‘जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहाँ हैं’ गाने वाले दोगले कहाँ हैं?

पहले उसे मारा गया, फिर सर फाड़ दिया गया, उसके गुप्तांग काट दिए गए, फिर उसके चेहरे पर खौलता तेल डाला गया, और अंततः एक झील में लाश को फेंक दिया गया. उम्र 21 साल, धर्म से हिन्दू, मारने वाले मुसलमान. दंगों में ये सब होता रहता है. पुलिस के अनुसार ये एक ‘नॉर्मल मर्डर’ है. ख़बर कर्नाटक की है.

परेश मेस्ता की छोटी सी ख़बर कल बताई थी आपको. सोचा था कि जिस बेरहमी से हत्या हुई है, और साम्प्रदायिक एंगल से इनकार नहीं किया जा सकता, कई लोग ट्वीट करेंगे, कहेंगे कि पेट ऐंठ रहा है, आई फ़ील सिक इन द स्टोमक्… ट्वीट और आउटरेज खूब हुआ लेकिन उनकी तरफ से नहीं जो गौरी लंकेश, रोहित वेमुला, नजीब अहमद (आप समझ ही गए होंगे) आदि के समय हाय-तौबा मचाकर, बिना जाँच के फ़ैसला सुना देते हैं.

क्या आपातकाल आज आएगा उसी स्टूडियो में जहाँ परम्परागत तौर पर सप्ताह में एक बार तो आ ही जाता है? क्या उनके मुँह से बोली छूटेगी जो ये कहते फिरते हैं कि माइनॉरिटी सुरक्षित नहीं है? क्या इस देश में माइनॉरिटी ही सुरक्षित नहीं है, या फिर ऐसी हर जघन्य हत्या पर आवाज उठनी चाहिए?

मैं किसी शंभूलाल द्वारा किसी मुसलमान की काटकर, आग लगाकर मार देने की भी निंदा करता हूँ, और परेश, डॉक्टर नारंग, प्रशांत पुजारी जैसे दसियों हिन्दुओं की मुसलमानों द्वारा की गई हत्या की भी.

लेकिन ये दोगले वामपंथी, माओ की नाजायज़ औलादें, जो बुक्का फाड़कर, संवेदना से नहीं बल्कि राजनीति से प्रेरित होकर, रोते दिखते हैं, ट्वीट करते हैं, पोस्ट लिखते हैं, वो क्या आज भी पोस्ट लिखते नज़र आ रहे हैं?

वो दोगले विचारवाले बुद्धिजीवी आज शायरी लिखते नज़र आते हैं, जबकि गौरी लंकेश के समय दिन में दस पोस्ट लिख रहे थे. वो आज किसी संगीत के सुरों की व्याख्या करते दिखेंगे, किसी किताब की कतरन लगाएँगे और बताएँगे कि फ़लाँ जगह से सूर्यास्त कितना मनोभावन होता है और दुनिया के रोजगार से बाहर निकलकर हमें जीना चाहिए.

इनकी दोगलई की टाइमिंग लाजवाब है. इसीलिए इनको लगातार गरियाते रहिए. ये आपके टाइमलाइन पर होंगे. ये वही हैं जो मुसलमान की हत्या वाले पोस्ट पर कमेंट में शोक प्रकट करेंगे और बाकी समय ऐसे गायब हो जाएँगे जैसे गधे के सर से सींग.

परेश मेस्ता भी आदमी था. उसका भी एक परिवार था. रंजिश में की गई हत्या गोली मारकर, छुरा घोंपकर, पत्थर से कुचलकर होती है. इतने वीभत्स तरह की हत्या का मक़सद संदेश देना होता है.

और जो ऐसी हत्याओं पर चुप हैं, वो इसके भागीदार हैं. वो सबसे ऊँचे दर्जे के हिंसक व्यक्ति हैं. वो पोटेंशियल हत्यारे हैं, साम्प्रदायिक तत्व हैं, क्योंकि इनके लिए इन्सानों में फ़र्क़ हैं. मेरे लिए नहीं है.

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