तभी तो बिकाऊ पत्रकारों सहित अभिजात्य वर्ग इतना विरोध कर रहा है!

प्रधानमंत्री मोदी के फिक्की में दिए गए संबोधन को आपने देखा या पढ़ा होगा. वह कहते है कि आज़ादी के बाद के 70 सालों में हमारे यहां एक ऐसा सिस्टम बना जिसमें गरीब को बहुत छोटी-छोटी चीजों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था.

उस गरीब को बैंक अकाउंट खुलवाना है, तो सिस्टम आड़े आ जाता था, उसे गैस कनेक्शन चाहिए, तो दस जगह चक्कर लगाना पड़ता था. अपनी ही पेंशन पाने के लिए, स्कॉलरशिप पाने के लिए यहां-वहां कमीशन देना होता था.

प्रधानमंत्री आगे कहते हैं कि कोई भी नौजवान अपने दम पर जैसे ही कुछ करना चाहता है, उसके सामने पहला सवाल यही होता है कि पैसे कहां से आएंगे.

वह पूछते है कि जब सरकार में बैठे कुछ लोगों द्वारा बैंकों पर दबाव डालकर कुछ विशेष उद्योगपतियों को लोन दिलवाया जा रहा था, तब पहले की सरकार में बैठे लोग जानते थे, बैंक भी जानते थे, उद्योग जगत भी जानता था, बाजार से जुड़ी संस्थाएं भी जानती थीं कि ये गलत हो रहा है.

ये यूपीए सरकार का सबसे बड़ा घोटाला था. कॉमनवेल्थ, टू जी, कोयला, इन सभी से कहीं ज्यादा बड़ा घोटाला. ये एक तरह से सरकार में बैठे लोगों द्वारा उद्योगपतियों के माध्यम से जनता की गाढ़ी कमाई की लूट थी.

वह बतलाते हैं कि सरकार GST इसलिए ला रही है क्योंकि सिस्टम जितना पारदर्शी होगा, उतना ही गरीबों का लाभ होगा. इसके अलावा फॉर्मल सिस्टम की वजह से उन्हें आसानी से बैंकों से क्रेडिट मिलेगा, रॉ मैटेरियल की गुणवत्ता बढ़ेगी और लॉजिस्टिक्स की कॉस्ट भी घटेगी. यानि ग्लोबल बिज़नेस में छोटे उद्यमी भी ज्यादा कंपटीटिव होंगे.

वह पूछते है कि क्यों ऐसा हुआ कि बिल्डरों की मनमानी की खबर पहले की सरकार तक नहीं पहुंची. मध्यम वर्ग पिस रहा था, जिंदगी भर की कमाई बिल्डर को देने के बाद भी उसे घर नहीं मिल रहे थे, और फिर भी कुछ ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे थे. क्यों?

RERA (रियल स्टेट में होने वाले भ्रष्टाचार को रोकने का कानून) जैसे कानून पहले भी तो बनाए जा सकते थे, लेकिन नहीं बने. मध्यम वर्ग की इस दिक्कत को इस सरकार ने ही समझा और कानून बनाकर बिल्डरों की मनमानी पर रोक लगाई.

प्रधानमंत्री ने अर्थव्यवस्था की मजबूती दर्शाने के लिए कुछ आंकड़े भी बताये. वह आप उनके सम्बोधन में पढ़ सकते है.

मैं लगातार अपने लेखो में यह लिखता रहा हूँ कि प्रधानमंत्री मोदी भारत में अभिजात्य वर्ग का रचनात्मक विनाश कर रहे है.

स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के शासकों ने एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जिसमें जनता की भलाई और सेकुलरिज्म के नाम पर अपने आप को, अपने नाते रिश्तेदारों और मित्रों को समृद्ध बना सकें. अपनी समृद्धि को इन्होंने विकास और सम्पन्नता फैलाकर नहीं किया, बल्कि जनता के पैसे को धोखे से और भ्रष्टाचार से अपनी ओर लूट कर किया.

यह समझ कई देशों की राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था के अध्ययन और भ्रमण से समझ में आयी.

मैं ज़ोर देना चाहता हूँ कि ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था की संरचना जानबूझकर कर की गयी थी, ना कि नासमझी में. उनका पूरा ध्यान अपने आप को और अपने मित्रों को समृद्ध करना था और उन्हें धनी बनाना था. जनता को जानबूझकर गरीब रखना था, क्योंकि गरीब जनता को वह बहला-फुसलाकर, लॉलीपॉप देकर वोट पा सकते थे.

पारिवारिक संपत्ति या या भ्रष्टाचार से अर्जित किए हुए धन के बलबूते पर लोगों ने उद्योग का प्लान बनाया. उस उद्योग को बढ़ाने के लिए उन्होंने सरकारी बैंकों से दिल्ली में ‘पहचान’ के बूते करोड़ों-अरबों का लोन ले लिया, जबकि उनके उद्योगों का आधार, संरचना और सफलता संदिग्ध थी.

मैंने पूछा था कि क्या एक रिक्शे वाला या कामवाली कहीं से कोई गारंटर ला सकती है जिससे उसे बैंक से लोन मिल जाएगा? और किस ब्याज पर मिलेगा?

बीमारी का मारा हुआ व्यक्ति, जर्जर शिक्षा व्यवस्था से बाहर निकला हुआ व्यक्ति, लोन के लिए दर-दर भटकता व्यक्ति, क्या वह ट्रेन के सस्ते टिकट के चक्कर में पूरी जिंदगी उसी अभिजात्य वर्ग को वोट नहीं देगा जिसने उसे जानबूझ कर गरीब रखा है?

क्योंकि उसे सस्ते टिकट में ही एक आशा की किरण दिखाई देती है. उस सस्ते टिकट के चक्कर में खेल कहीं और हो जाता है.

कैसे हमारे नवयुवक और नवयुवतियां इस अभिजात्य वर्ग के जमे-जमाये युवाओ से मुकाबला करेंगे? उनकी माता और पिता ने तो भ्रष्टाचार और पहचान के बूते पर ना केवल उद्यम खड़े कर दिए, बल्कि नए लोगो के सामने अनगिनत बाधाएँ खड़ी कर दीं जिससे उनके निकम्मे लालों को कोई चुनौती ना दे सके.

प्रधानमंत्री मोदी जी इस अभिजात्य वर्ग की जड़ों को काट रहे हैं, उन जड़ों को जो भारत भूमि में बहुत अंदर तक घुस गई थी. तभी तो अभिजात्य वर्ग, जिसमें बिकाऊ पत्रकार शामिल हैं, इतना विरोध कर रहा है…!

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