क्या भक्त भी कभी भगवान से झगड़ता है?

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भक्त ही झगड़ता है और कौन झगड़ेगा! भक्त ही झगड़ सकता है. और तो किस की इतनी सामर्थ्य होगी! भक्त को भय नहीं होता. प्रेम में कहा भय है? इसलिए मैं कहता हूं : तुलसीदास का वचन गलत है, जो उन्होंने कहा— भय बिन होय न प्रीति. तुलसीदास को प्रीति का पता नहीं है. जहां भय है, वहा प्रीति कैसी? और जो भय के कारण होती है प्रीति, वह कुछ और होगी, प्रीति नहीं है.

कोई डंडा लेकर खड़ा है और तुम से कहता है प्रेम करो मुझे; करोगे तुम, क्योंकि डंडा देख रहे हो, नहीं तो सिर खोल देगा. माँ बेटे से कह रही है कि मुझे प्रेम करो, मैं तेरी मां हूं और नहीं तो दूध नहीं दूंगी, भूखा मर जाएगा. बेटा भी सोचता है कि प्रेम करना पड़ेगा. यह प्रीति तो भय से हो रही है.

बाप कहता है मुझे प्रेम करो, मैं पिता हूं तुम्हारा. इस जगत में तुम्हारी जो प्रीतियां हैं, वे भय से ही हो रही है. तुलसीदास उस संबंध में सच है. लेकिन ये प्रीतियां कहा हैं? ये तो पाखंड हैं. ये तो थोथी बातें हैं, जबर्दस्ती ओढ़ ली हैं. इनमें सत्य नहीं है, प्रामाणिकता नहीं है. असली प्रीति भय से नहीं होती. और जहाँ प्रीति होती है, वहां भय नहीं होता. उनका एक साथ समागम नहीं होता. तो भक्त तो लड़ता है, जब जरूरत होती है तो वह लड़ता है, वह लड़ सकता है.

प्रेमी लड़ते हैं. लड़ने से प्रेम नष्ट नहीं होता, सघन होता है. जो प्रेम लड़ने से नष्ट हो जाए, समझो बहुत कमजोर था, था ही नहीं, काम का ही नहीं था, खतम हुआ अच्छा हुआ. हर लड़ाई के बाद जो प्रेम और प्रगाढ़ हो जाता है, वही प्रेम है. हर लड़ने के बाद और एक नया सोपान उपलब्ध होता है प्रेम का. भक्त तो खूब लड़ता है. लड़ने के कारण भी हैं. भक्त का लड़ना एकदम अकारण भी नहीं है.

रात चुपचाप दबे पांव चली जाती है
रात खामोश है रोती नहीं, हंसती भी नहीं
कांच का नीला सा गुंबद है, उड़ा जाता है
खाली—खाली कोई बजत—सा बहा जाता है
चांद की किरणों में वह रोज—सा रेशम भी नहीं
चांद की चिकनी डली है कि घुली जाती है
और सन्नाटों की इक धूल उड़ी जाती है
काश! इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
हिज्र की रातों में यह देखो तो क्या होता है

प्रेमी भी लड़ता है, भक्त भी लड़ता है. उनकी लड़ाई का सार एक है. भक्त कहता है—मैं इतनी तकलीफ में पड़ा हूं इतने विरह में पड़ा हूं कभी तुमको भी विरह सताए तो पता चले!

काश! इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
हिज्र की रातों में यह देखो तो क्या होता है

तुम्हें पता है कि मैं कितना रो रहा हूं भक्त कहता है! तुम्हें पता है कि कितने आंसू गिरा चुका हूं! तुम्हें सुनायी पड़ता है कि तुम बहरे हो? तुम तक खबर पहुंचती है या नहीं पहुंचती है? शायद तुम्हें अनुभव ही नहीं है विरह का कोई!

फिर वही रात, वही दर्द, वही गम की कसक
फिर उसी दर्द ने सीने में जलाया संदल
फिर वही यादों के बजते हैं तिलस्मी घुंघरू
दूधिया चांदनी पहने हुए अंगूरी बदन
और आवाज में पिघली हुई चांदी लेकर
कोई अनजानी—सी राहों से चला आता है

संगेमर्मर के तराशे हुए बुत जागते हैं संगेमर्मर के तराशे हुए बुत बोलते हैं

आज की रात वही दर्द की तनहाई की रात
दर्द तनहाई का शायद तुझे मालूम नहीं
काश! इक बार तो तुझको भी यह जहमत होती

प्रेमी भी यही कहता है, भक्त भी यही कहता है कि यह दर्द जो तनहाई का है, एकांत का है, अकेले हो जाने का है, इसका तुझे पता होता! शायद तू इसीलिए नहीं सुन पाता इस रुदन को, इस पुकार को, इस प्यास को, क्योंकि तुझे प्यास का कुछ पता नहीं है, क्योंकि तू कभी रोया नहीं है, तुझे आंसुओ से कुछ मुलाकात-पहचान नहीं है, तुझे हृदय की पीड़ा का कुछ अनुभव नहीं है.

दर्द तनहाई का शायद तुझे मालूम नहीं
काश! इक बार तो तुझको भी यह जहमत होती

इसलिए भक्त के पास कारण है कि वह लड़े. नाराजगी के कारण हैं. लेकिन उसकी लड़ाई में बड़ी मिठास है. उसकी लड़ाई उसकी प्रार्थना का एक ढंग है. फिर दोहरा दूं भक्त की लड़ाई उस की भक्ति का एक ढंग है, वह उसकी आराधना है. उसकी शिकायत, उसका शिकवा, सब उसकी प्रार्थना है.

ऐसा मत समझना कि वह किसी दुश्मनी से ये बातें कहता है, ये बड़े प्रेम से उठती हैं, बड़े गहरे प्रेम गहरे प्रेम उठती हैं. ये उसकी मिलन की गहरी आतुरता से उठती हैं. और कई बार खोज का रेगिस्तान इतना लंबा होता जाता है और आदमी की इतनी छोटी सी सामर्थ्य है कि अगर भक्त नाराज होकर चिल्लाने लगता है कि आखिर कब, आखिर कब मिलन होगा; कब तक चलता रहूं?

पैर टूटे जाते हैं, अब यह बोझ और ढोया नहीं जाता, और रास्ते का कोई अंत मालूम होता नहीं, और राह है कि बढ़ी जाती है, और रात है कि लंबी हुई जाती है, सुबह का कोई संदेशा मिलता नहीं, कोई किरण भी फूटती मालूम नहीं होती—और कब तक, और कब तक?

लेकिन इस सारी शिकायत के पीछे प्यास है, त्वरा है, गहन अभीप्सा है और बड़ा माधुर्य है.

– ओशो
अथातो भक्‍ति जिज्ञासा–(प्रवचन–08)

 

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