एक आडम्बर से बचने के लिये दूसरे आडम्बर को गले लगा लेना तो हास्यास्पद

एक वामपंथी विचारक समझा रहे हैं कि हिन्दू धर्म में आडम्बर और अंधविश्वास भरा पड़ा है. इसीलिये लोग उकता कर इसे छोड़ देते हैं.

हो सकता है कुछ लोग उनकी विचारधारा से सहमत हों. पर मैं नहीं मानता कि अगर मां जन्म देने के बाद बीमार पड़ जाय तो उसका इलाज करने के बजाय उसे छोड़ देना चाहिए.

फिlहाल मैं यहाँ आडम्बर और अंधविश्वास पर बात कर रहा हूँ.

एक बार मैं अपने गांव की दलित बस्ती से होकर गुजर रहा था. वहां पर सूबेदार राम के दरवाजे पर बगल के ईसाई मिशन से कुछ मिशनरी चंगाई कार्यक्रम का आयोजन कर रहे थे. आयोजन लगभग अन्तिम चरण में था.

एक सफेद चोगा पहले हुये व्यक्ति ने बगल में रखे कटोरे के पानी में बीच से चीरा लगाये हुये मूली के टुकड़े को डूबाकर चूसा और फिर उसी कटोरे के पानी में रखकर लोगों से कहा कि “यह प्रभु येशू के पवित्र मेमने का प्रसाद है. आप सभी लोग इसे ग्रहण कीजिये.”

इसके बाद सभी लोग लाईन लगाकर एक-एककर आते और मूली को चूसकर फिर उसे पानी में रख देते.

अब इसे क्या कहा जायेगा? क्या यह आडम्बर या अंधविश्वास है या नहीं? क्योंकि पश्चिम के देशों में एक ओर जहाँ साफ सफाई और स्वास्थ्य पर बहुत ध्यान दिया जाता है वहीं उनके लोगों द्वारा एक ही मूली को पचासों लोगों से चुसवाया जा रहा था. क्या इससे एक के मुँह की बीमारी दूसरे में नहीं जाती?

मदर टेरेसा को संत घोषित करने से पहले चमत्कार करके दिखाना पड़ता है. और भी कुछ देखना हो तो पाल दिनाकरन का चंगाई कार्यक्रम देख लीजिये.

कुछ इसी तरह के हाल मुसलमानों में भी हैं. बल्कि देखा जाय तो सबसे अधिक हैं. खतना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.

कहने का मतलब यह है कि आडम्बर और अंधविश्वास सभी जगहों पर कमोबेश उपलब्ध है.

जरूरत उस आडम्बर और अंधविश्वास से लड़कर उसे दूर करने की है. बजाय इसके एक आडम्बर से बचने के लिये दूसरे आडम्बर को गले लगा लेना तो हास्यास्पद लगता है.

और वह भी इसलिये क्योंकि आडम्बरों और अंधविश्वास से लड़ने की छूट भी सिर्फ हिन्दू धर्म में ही है. बाकी तो अभी भी लकीर के फकीर बने हुये हैं.

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