तीसरी दुनिया : ट्रांसजेंडर्स

आजकल समाज में बहुत सी ऐसी चीज़ें घटित हो रही हैं जिन्हें बारीकी से अध्ययन करने और समझने की जरूरत है इस समाज का एक अहम हिस्सा है इसमें रहने वाले लोग और इन लोगों में ट्रांसजेंडर की संख्या भले ही कम हो लेकिन उन्हें काफी हेय दृष्टि से देखा जाता है. बहुत से ऐसी अवधारणा उनको लेकर मन मे बिठा ली गयी है, आइये आज ट्रांसजेंडर्स के बारे में जानने का प्रयास करते हैं.

ट्रांसजेंडर्स के बारे में जानने से पहले हम एक बात सपष्ट लर लेते हैं – जेंडर और सेक्स ( लिंग और यौन) दोनों आपको भले लगते एक हो लेकिन ये दो अलग अलग चीज़ें हैं. जेंडर का निर्धारण लिंग (जननांग) देख कर किया जाता है वहीँ सेक्स (यौन) हार्मोन के ऊपर निर्भर करता है एक पुरुष के अंदर स्त्री और एक स्त्री के अंदर पुरुष के सेक्स हो सकते है ये हार्मोन पे निर्भर करता है.

आप इसे समझें

SEXUAL IDENTITY (जैविक पहचान)

Sexual Identity (जैविक पहचान) एक व्यक्ति की जैविक तौर पर पहचान होती है जिसमें क्रोमोजोम्स (chromosomes), जननांग, होरमोन्स (hormones) का अनुपात, अंडकोष/अंडाशय की उपलब्धता और सेक्स के द्वितीय विशिष्ट लक्षणों का एक निश्चित प्रारूप मिलता है. एक सामान्य विकास में इन सभी का अनुपात में मिलना आवश्यक है जिससे व्यक्ति के स्त्री या पुरुष होने का शक बाकी नहीं रह जाता है.

आधुनिक शोधों के अनुसार पुरुषों में XY क्रोमोसोम्स और स्त्रियों में XX क्रोमोसोम्स पाया जाता है. भ्रूण का प्रारंभिक विकास, संरचना के आधार पर, स्त्री जैसा होता है और होरमोंस के अनुपातिक विभाजन के आधार पर छठे सप्ताह से 12 सप्ताह तक इसका विशेषीकरण हो जाता है.

GENDER IDENTITY (लिंग पहचान)

2 से 3 वर्ष की आयु का होते – होते लगभग सभी बच्चे खुद को लड़की या लड़के के रूप में पहचानने लगते हैं. जैविक तौर पर स्त्री या पुरुष के रूप में विकसित होने के साथ नारीत्व और पुरुषत्व के अहसास का विकसित होना ही सही मायने में समान्य सेक्सुअल विकास की श्रेणी रखा जाता है. इस तरह से sex शब्द को जैविक और gender शब्द को सामाजिक सन्दर्भ में इस्तेमाल किया जाता है.

सामान्यतः sex और gender में तालमेल होता है यानि कि नर का व्यवहार मर्दाना और नारी का स्त्रियोचित. कभी-कभार sex और gender का विकास विरोधाभासी होता है या पूर्णतया विरोधी होता है. इसलिए कुछ व्यक्ति अपने जैविक विकास के प्रतिकूल बर्ताव करते हैं. Gender identity (लैंगिक पहचान) विकसित होने के लिए हमें अनंत तरह के संकेत अपने परिवार से, शिक्षक से, मित्रों से, सहकर्मी से और सांस्कृतिक परिवेश से मिलते रहते हैं. इस तरह से gender identity का विकसित होना जननांग, अनुवांशिक/जैविक प्रतिक्रिया, अभिभावक/समाज की प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है.

GENDER ROLE

Gender identity व्यक्ति विशेष को बाहरी संकेतों की मदद से खुद को स्त्री या पुरुष के रूप में पहचानने की प्रक्रिया होती है. Gender role (लैंगिक परिचय) व्यक्ति विशेष के बात करने में संबोधन का तरीका और व्यवहार होता है जो उसको स्त्री या पुरुष के रूप में ज़ाहिर करता है. Gender role किसी व्यक्ति में जन्मजात नहीं होता है यह धीरे-धीरे विकसित होता है और निर्भर करता है अंदरूनी और बाहरी कारकों पर.

यूँ तो नर और नारी के विकास में भिन्नता की जगह समानताएं ही देखी गयी हैं फिर भी 18 महीने की उम्र के बाद लड़कियों में गुस्सा/चिडचिडापन कम देखा गया है और 2 वर्ष की आयु के बाद लड़के मौखिक और शारीरिक तौर पर आक्रमक होते हैं. कभी-कभी gender identity के विपरीत व्यक्ति gender role व्यक्त करता है जैसे विपरीत लिंग वाले कपड़े पहनना, बालों की शैली या अन्य चरित्र को अपनाना.

SEXUAL ORIENTATION

यह व्यक्ति के रुझान को दर्शाता है. जैसे heterosexual (विपरीत लिंग), homosexual (समलैंगिक) या bisexual (दोनों).

पहले हम लिंग का निर्धारण कैसे होता है इसको देखते हैं –

औरत के पास केवल एक्स–एक्स गुणसूत्र मौजूद होता है और आदमी के पास एक्स और वाई दोनों गुणसूत्र मौजूद होते हैं. अगर आदमी का एक्स और औरत का एक्स गुणसूत्र मिल जाए तो लड़का पैदा होता है और अगर महिला का एक्स और आदमी का वाई गुणसूत्र मिल जाएं तो लड़की पैदा होती है. इसलिए प्राकृतिक रूप से सेक्स निर्धारण में केवल पुरुष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है.

अब ट्रांसजेंडर कैसे बनते हैं वो देखिए –

प्रेग्नेंसी के पहले तीन महीने के दौरान ही शिशु का लिंग बनता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में किसी बच्चे के ट्रांसजेंडर होने की वजह का अभी तक पता नहीं चल पाया है. इसके बावजूद भी शिशु के लिंग निर्धारण के प्रॉसेस के दौरान ही किसी चोट, टॉक्सिक खान-पान, हॉर्मोनल प्रॉब्लम जैसी किसी वजह से पुरुष या महिला बनने के बजाय दोनों ही लिंगों के ऑर्गन्स या गुण आ सकते हैं. किसी भी महिला के लिए प्रेग्नेंसी के शुरुआती 3 महीने काफी इम्पॉर्टेंट होते हैं और इस दौरान सबसे ज्यादा सावधानी बरती जानी चाहिए.

कैसे कोई शिशु बन जाता है ट्रांसजेंडर? एक्सपर्ट क्या कहते हैं –

इंडियन फर्टिलिटी सोसाइटी के चैप्टर हेड और फर्टिलिटी एक्सपर्ट डॉ. रणधीर सिंह के मुताबिक, ट्रांसजेंडर लोगों में पुरुष और महिला, दोनों के ही गुण हो सकते हैं. ऊपर से पुरुष दिखाई देने वाले किसी व्यक्ति में इंटरनल ऑर्गन और गुण महिला के हो सकते हैं और ऐसे ही ऊपर से महिला नजर आने वाले किसी व्यक्ति में पुरुषों वाले गुण और ऑर्गन्स हो सकते हैं.

ट्रांसजेंडर्स का मतलब न वो बाप बन सकता है ना माँ?

ऐसी अवधारणा है कि ट्रांसजेंडर्स कभी माँ या पिता बनने का सुख नहीं ले सकते तो यदि आप किसी ट्रांसजेंडर को जानते है तो ये उसे जरूर बताएं कि वो माँ बन सकती है. डॉ. रणधीर सिंह का कहना है कि आजकल की एडवांस आईवीएफ टेक्नीक के जरिए ट्रांसजेंडर्स भी मां बन सकते हैं. सबसे खास बात ये है कि ट्रांसजेंडर मां के किसी भी बच्चे के ट्रांसजेंडर होने की कोई संभावना नहीं होती.

