मुझे नफ़रत है इस शख्स से… इस पार्टी से…

कुछ दिनों पहले कांग्रेसी नेता मणि शंकर अय्यर के घर एक मीटिंग हुई थी जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व आर्मी चीफ दीपक कपूर, हामिद अंसारी साहब और पाकिस्तान के पूर्व विदेशमंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी मौजूद थे.

कुछ समय पहले इन्ही खुर्शीद महमूद कसूरी की किताब ‘Niether a hawk, nor a dove’ का मुंबई में विमोचन हुआ था, जिसके समारोह में शिव सैनिको (भगवान भला करे उनका) ने विमोचन के आयोजक सुधींद्र कुलकर्णी का मुंह कायदे से काला किया था.

उस विमोचन में एजी नूरानी साहब ने एक खास घटना का जिक्र किया था.

21 मई 2004 को एक अमेरिकन अख़बार स्टेट्समैन ने मनमोहन सिंह का एक इंटरव्यू छापा था, जिसमे मनमोहन सिंह ने भारत के विश्व जगत में पिछड़ेपन की सबसे बड़ी वजह कश्मीर डिस्प्यूट को बताया था.

इस इंटरव्यू में मनमोहन सिंह ने कहा था कि कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए भारत को किसी भी समाधान को स्वीकार कर लेना चाहिए जिसमें लाइन ऑफ़ कंट्रोल या मौजूदा बॉर्डर से छेड़छाड़ न हो.

इस इंटरव्यू के छपने के अगले दिन मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे.

जैसा कीड़ा नेहरू को काटा था विश्व नेता बनने का, वैसा ही भूत मनमोहन सिंह के सर पर भी सवार था. नेहरू के सपने को पूरा करने के लिए भारत ने बड़ी कीमत चुकाई. मनमोहन सिंह के लिए अभी चुकानी थी.

इस सपने को पूरा करने के लिए मनमोहन सिंह जी ने कश्मीर को चुना. अगर भारत पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे पर राजी हो जाएँ. कुछ ऐसा समाधान लाएं कि पूरा विश्व वाह वाह कर उठे.

उस समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ थे और वो भी कश्मीर समस्या के लिए आउट ऑफ़ बॉक्स थिंकिंग कर रहे थे.

दोनों की जुगलबंदी ने जो रंग दिखाया उसे बाद में मनमोहन मुशर्रफ फोर पॉइंट फार्मूला के नाम से जाना गया.

हालाँकि इसकी सफलता के लिए मनमोहन सिंह इतने बेसब्र थे कि उन्होंने अपना नाम इसमें से हटा लिया और इसे केवल मुशर्रफ फोर स्टेप फार्मूला के नाम से स्वीकृति दे दी.

इस फॉर्मूले के अनुसार 4 काम होने थे :

1. भारत और पाकिस्तान जम्मू कश्मीर और तथाकथित आज़ाद कश्मीर से अपनी सेनाएं हटा लेंगे यानी डिमिलिटराइज़ेशन

2. लाइन ऑफ़ कंट्रोल यानी दोनों देशों की बाउंड्री में कोई चेंज नहीं होगा, लेकिन ये बॉर्डर सिर्फ कागज़ों में रह जायेगा. कश्मीर के लोगों को इस पार – उस पार आने जाने की पूरी छूट होगी. और इसी तरह व्यापार की भी.

3. सेल्फ रूल, मैक्सिमम ऑटोनोमी कश्मीर के लिए जो स्वतंत्रता से ज़रा कम होगी.

4. भारत और पाकिस्तान मिलकर एक जॉइंट कमेटी बनाएंगे जो कश्मीर को मॉनिटर करेगी लेकिन उसके पास कोई एक्जीक्यूटिव पावर नहीं होगी. कश्मीर की ऑटोनोमी में विदेश और रक्षा मामले सम्मिलित नहीं होंगे.

भारत और पाकिस्तान सन 2007 में महज कुछ कदम दूर थे इस समझौते पर साइन करने के. लेकिन होनी को कुछ और मंजूर था.

परवेज मुशर्रफ का तख्ता पलट गया और उन्हें विदेश भागना पड़ा.

अगली सरकार ने इस समझौते पर आगे बढ़ने से इंकार कर दिया. और इसकी फॉर्मूले की वहीँ मौत हो गयी.

हो सकता है, हममे से अधिकतर लोग ऐसे किसी भी फॉर्मूले से वाकिफ न हों. क्योंकि ये सारी बातचीत बैक चैनल में हुई. सीक्रेट.

इसका भेद खुला जब 2009 में वाइकाई लीक्स के एक केबल में इसका खुलासा हुआ. जिसमें मनमोहन सिंह ने अमेरिक डिप्लोमेटिक मिशन के सामने स्वीकार किया था कि वो और मुशर्रफ कश्मीर समस्या को सॉल्व करने के एकदम करीब पहुँच गए थे.

क्या वाकई?

क्या यही समाधान था?

कश्मीर जिसका विलय भारत में सम्पूर्ण और अविवादित है. कानूनन है. उसे हम यूँ ही छोड़ देते? भारत की संसद ने पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर को वापस हासिल करने का प्रस्ताव पारित किया वो झूठा था? जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है क्या वो एक जुमला था?

इस फोर पॉइंट फॉर्मूले से भारत को आखिर क्या लाभ था. अपना अंग बेचकर किस शांति की हम तमन्ना कर रहे थे.

मनमोहन सिंह ने कभी स्वीकार नहीं किया कि उनकी मुशर्रफ से इस बारे में कभी कोई बातचीत चली.

लेकिन परवेज़ मुशर्रफ ने अपनी किताब ‘इन द लाइन ऑफ़ फायर’ में इस फॉर्मूले का ज़िक्र किया है. और किताब की रिलीज़ के बाद एक टीवी शो में पूरी योजना पर खुलकर बात की और इस बात का अफ़सोस जताया कि समय ने उन्हें मौका नहीं दिया.

सिर्फ एक सिग्नेचर बचा था.

इस खुलासे के बाद संसद में भी हंगामा हुआ. लेकिन मनमोहन वहां भी मुकर गए.

वैसे ही जैसे मणि शंकर अय्यर के घर हुई मीटिंग के बाद मुकरे. जिस मीटिंग में मनमोहन भारत पाकिस्तान शांति कश्मीर समाधान की बात कर रहे थे. गुजरात चुनाव की नहीं.

मुझे नफरत है इस शख्स से. इस पार्टी से.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY