गुरु शिरोमणि आचार्य चाणक्य -1 : चाणक्य का नाम कौटिल्य क्यों

चाणक्य ईसापूर्व 371चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री थे जिनकी वजह से चंद्रगुप्त को मगध का साम्राज्य मिला. उन्हें विष्णुगुप्त और कौटिल्य के नाम से भी जाना जाता है कुछ अज्ञानी परम ज्ञानी कौटिल्य को कुटिल से जोड़ देते है तो आइये सबसे पहले कौटिल्य की व्याख्या जान लेते हैं-

चाणक्य का नाम कौटिल्य क्यों

कुटल वंश का होने के कारण चाणक्य को कौटल्य नाम से बुलाया गया और इसका उल्लेख विष्णु पुराण में इस श्लोक में है —

तान्नदान् कौटल्यो ब्राह्मणस्समुद्धरिष्यति.

इसके अतिरिक्त इसकी पुष्टि कामन्दकीय नीतिशास्त्र में कहा गया है—

कौटल्य इति गोत्रनिबन्धना विष्णु गुप्तस्य संज्ञा
अर्थात विष्णुगुप्त को कौटिल्य नाम गोत्र के कारण मिला

क्या चाणक्य ने सिर्फ अर्थशास्त्र की रचना की

चाणक्य ने ज्योतिष के लिए – विष्णुगुप्त सिद्धांत

आयुर्वेद पर एक ग्रंथ — वैद्यजीवन

नीतिशास्त्र के लिए — नीतिसार(कामन्दक ने संग्रह किया)

समाज शास्त्र के लिए — बोधिचाणक्य

इसके अलावा — वृद्धचाणक्य, लघुचाणक्य, मण्डल सिद्धांत, सप्तक सिद्धान्त और चाणक्यनीति भी बहुत महत्वपूर्ण है.

चाणक्य ने ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के लिए ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रमों का विधान किया है. किन्तु जब तक किसी व्यक्ति के ऊपर घरेलू दायित्व है, तब तक उसे वानप्रस्थ या संन्यास आश्रम में नहीं जाना चाहिए, ऐसा उनका मत है. इसी प्रकार जो स्त्रियां सन्तान पैदा कर सकती हैं, उन्हें संन्यास ग्रहण करने का उपदेश देना कौटिल्य की दृष्टि में अनुचित है.

और इसके लिए उन्होंने एक मोनिटरिंग सिस्टम भी बनाया था ताकि समाज अपने दायित्वों से भागे न ………सनातन धर्म के लिए उन्होंने अनेको वैदिक ग्रंथो के भाष्य किये —
और ग्रंथों के अंत में ‘कौटिल्येन कृतं शास्त्रम्’ तथा प्रत्येक अध्याय के अन्त में ‘इति कौटिलीयेऽर्थशास्त्रे’ लिखकर अपना मत रखा है और अन्त में ‘इति कौटिल्य’ अर्थात् कौटिल्य का मत है लिखा है ..

चाणक्य का जीवन

मगध पर क्रूर धनानंद का शासन था, जो बिम्बिसार और अजातशत्रु का वंशज था. सबसे शक्तिशाली शासक होने के बावजूद उसे अपने राज्य और देश की कोई चिंता नहीं थी. अति विलासी और हर समय राग-रंग में मस्त रहने वाले इस क्रूर शासक को पता नहीं था कि देश की सीमाएं कितनी असुक्षित होकर यूनानी आक्रमणकारियों द्वारा हथियाई जा रही है. हालांकि 16 महाजनपदों में बंटें भारत में उसका जनपद सबसे शक्तिशाली था.

बौद्ध काल तथा परवर्तीकाल में उत्तरी भारत का सबसे अधिक शक्तिशाली जनपद था. पहले इसकी राजधानी थी गिरिव्रज (राजगीर) बाद में इसकी राजधानी बनी पाटलीपुत्र. इस राज्य में अति प्रसिद्ध एक नगर था- वैशाली नगर. यहां की एक नगरवधू विश्‍व प्रसिद्ध थी जिसे आम्रपाली कहा जाता था. आम्रपाली बौद्ध काल में वैशाली के वृज्जिसंघ की इतिहास प्रसिद्ध राजनृत्यांगना थी.