ट्रांसजेंडर्स और किन्नर क्या एक है?

ऊपर मैंने आपको बताया कि स्त्री के शरीर में पुरुष और पुरुष के शरीर में स्त्री.. आइये इसके बारे में जानते हैं –

साधारण भाषा में इसको जेंडर डिस्फोरिया या जेंडर आईडेंटिटी डिसऑर्डर कहते हैं. जेंडर डिस्फोरिया यानी एक लिंग से दूसरे लिंग की चाह. अक्सर देखा गया है कि कुछ लोगों के स्त्री देह में पुरुष मन या पुरुष देह में स्त्री मन होता है. यह जैविक या प्राकृतिक त्रुटि के अलावा हार्मोनल बदलाव का नतीजा है.

जेंडर डिस्फोरिया के लक्षण

* अपने लिंग से परेशान होकर दूसरे लिंग में जाने की कोशिश करना.
* लड़कों का अधिकतर लड़कियों की-सी हरकतें करना.
* उनके कपड़े पहनकर सहज महसूस करना.
* चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ देखकर परेशान हो जाना जबकि लड़कियां अपने स्तन और मासिक धर्म से परेशान हो जाती हैं.

जेंडर डिस्फोरिया’ में व्यक्ति को खुद की शारीरिक और मानसिक बनावट में अंतर दिखाई पड़ता है. व्यक्ति लड़की या लड़का पूरी तरह से बनना नहीं चाहता. उसे अपनी शारीरिक संरचना पसंद है. अधिकतर किन्नर इसी के शिकार होते हैं, जो शारीरिक रूप से लड़के होते हैं, पर वे मानसिक रूप से लड़कियों जैसा व्यवहार करते हैं.

एक अध्ययन में पाया गया कि अगर कोई व्यक्ति जेंडर आईडेंटिटी डिसऑर्डर का शिकार हो तो वह किन्नर ही बने, यह सोचना ठीक नहीं.

विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति अपना सेक्स बदलने के लिए सर्जरी करवा सकता है. तकरीबन 50 किन्नरों से बात करने पर पता चला कि 84 प्रतिशत किन्नर ‘जेंडर आईडेंटिटी डिसऑर्डर’ के शिकार हैं. उनकी इस मनोदशा को शुरुआती अवस्था में ही इलाज द्वारा सुधारा जा सकता है. असल में किन्नर ‘थर्ड जेंडर’ में आते हैं जबकि ‘जेंडर डिस्फोरिया’ में व्यक्ति ‘सिंगल जेंडर’ का होता है.

जेंडर आईडेंटिटी डिसऑर्डर को समझने के लिए आपको L,G,B,T,I,Q समझना होगा आइये देखते है ये क्या है.

L – ‘लेस्बियन’: जब एक औरत को एक और औरत से ही प्यार हो तो उन्हें ‘लेस्बियन’ कहते हैं.
आम तौर पर माना जाता है कि किन्हीं दो ‘लेस्बियन’ पार्टनर्स में एक का व्यक्तित्व आदमी जैसा होगा जिसे ‘बुच’ कहा जाता है. वो पैंट-शर्ट पहनती होगी और छोटे बाल रखना पसंद करेंगी.

दूसरी पार्टनर की शख़्सियत औरत जैसी होगी जिसे ‘फेम’ कहा जाता है. वो स्कर्ट-सूट-साड़ी पहनती होगी और लंबे बाल रखना पसंद करेंगी.

पर ये पुरानी सोच है. किन्हीं दो ‘लेस्बियन’ पार्टनर्स में कैसी भी शख़्सियत हो सकती है, एक को आदमी जैसी और एक का औरत जैसी होना ज़रूरी नहीं है.

