करती दिखती हैं, उन्होंने निःसन्देह मानव शरीर में रहकर भी अपने उत्तरी ध्रुव को पुष्ट किया है.. त्याग, कर्तव्य, निष्ठा और तप इनके प्रमुख आचरण हैं. जैसे दीपक की बाती की दीप्ति तल पर जाकर घृत को एकाएक नहीं धधकाती, अपितु तल से शनैः शनैः घृत पीकर उर्ध्वगामी होकर वह बाती के ऊर्ध्व को दीप्त करती है. दीपक तले अंधकार होता ही है, किन्तु दीपक का ऊर्ध्व दीप्त होता है, ठीक इसी तरह का जीवन मानव को जीना चाहिए.

उत्तरीय क्या है? मानव जब उसे कटि से स्पर्श करता हुआ स्कन्ध तक सर्पिल आकृति में धारण करता है. यह उत्तरीय शरीर में विद्युत-ऊर्जा के अनंत प्रवाह को अवशोषित करता है. उत्तर का अर्थ है – उर्ध्वगामी होना. न कि अधोगामी होना.

यह कहकर देव शांत हो गए. देव द्वारा कहे गए एक-एक शब्दों का श्रवण-पान करके सुमन तृप्त हो गया था. पुनः दोनों अपने पगों से आगे की ओर बढ़ चले.

अकस्मात सारे वातावरण का दृश्य श्वेत हो गया. सुमन और देव सभी श्वेत. मार्ग की धूलि तक श्वेत, आकाश श्वेत, दशों दिशाएं श्वेत. सुमन विस्मित हुआ.. कि यह कैसा लोक है?

तभी देव ने कहा – सुमन, वास्तव में संसार में उपस्थित सभी पदार्थों का वर्ण श्वेत ही है. तुम्हारे आधुनिक विज्ञान के अनुसार खरगोश की आंखों में वर्णांधता नहीं होती, अपितु उसकी दृष्टि सत्य के सन्निकट है. एक दोष उसमें भी है – वह श्याम वर्ण देख सकता है.

जबकि मानव शरीर की भौतिक आँखों की रेटिना की रचना ही ऐसी होती है कि वह रंगभेदी हो, जबकि रंगभेद है नहीं.. तुम श्याम वर्ण के हो सुमन यद्यपि तुम श्वेत हो.

सुमन ने प्रतिवाद किया – देव, मुझे आप के ज्ञान पर शंका हो रही है. यह असत्य है.

देव हंसे – मैं तत्क्षण तुम्हारी स्मृति से विदा लेता हूँ, क्योंकि तुम्हें सत्य देखकर भी विश्वास नहीं हुआ. जिसे विश्वास नहीं वह इससे अधिक ज्ञान का पात्र भी नहीं. जाओ.. पात्रता सञ्चित करो, सुमन.

सुमन पुकारता रह गया.. देव.., देव तनिक ठहरिए..!

पल भर में सारे दृश्य समा।प्त हो गए. खिड़की के पास महोख पक्षी की ध्वनि सुनकर वह जाग उठा!

अब सभी वस्तुओं का वर्ण दृष्टिगोचर हो चुका था.

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