पहले इस मगध पर वृहद्रथ के वीर पराक्रमी पुत्र और कृष्ण के दुश्मनों में से एक जरासंध का शासन था जिसके संबध यवनों से घनिष्ठ थे. जरासंध के इतिहास के अंतिम शासक निपुंजय की हत्या उनके मंत्री सुनिक ने की और उसका पुत्र प्रद्योत मगध के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ.

प्रद्योत वंश के 5 शासकों के अंत के 138 वर्ष पश्चात ईसा से 642 वर्ष पूर्व शिशुनाग मगध के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ. मगध के राजनीतिक उत्थान की शुरुआत ईसा पूर्व 528 से शुरू हुई, जब बिम्बिसार ने सत्ता संभाली. बिम्बिसार के बाद अजातशत्रु ने बिम्बिसार का कार्यों को आगे बढ़ाया.

अजातशत्रु ने विज्यों (वृज्जिसंघ) से युद्ध कर पाटलीग्राम में एक दुर्ग बनाया. बाद में अजातशत्रु के पुत्र उदयन ने गंगा और शोन के तट पर मगध की नई राजधानी पाटलीपुत्र नामक नगर की स्थापना की. पा‍टलीपुत्र के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुए नंद वंश के प्रथम शासक महापद्म नंद ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की और मगध साम्राज्य के अंतिम नंद धनानंद ने उत्तराधिकारी के रूप में सत्ता संभाली. बस इसी अंतिम धनानंद के शासन को उखाड़ फेंकने के लिए चाणक्य ने शपथ ली थी. हलांकि धनानंद का नाम कुछ और था लेकिन वह धनानंद नाम से ज्यादा प्रसिद्ध हुआ.

तमिल भाषा की एक कविता और कथासरित्सागर अनुसार नंद की ’99 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं’ का उल्लेख मिलता है. कहा जाता है कि उसने गंगा नदी की तली में एक चट्टान खुदवाकर उसमें अपना सारा खजाना गाड़ दिया था.

मगध के सीमावर्ती नगर में एक साधारण ब्राह्मण आचार्य चणक रहते थे. चणक को हर वक्त देश की चिंता सताती रहती थी. एक ओर जहां यूनानी आक्रमण हो रहा था तो दूसरी ओर पड़ोसी राज्य मालवा, पारस, सिंधु तथा पर्वतीय प्रदेश के राजा भी मगध का शासन हथियाना चाहते थे.

चणक ने तय किया था कि मैं अपने पुत्र कौटिल्य को ऐसी शिक्षा दूंगा कि राज्य और राजा उसके सामने समर्पण कर देंगे. चणक चाहते थे किसी तरह महामात्य के पद तक पहुंचना. इसके लिए उन्होंने अपने मित्र अमात्य शकटार से मंत्रणा कर धनानंद को उखाड़ फेंकने की योजना बनाई. अमात्य शकटार महल का द्वारपालों का प्रमुख था.

लेकिन गुप्तचर के द्वारा महामात्य राक्षस और कात्यायन को इस षड्‍यंत्र का पता लग गया. गुप्त संदेश द्वारा चणक और शकटार की मुलाकात का पता चल गया. उसने धनानंद को इस षड्‍यंत्र की जानकारी दी. दरअसल, शकटार के खुद के भरोसेमंद द्वारपाल देवीदत्त ने यह गुप्त सूचना पहुंचाई थी.

महामात्य ने देवीदत्त से चणक की सारी जानकारी ली और उन्होंने चणक को बंदी बना लिए जाने का आदेश दिया. यह बात सबसे पहले चणक के पुत्र कौटिल्य को पता चली जबकि वे बहुत ही छोटी उम्र के थे. चणक को बंदी बना लिया गया और राज्यभर में खबर फैल गई कि राजद्रोह के अपराध में एक ब्राह्मण की हत्या की जाएगी.

चणक का कटा हुआ सिर राजधानी के चौराहे पर टांग दिया गया. पिता के कटे हुए सिर को देखकर कौटिल्य (चाणक्य) की आंखों से आंसू टपक रहे थे. उस वक्त चाणक्य की आयु 14 वर्ष थी. रात के अंधेरे में उसने बांस पर टंगे अपने पिता के सिर को धीरे-धीरे नीचे उतारा और एक कपड़े में लपेटा.

अकेले पुत्र ने पिता का दाह-संस्कार किया. तब कौटिल्य ने गंगा का जल हाथ में लेकर शपथ ली- ‘हे गंगे, जब तक हत्यारे धनानंद से अपने पिता की हत्या का प्रतिशोध नहीं लूंगा तब तक पकाई हुई कोई वस्तु नहीं खाऊंगा. जब तक महामात्य के रक्त से अपने बाल नहीं रंग लूंगा तब तक यह शिखा खुली ही रखूंगा. मेरे पिता का तर्पण तभी पूर्ण होगा, जब तक कि हत्यारे धनानंद का रक्त पिता की राख पर नहीं चढ़ेगा…. हे यमराज! धनानंद का नाम तुम अपने लेखे से काट दो. उसकी मृत्यु का लेख अब मैं ही लिखूंगा.’

चाणक्य का नाम विष्णुगुप्त कैसे

प्रतिशोध की ज्वाला में जल रहे चणक पुत्र कौटिल्य जब एक जंगल में मूर्छित पड़े थे तब एक पंडित ने उनके चेहरे पर पानी छींटा, तब चेतना जाग्रत हुई. ऋषि ने पूछा- बेटा तेरा नाम क्या है? कौटिल्य ने सोचा- कौटिल्य या चणक नाम इस पंडित को पता नहीं चले अन्यथा धनानंद को पता चलता रहेगा कि मैं कौन हूं, यही सोचकर कौटिल्य ने अपना नाम बताया-विष्णुगुप्त.

विष्णुगुप्त ने कहा कि मैं कई दिनों से भूखा हूं, चक्कर आने पर गिर गया था. दयालु ईश्‍वर, आप मुझ अनाथ पर कृपा करें. पंडित ने कहा- कोई बात नहीं, तुम मेरे साथ चलो. मैं एक गांव का अध्यापक हूं और मैं भी अकेला हूं.

उन विद्वान पंडित का नाम था राधामोहन. राधामोहन ने विष्णुगुप्त को सहारा दिया. राधामोहन के गांव में कुछ दिनों तक रहने के बाद उन्होंने विष्णुगुप्त से कहा, मेरे एक सहपाठी पुण्डरीकाक्ष हैं, जो आजकल तक्षशिला (पाकिस्तान के रावलपिंडी जिले में) में आचार्य के पद पर हैं. मैं तुम्हें उनके नाम एक पत्र लिखता हूं. ईश्वर ने चाहा तो तुम्हारी प्रतिभा के आधार पर तुम्हारा चयन हो जाएगा.

इस तरह चाणक्य ने तक्षशिला विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए अपने जीवन का पहला कदम बढ़ाया.

समय बीतता गया और अपने ज्ञान, विनम्रता, निष्ठा और लगन के बल पर विष्णुगुप्त ने सभी आचार्यों और विद्यार्थियों का दिल जीत लिया. इस विद्यालय में जहां देश-विदेश के धनाढ्‍य लोगों के पुत्र पढ़ने आते थे वहीं राजा-महाराजा के पुत्र भी पढ़ते थे.

अंत में विष्णुगुप्त कुलपति के अनुरोध पर इस विश्वविद्यालय के आचार्य पद पर आसीन हुए. जब विष्णुगुप्त आचार्य थे, तब सिकंदर का आक्रमण हुआ था. मातृभूमि की रक्षा के लिए विष्णुगुप्त ने सभी राजाओं से पोरस की रक्षा करने का आह्वान किया. सबसे शक्तिशाली राजा धनानंद ही था. उस वक्त चाणक्य उर्फ विष्णुगुप्त की उम्र लगभग 45 वर्ष की थी और उस वक्त तक्षशिला का राजा अम्भी था. अभ्मी तो पोरस (पुरु) से ईर्ष्या रखता था तो वो क्यों साथ देता..

इस युद्ध के बाद विष्णुगुप्त अपने गृह प्रदेश मगध चले गए.
चणक पुत्र कौटिल्य के रूप में पहचान लिए जाने के डर से विष्णुगुप्त ने अपने नगर तक्षशिला के बाहर ही रहना पसंद किया. एक दिन उनके पैर में एक कांटा चुभने पर वे कांटे के संपूर्ण मार्ग पर मट्ठा डाल रहे थे तब एक वृद्ध ने कहा- कांटों पर गुस्सा क्यों करते हो ब्राह्मण? विष्णुगुप्त ने सिर उठाकर देखा तो वे चौंक गए, क्योंकि यह तो उनके पिता का मित्र शकटार, जो अब बेहद ही वृद्ध हो चला था.

