मैक्स बॉर्न और क्वांटम थ्योरी : कोई भी खोज व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती

प्रतिदिन किसी विशिष्ट व्यक्ति का जन्मदिन होता है. गूगल रोज डूडल बनाता है. आज मैक्स बॉर्न का जन्मदिन है. क्वांटम थ्योरी के विकास में मैक्स बॉर्न का अहम योगदान है. हाइज़न्बर्ग के साथ मिलकर बॉर्न ने क्वांटम थ्योरी का मैट्रिक्स स्वरुप प्रतिपादित किया था जिसमें कणों का व्यवहार गणित के मैट्रिक्स के रूप में समय के साथ विकसित होता है.

दरअसल क्वांटम थ्योरी इतनी विचित्र है कि इसे कई प्रकार से समझा और समझाया गया. सबसे पहले मैक्स प्लैंक ने ऊर्जा क्वान्टा अर्थात एनर्जी के पैकेट की खोज की जिन्हें बाद में प्रकाश के सन्दर्भ में फोटोन कहा गया.

फिर लुई डी ब्रॉय ने कहा कि साहब, प्रकाश पार्टिकल और वेव दोनों है. श्रोडिन्जर ने वेव फॉर्म को पकड़ कर वेव फंक्शन दिया. अब प्रोटोन के आसपास जहाँ-जहाँ वेव फंक्शन को हल किया जाता है वहाँ इलेक्ट्रॉन के पाए जाने की ‘प्रायिकता’ ज्ञात होती है. क्वांटम दुनिया में यह प्रायिकता भी बड़ी अजीब होती है. यह एक संख्या नहीं मिलती बल्कि प्रोबबिलिटी डिस्ट्रीब्यूशन मिलता है.

मैक्स बॉर्न के मैट्रिक्स प्रतिपादन से आगे बढ़कर पॉल डिराक साहब ने ब्रा-केट के रूप में क्वांटम थ्योरी को समझाया. डिराक ने ही पहली बार रिलेटिविटी और क्वांटम थ्योरी को मिलाकर इलेक्ट्रॉन के लिए रिलेटीविस्टिक वेव समीकरण लिखा. अर्थात जब इलेक्ट्रॉन जैसा पार्टिकल प्रकाश के वेग से चलेगा तब क्या होगा यह समझाया.

अब मान लीजिये कि एक अकेला पार्टिकल नहीं बल्कि ढेर सारे कणों वाला कोई सिस्टम है तो उसके लिए क्वांटम थ्योरी अलग प्रकार से व्यवहार करती है. ऐसे सिस्टम सुपरकंडक्टर अथवा सुपर फ्लुइड्स होते हैं.

क्वांटम सिद्धांतों को इलेक्ट्रोमैग्नेटिक (आवेश, बिजली और चुम्बक) नियमों से समझा जाए तो क्वांटम इलेक्ट्रोडायनामिक्स (QED) बन जाता है. इस विषय को मुख्यतः फ्रीमैन डायसन, सिन इटिरो टोमोनागा, रिचर्ड फेयन्मन और जूलियन श्विन्गर ने विकसित किया.

QED के विकास से हम सूक्ष्म कणों का गुण और व्यवहार- जो सेकंड के सौवें हिस्से में परिवर्तित हो जाता है- समझ पाए. इससे सृष्टि के मूलभूत कणों को जानने की प्रक्रिया सरल और रोमांचक हुई.

इस क्रम में जब अतिसूक्ष्म कण खोजे जा रहे थे तब पता चला कि प्रोटोन और न्यूट्रॉन क्वार्क से बने होते हैं. दो प्रोटोन आपस में स्ट्रांग न्यूक्लियर फ़ोर्स द्वारा चिपके होते हैं. उनके अंदर स्थित एक क्वार्क दूसरे क्वार्क से जिस गोंद द्वारा चिपका होता है उसे ‘कलर फ़ोर्स’ कहा जाता है.

इस पूरी गणित को क्वांटम क्रोमोडायनामिक्स (QCD) द्वारा समझा जाता है. इसमें हम ‘ग्लुआन’ कण के व्यवहार को समझते हैं जो कलर फ़ोर्स का वाहक होता है. QCD और QED से आगे बढ़कर क्वांटम फील्ड थ्योरी (QFT) विकसित हुई. इसमें कणों को सूक्ष्म ऊर्जा के एक क्षेत्र के रूप में देखा जाता है.

QFT और आइंस्टीन की जनरल रिलेटिविटी को एक ही थ्योरी द्वारा समझाना बीसवीं शताब्दी के गणितीय भौतिकशास्त्रियों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी. इसी क्रम में स्ट्रिंग थ्योरी का विकास हुआ.

यह थ्योरी कहती है कि कणों के अन्दर ऊर्जा के नन्हें तन्तु हैं. भारत में इसपर बहुत काम हुआ है. प्रोफ़ेसर अशोक सेन को स्ट्रिंग थ्योरी पर काम करने के लिए करोड़ों रूपये का फंडामेंटल फिजिक्स पुरस्कार मिला था. अस्तु.

क्वांटम थ्योरी हमें बहुत कुछ सिखाती है. क्वांटम थ्योरी की किसी एक व्यक्ति ने खोज नहीं की थी. इसका ‘जनक’ किसी एक व्यक्ति को नहीं माना जा सकता. यह सौ वर्षों में बहुत सारे वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गयी.

हम पदार्थ का क्वांटम व्यवहार न समझते तो सेमीकंडक्टर न बनते. कंप्यूटर नहीं बनता. नैनोतकनीकी विकसित न होती. सुपरकंडक्टर की परिकल्पना नहीं की जा सकती थी. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का समूचा व्यवसाय क्वांटम भौतिकी की देन है. लेकिन इसका श्रेय कोई एक वैज्ञानिक नहीं लेता.

विज्ञान के विकासक्रम में इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि कोई भी खोज व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होती. विज्ञान समाज के लिए है.

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