अराजकता से ही निकलता है सारा सृजन

विधियां तो मात्र उपाय हैं, मैं फिर से दोहराता हूं. तुम यदि तैयार हो तो कोई भी विधि काम दे जाएगी. वे तो बस तरकीबें हैं कि छलांग लेने में तुम्हारी मदद की जा सके – बस ऐसे ही जैसे जंपिंग बोर्ड. किसी भी जंपिंग बोर्ड से तुम सागर में छलांग लगा सकते हो.

जंपिंग बोर्डों का कोई महत्व नहीं हैं : वे किस रंग के हैं, किस लकड़ी के बने हैं, इस सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता. वे तो बस जंपिंग बोर्ड हैं और उनसे तुम छलांग लगा सकते हो.

ये सारी विधियां जंपिंग बोर्ड हैं और उनसे तुम छलांग लगा सकते हो. ये सारी विधियां जंपिंग बोर्ड हैं. जो भी विधि तुम्हें जंचती है, उसके बारे में सोचते मत रहो, उसे करो.

और जब तुम कुछ करते हो तो कठिनाइयां आनी शुरू होंगी अगर कुछ न करो तो कोई कठिनाई आने वाली नहीं है. सोचना तो बहुत आसान है, क्योंकि तुम सच में यात्रा नहीं कर रहे, लेकिन जब तुम कुछ करते हो तो कठिनाइयां आती हैं.

तो अगर तुम पाओ कि कठिनाइयां आ रही हैं तो समझना कि तुम ठीक रास्ते पर हो – कुछ हो रहा है तुम्हें. फिर पुरानी सीमाएं टूटेंगी, पुरानी आदतें विदा होंगी, परिवर्तन आएगा, उथल-पुथल और अराजकता होगी. सारा सृजन अराजकता से ही निकलता है. तुम्हारा नया सृजन तभी होगा जब वह सब अस्तव्यस्त हो जाए जो तुम अभी हो.

कोई भी विकास बिना कठिनाई के नहीं होता और आध्यात्मिक विकास तो बिना कठिनाई के हो ही नहीं सकता, वह उसका स्वभाव नहीं है, क्योंकि आध्यात्मिक विकास का अर्थ है ऊपर की ओर विकसित होना, आध्यात्मिक विकास का अर्थ है अज्ञात में पहुंचना, अज्ञात में प्रवेश करना. कठिनाइयां तो आएंगी. लेकिन याद रखो कि हर कठिनाई के साथ-साथ तुम मजबूत होते हो. तुम और ज्यादा ठोस हो जाते हो.

अभी की अपनी स्थिति में तो तुम एक लहर की तरह हो, हर क्षण बदल रहे हो, कुछ भी स्थिर नहीं है. वास्तव में तुम किसी ‘मैं’ का दावा नहीं कर सकते – वह तुम्हारे पास है ही नहीं. तुम बहते हुए बहुत सारे ‘मैं’ हो, जैसे कोई नदी बह रही हो. अभी तुम एक भीड़ हो, व्यक्ति नहीं. लेकिन ध्यान तुम्हें व्यक्ति बना सकता है ‘इंडिविजुअल’ बना सकता है.

यह ‘इंडिविजुअल’ शब्द प्यारा है : इसका अर्थ है इंडिविजिबल, अविभक्त. अभी तो जैसे तुम हो, बंटे-बंटे हो. तुम बहुत सारे खंड हो जो बिना किसी केंद्र के एक साथ चिपके हुए हैं, तुम एक ऐसा घर हो जिसमें कोई मालिक नहीं है सिर्फ नौकर ही नौकर हैं और एक क्षण के लिए कोई भी नौकर मालिक बन सकता है.

हर क्षण तुम भिन्न हो, क्योंकि तुम हो ही नहीं – और जब तक तुम नहीं हो, दिव्य तुम्हें घटित नहीं हो सकता . घटित होगा किसे? तुम तो हो ही नहीं.

मेरे पास लोग आते हैं और कहते हैं, हम परमात्मा को देखना चाहेंगे. मैं उनसे कहता हूं, देखेगा कौन? तुम तो हो ही नहीं. परमात्मा तो हमेशा मौजूद है, लेकिन देखने के लिए तुम वहां नहीं हो. यह केवल एक उड़ता-उड़ता विचार है कि तुम परमात्मा को देखना चाहते हो. अगले ही क्षण वे बिलकुल भी उत्सुक नहीं रह जाते; अगले ही क्षण वे सब भूल चुके होते हैं.

एक सतत, सघन प्रयास और अभीप्सा चाहिए. फिर कोई भी विधि काम दे जायेगी.

ओशो

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