दोनों ने एक-दूसरे को पहचानने का प्रयास किया. विष्णुगुप्त शकटार को अपनी कुटिया में ले गए और पहले उन्होंने राज्य के हाल-चाल जाने. शकटार ने कहा- धनानंद तो अब और भी विलासिता और निरंकुशता में रहता है और अब राज्य का वास्तविक शासक तो महामात्य राक्षस ही है. राक्षस ने प्रतिशोध करने वाले सभी लोगों को मार दिया.

अंत में चाणक्य ने शकटार को बताया कि मैं ही कौटिल्य हूं, तब चाणक्य ने शकटार के रथ में बैठकर अपने नगर का भ्रमण किया. राजमहल भी देखा और राजदरबार की व्यवस्था भी देखी. उस समय राजदरबार में नर्तकियां नृत्य कर रही थीं.

इसके बाद राज्य की साप्ताहिक समीक्षा की कार्रवाई शुरू हुई. विष्णुगुप्त से यह सब नृत्य और राजा की चाटुकारिता देखी नहीं गई और रोष में भरकर वे दरबार के मध्य में आ गए. इस अज्ञात ब्राह्मण को देख सभी चौंक गए. सांवला लेकिन तेजयुक्त शरीर, केशहीन सिर पर खुली हुई शिखा, गले में रुद्राक्ष की माला, यज्ञोपवीत आदि देख राजा भी चौंका और संभलकर प्रश्न किया- ‘क्या बात है ब्राह्मणदेव! आप कौन हैं? कहां से आए हैं?’

चाणक्य ने उस दरबार में क्रोधवश ही अपना परिचय तक्षशिला के आचार्य के रूप में दिया और राज्य के प्रति अपनी चिंता व्यक्त की. उन्होंने यूनानी आक्रमण की बात भी बताई और शंका जाहिर की कि यूनानी हमारे राज्य पर भी आक्रमण करने वाला है. इस दौरान उन्होंने राजा धनानंद को खूब खरी-खोटी सुनाई.

विष्णुगुप्त की बात सुनकर राजा भड़क गया और उसने कहा- इस मूर्ख ब्राह्मण को कौन लाया है यहां पर? तब शकटार खड़े हुए और उन्होंने कहा- महाराज क्षमा! मैं तक्षशिला के मार्तण्ड ब्राह्मण को आपके यहां लाया था. इन्हें आचार्य विष्णुगुप्त कहते हैं जिनके ज्ञान की चर्चा दूर-दूर तक है और जो रसायन, ज्योतिष, अर्थशास्त्र आदि के प्रकांड विद्वान हैं.

राजा ने चाणक्य को देखकर उपहास किया- प्रकांड पंडित… मार्तण्ड विद्वान… यह कुरूप और शक्तिहीन काला ब्राह्मण? अरे शकटार क्यों आचार्य विष्णुगुप्त को बदनाम और अपमानित करते हो? राजा के उपहास उड़ाने के साथ ही सभी चाटुकारी दरबारी भी जोर-जोर से हंसने लगते हैं.

तब विष्णुगुप्त अपनी शपथ को धनानंद के समक्ष दोहराते हैं. इससे पूर्व कि राजा चाणक्य को बंदी बनाने के आदेश देते, विष्णुगुप्त तेज कदमों से चलकर महल से बाहर निकल आते हैं.

शकटार के द्वार पर एक रात्रि एक बेहद वृद्ध भिक्षु आकर रुकता है और द्वारपाल से कहता है कि जाओ शकटार से कहो कि ‘कौटिल्य’ आया है आपसे मिलने. चाणक्य ने वेश बदल लिया था.

चाणक्य जानते थे कि इस वक्त राजा के सैनिक विष्णुगुप्त को खोज रहे हैं और कौटिल्य नाम से केवल शकटार ही जानते थे. यह अजीब संयोग ही था कि पिता के साथ हुई घटना कौटिल्य दोहरा रहा था. उसके पिता ने भी इसी तरह रात्रि में शकटार से मंत्रणा की थी और बाद में उनका सिर कलम कर दिया गया था.

शकटार को जब यह पता चला तो वे चौंक गए और फिर सहज भाव से कहा- आने दो उसे ‍भीतर. भीतर जब कौटिल्य पहुंचे तो शकटार ने कहा तुम ये क्या कर रहे हो? तुम्हें किसी ने देख लिया तो हम दोनों मारे जाएंगे. चाणक्य ने कहा कि कुछ नहीं होगा तुम निश्‍चिंत रहो.

