नि:संदेह, ट्रेन में पहले की तुलना में साफ़ – सफाई बढ़ गयी है!

बार बार कोच सफाई वाले आ रहे हैं, हर बार उन्हें कचरा नहीं मिलता तो मुझे डर लगता कि वह मुझे सीट से घसीटते हुए ले जा कर नहलाने ना लग जाये.

जो लोग पहले ट्रेन में साफ़ सफाई की शिकायते करते थे, वह अब नए मुद्दे खोजते हैं शिकायतों के लिए. क्योकि संतुष्ट रहना हमारे स्वभाव में नहीं है. हम खाना घर से लेकर ही निकलते हैं लेकिन बातचीत के दौरान ट्रेन में मिले खाने की बुराई करना नहीं भूलते .

लेकिन किसी को भी सुबह अपना बेड रोल फोल्ड करते नहीं देखा. सब सोचते हैं कि यह काम अटेंडर का हैं. और अगर खुद करेंगे तो ठसक कम हो जायेगी. अगर आप स्वयं यह काम करेंगे तो आपको अन्य सहयात्री ऐसी बेचारगी से देखेंगे मानो आप पहली बार यात्रा कर रहे हो.

वॉश बेसिन के पास खड़े लोगों का उत्साह देखने लायक रहता हैं, दांतों की सफाई के लिये इतना ज्यादा पेस्ट इस्तेमाल कर रहे मानो उसी झाग में शेविंग भी करना हो. कुछ संगीतप्रेमी बाकायदा बादलों की गड़गड़ाहट की आवाज से कुल्ला भी करते मिलेंगे. सबसे बुरा तब लगता जब वाश बेसिन में नीम दातुन या पेपर सोप के टुकड़े पड़े हुए मिलते हैं. इस आदत से हम कभी पीछा नहीं छुड़ा पाते.

जितना सामान एक विदेशी अपना देश छोड़ने पर साथ नहीं लेता उससे ज्यादा एक भारतीय अपनी रेल यात्रा में साथ लेता है.

सो हर कूपे में सबसे ज्यादा भुनभुनाहट सामान रखने की जगह को लेकर होती है, लेकिन तब तक ही जब तक कोई सुन्दर सहयात्री नहीं आई होती.

उसके बाद मानो होड़ मची हो अपना अपना सामान सर पर रख कर उसके सामान के लिये जगह बनाने को. पूरे कूपे में सद्भावना की भीनी भीनी बयार बहने लगती है . ऐसा लगता मानो हर यात्री अपना सीना चीर कर दिखाने को उत्सुक हो कि कितना मिलनसार सह्रदय भला सहयात्री है.

  • सतवीर सिंह

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