G – ‘गे’: जब एक आदमी को एक और आदमी से ही प्यार हो तो उन्हें ‘गे’ कहते हैं.
वैसे ‘गे’ शब्द का इस्तेमाल कई बार सभी समलैंगिकों यानी पूरे समुदाय, जिसमें ‘लेस्बियन’, ‘गे’, ‘बाइसेक्सुअल’ सभी शामिल हैं, के लिए भी किया जाता है. आपने अक़्सर सुना होगा ‘गे कम्यूनिटी’ या ‘गे पीपल’.

B – ‘बाईसेक्सुअल’: जब किसी मर्द या औरत को मर्द और औरत दोनों से ही प्यार हो तो उन्हें ‘बाईसेक्सुअल’ कहते हैं. यानी एक मर्द ‘बाईसेक्सुअल’ हो सकता है और एक औरत भी.

दरअसल एक इंसान की शारीरिक चाहत तय करती है कि वो L, G, B है. वहीं एक व्यक्ति का शरीर, यानी उनके जननांग तय करते हैं कि वो T, I, Q है.

T – ‘#ट्रांसजेंडर’: वो इंसान जिनका शरीर पैदा होने के व़क्त कुछ और था और जब वो बड़े होकर खुद को समझे तो एकदम उलट महसूस करने लगे.

मसलन, पैदा होने के व़क्त बच्चे के निजी अंग पुरुषों के थे और उसे लड़का माना गया. पर समय के साथ उसने खुद को समझा और पाया कि वो तो लड़की जैसा महसूस करते हैं, यानी वो ‘ट्रांसजेंडर’ हैं.

उसी तरह से पैदा होने के व़क्त बच्चे के निजी अंग औरतों के थे और उसे लड़की माना गया. पर समय के साथ जब उसने खुद को समझा और पाया कि वो तो लड़का जैसा महसूस करते हैं, तो वो ‘ट्रांसजेंडर’ हैं.

कुछ ‘ट्रांसजेंडर’ अपने मन की पहचान के हिसाब से अपना पहनावा बदल लेते हैं, उन्हें ‘क्रॉस-ड्रेसर’ भी कहा जाता है.

जो ‘ट्रांसजेंडर’ इसके लिए अपने शरीर में दवाओं और ऑपरेशन, जैसे ‘हॉर्मोन रिप्सेलमेंट थेरेपी’ और ‘सेक्स रीएसाइनमेंट सर्जरी’, के ज़रिए बदलाव करवाते हैं, उन्हें ‘ट्रांससेक्सुअल’ कहा जाता है.

एक ‘ट्रांसजेंडर’ व्यक्ति अगर आदमी या औरत से ही प्यार करे तो सिर्फ़ ‘ट्रांसजेंडर’ कहलाता है. पर अगर वो समलैंगिक चाहत रखें तो उसके मुताबिक वो ‘लेस्बियन ट्रांसजेंडर’, ‘गे ट्रांसजेंडर’ या ‘बाईसेक्सुल ट्रांसजेंडर’ हो सकते हैं.

वैसे ट्रांसजेंडर, क्रॉस-ड्रेसर, ट्रांससेक्सुअल, ये सब पश्चिमी शब्द हैं. भारत में ट्रांसजेंडर्स को हिजड़ा या किन्नर कह कर ही बुलाया जाता है.

हिजड़ा एक ख़ास समुदाय का नाम है. जिनके अपने कायदे-तौर-तरीके और परिवार की तरह एक-दूसरे का ख़्याल रखने की सभ्यता जुड़े हैं.
हिजड़ा, अरावनी, कोथी, शिव-शक्ति और जोग्ती हिजड़ा – ये देश के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे ऐसे समुदायों के स्थानीय नाम हैं.