तब शकटार और चाणक्य के बीच धनानंद के शासन को उखाड़ फेंकने पर विचार-मंत्रणा हुई. तब चाणक्य ने कहा कि हमें मगध के भावी शासक की खोज करना होगी. बड़े सोच विचार के बाद इस दौरान शकटार ने बताया कि एक युवक है, जो धनानंद के अत्याचारों से त्रस्त है. उसका नाम है-चंद्रगुप्त.

विशेष

चाणक्य शब्द कान में पड़ते ही मानस-मुकुट पर एक ऐसी मूर्ति प्रतिबिम्बित हो उठती है जिसका निर्माण मानो विद्या, वैदग्ध, दूरदर्शिता, राजनीति तथा दृढ़ निश्चय के पंच-तत्वों से हुआ था.

महर्षि चाणक्य एक व्यक्ति होने पर भी अपने में एक पूरे युग थे. उन्होंने अपनी बुद्धि एवं संकल्पशीलता के बल पर तात्कालिक मगध सम्राट् नन्द का नाश कर उसके स्थान पर एक साधारण बालक को स्वयं शिक्षित कर राज सिंहासन पर बिठाया.

चाणक्य न तो कोई धनवान थे और न उनका कोई सम्बन्ध किसी राजनीतिक सूत्रधार से था. वे केवल एक साधारणतम व्यक्ति – एक गरीब ब्राह्मण थे. बाल्यकाल में चाणक्य में कोई विशेषता न थी. विशेषता थी तो केवल इतनी कि वे अपनी माँ के भक्त, विद्या-व्यसनी तथा संतोषी व्यक्ति थे. वे जो कुछ खाने पहनने को पा जाते उसी में सन्तोष रखकर विद्याध्ययन करते हुये अपनी ममतामयी माता की सेवा किया करते थे.

उनकी मातृ भक्ति, विद्या व्यसन तथा दृढ़ संकल्प की अनेक कथायें प्रसिद्ध हैं. एक बार, जिस समय वे केवल किशोर ही थे, अपनी माँ को एक पुस्तक सुनाते-सुनाते हँस पड़े. माता ने उनकी मुँह की तरफ देखा और रो पड़ी.

चाणक्य को माँ के इस अहैतुक एवं असामयिक रुदन पर बड़ा आश्चर्य हुआ. उन्होंने पूछा—”माँ तू इस प्रकार मेरे मुँह की ओर देखकर रो क्यों पड़ी?

माँ ने उत्तर दिया कि “तू बड़ा होकर बड़ा भारी राजा बनेगा और तब अपनी गरीब माँ को भूल जायेगा.”
चाणक्य ने पुनः विस्मय से पूछा—”पर तुझे यह कैसे पता चला कि मैं राजा बनूँगा”.
“तेरे आगे के दो दाँतों में राजा होने के लक्षण हैं, उन्हें ही देखकर मैंने समझ लिया कि तू राजा बनेगा”. माँ ने चाणक्य को बतलाया.

चाणक्य ने माँ की बात सुनी और बाहर जाकर पत्थर से अपने वे दोनों दाँत तोड़ डाले फिर अन्दर आकर माँ से हँसते हुये बोले “ले अब तू निश्चिन्त हो जा, मैंने राज लक्षणों वाले दोनों दाँत तोड़कर फेंक दिया. अब न मैं राजा बनूँगा और न तुझे छोड़कर जाऊँगा.” ऐसे थे चाणक्य और ऐसी थी चाणक्य की ज्वलन्त मातृ भक्ति का प्रमाण.

क्रमशः

सोर्स — ये सोर्स आगे की सीरीज के लिए भी है —

दि प्लाट इन इण्डियन क्रोनोलोजी‘ पृ. 9

भारतीय एकात्मता के अग्रदूत आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य‘

भारतवर्ष का इतिहास‘, तृतीय खण्ड, प्रथम भाग, पृ.41

क्रोनोलोजी ऑफ कश्मीर हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड‘

प्राचीन भारत‘ पृ. 101 – पादटिप्पणी

स्व. पं. रघुनन्दन शर्मा कृत ‘वैदिक सम्पत्ति‘ का पृष्ठ 94

books.google.co.in

hindi.webdunia.com

U. N. Ghosal: A History of Political Ideas. Oxford Univ. Press, Bombay. 1959.p. 84

महाभारत, 12. 161. 9

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