I – ‘इंटर-सेक्स’: पैदाइश के व़क्त जिस व्यक्ति के निजी अंगों से ये साफ़ नहीं होता कि वो पुरुष हैं या औरत, उन्हें ‘इंटर-सेक्स’ कहते हैं.
डॉक्टर को उस व़क्त जो सही लगता है उस बच्चे को उसी लिंग का मान लिया जाता है और वैसे ही बड़ा किया जाता है.
बड़े होने के बाद जब उस इंसान को समझ में आ जाए कि वो कैसा महसूस करता है, वो खुद को आदमी, औरत या ‘ट्रांसजेंडर’, कुछ भी मान सकता है.

साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फ़ैसले में ‘ट्रांसजेंडर्स’ को तीसरे लिंग की पहचान दी जिसके तहत उन्हें नौकरियों, शिक्षा वगैरह में आरक्षण दिए जाने की सिफारिश की.
इस फ़ैसले के मुताबिक ‘थर्ड जेंडर’ यानी तीसरे लिंग में ‘ट्रांसजेंडर’, ‘ट्रांससेक्सुअल’, ‘क्रॉस-ड्रेसर’ और ‘इंटर-सेक्स’, ये सभी शामिल हैं।

Q – ‘क्वीयर’: जो इंसान ना अपनी पहचान तय कर पाए हैं ना ही शारीरिक चाहत, यानी जो ना खुद को आदमी, औरत या ‘ट्रांसजेंडर’ मानते हैं और ना ही ‘लेस्बियन’, ‘गे’ या ‘बाईसेक्सुअल’, उन्हें ‘क्वीयर’ कहते हैं.
‘क्वीयर’ के ‘Q’ को ‘क्वेश्चनिंग’ भी समझा जाता है यानी वो जिनके मन में अपनी पहचान और शारीरिक चाहत पर अभी भी बहुत सवाल हैं.

विशेष

भारत में ट्रांसजेंडर कम्युनिटी को उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में तमाम तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. घर परिवार से लेकर, स्कूल-कॉलेज, ऑफिस, मार्केट हर जगह. यही वजह है कि उन्हें बाकी इंसानों की तरह सामान्य जिंदगी जीने में काफी मुश्किल होती है.

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि हमारी सोसाइटी में अधिकतर लोगों को सही से पता ही नहीं होता कि ये ट्रांसजेंडर होते क्या हैं. भारत के संविधान के भाग-III में अनुच्छेद 14 के अंतर्गत सभी व्यक्तियों को विधि के समक्ष समता की गारंटी प्रदान की गई है, अनुच्छेद 15 का खंड (1) और खंड (2) तथा अनुच्छेद 16 का खंड (2) अन्य बातों के साथ लिंग के आधार पर विभेद का प्रतिषेध और अनुच्छेद 19 का खंड (1) वाक् स्वातंत्र्य विषयक अधिकारों का संरक्षण प्रदान करता है.

ध्यातव्य है कि संविधान पुरुष और महिला के बीच लैंगिक विभेद का प्रतिषेध करता है, किंतु ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिंगीय अस्पष्टता के कारण इन्हें संविधान द्वारा प्रदत्त हक भी पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं हैं जिससे प्रायः विभेद का सामना करना पड़ता है. ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा और उनके कल्याण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2016’ को मंजूरी प्रदान की. इस विधेयक का उद्देश्य ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षणिक सशक्तिकरण हेतु एक ढांचा विकसित करना है, जिससे उन्हें समाज की मुख्य धारा में जोड़ने तथा उनके साथ होने वाले भेदभाव को रोकने में मदद प्राप्त हो सके.

एक अपील — ट्रांसजेंडर्स ये समस्या वो खुद नहीं चुनते

ये प्राकृतिक कारणों से होता है जैसे कोई भयावह बीमारी हम खुद नहीं चुनते बल्कि किन्हीं कारणों /कारकों की वजह से होता है. तो इन्हें नकारने की बजाय समाज की मुख्य धारा में शामिल करने की कोशिश कीजिये.

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