कर्नाटक में हुई इस वीभत्स हत्या पर खामोशी क्यों?

क्या आप ध्यान दे रहे है? भीड़ द्वारा मारे विधर्मी किसी न किसी संगीन अपराध के आरोपी थे (दोषी न सही, दोष सिद्ध होने की प्रक्रिया को बीच से ही रोका गया!)

अखलाक – पशु चोरी और वध
पहलू – गो-तस्करी
अफराजुल – कन्या तस्करी

इस के विपरीत धार्मिक उन्माद के शिकार सनातनी अक्सर इसी अपराध के लिए मारे जाते है कि वे अपने धर्म के अनुयायी थे.

डा. नारंग का अपराध क्या हत्या के लायक दंडनीय था?
पुणे का सावन राठौड़ किस अपराध का दोषी था?
प्रशांत पुजारी का संघ स्वयंसेवक होना क्या मृत्युदंड के पात्र था?

इसी श्रृंखला में एक और कड़ी कल जुड़ गई, पर लोग राजसमन्द पर चर्चा में इतने मशगूल थे कि ध्यान देना भूल गए!

तटवर्ती कर्नाटक के होन्नावर शहर में 1 दिसंबर को ईद-ए-मिलाद-उन्-नबी के लिए एक ‘अस्थायी प्रेषित मुहम्मद मज़ार’ बनाने पर बवाल मचा. धर्म के सारे उपदेशों के विपरीत जाते हुए ऐसे काम क्यों होते है सब को पता है – ‘अस्थायी मजार’ नाम की कोई चीज नहीं होती. जो होता है सदा के लिए होता है, सार्वजनिक भूमि का अपहार होता है.

इसलिए लोगों ने आक्षेप लिया, तो लो, बलवा हो गया! जब बात बिगड़ते बिगड़ते बनने को हुई, तब 6 तारीख को एक बाइक और एक ऑटो के भिड़ने को ले कर फिर झड़प हुई जो धार्मिक झड़प में बदल गई.

पुलिस ने जैसे तैसे एक तरफ के 28 और दुसरे तरफ के 14 लोग हिरासत में ले कर शांति बहाल की. लेकिन एक बन्दा न गिरफ्तार हुआ, न घर लौटा!

6 तारीख को पुलिस के साथ हुई शान्ति-वार्ता में वह शामिल था. बाद में भिडंत में ख़राब हुई बाइक लेने वह घटना स्थल पर गया, पर उस के बाद उस का पता न चला.

उस बन्दे का – परेश मेस्ता नामक एक 21 वर्षीय युवक का – शव 8 दिसंबर को शहर के पास एक तालाब से बरामद हुआ. उसका लिंगच्छेद हुआ था, सर फटा हुआ था, और उस पर तेल छिड़क कर आग लगा दी गई थी. इतना होने के बाद उस के शव को तालाब में फेंका गया था.

पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार पाँच व्यक्ति – इम्तियाज़, आज़ाद, आमिर, सलीम और आसिफ इस हत्या में शामिल थे.

इतना होने के बावजूद कुछ बिन-पैंदे के लोग ऐसी दलीलें दे रहे है कि यह भाजपा-संघ की विभाजनकारी नीति का एक हिस्सा है.

सवाल पूछे जा रहे है कि बिना पोस्टमोर्टेम के इसे हत्या कैसे कहा जा सकता है – जैसे मृतक के परिजन अंधे और मूर्ख है, जो फटा सर, जली काया और गायब लिंग देख नहीं सकते! और देखने के बाद भी इस को स्वाभाविक मृत्यु मान लेंगे!

इन लोगों की इस तरह की निहायत अपमानकारक दलीलें देने की हिम्मत इसलिए होती है क्योंकि इन हत्याओं के शिकारों की ओर से बुलंद आवाज़ उठाने की कभी कोशिश नहीं होती.

कोई गला फाड़ के नहीं चिल्लाता कि इस के दोषियों को फांसी होनी चाहिए. कोई नहीं कहता कि इस तरह की हत्याओं से समाज की क्षति नहीं होती.

जैसे वन में जंगली भैंसे उन में से एक का शेरों के द्वारा शिकार होते देख भी अपना चरना नहीं छोड़ते – बल्कि शिकार होने पर वे आश्वस्त हो जाते है कि शेरों की भूख तो अब मिटेगी, तो उनकी जान फिलहाल के लिए सुरक्षित है. वे आज जिएंगे, कल की मौत की लाटरी खुलने तक!

इस तरह के मवेशी जीवन से ऊपर उठने का समय आ गया है. आप विचार कीजिए और यदि ठीक लगे तो आगे भी इस बात को बताएं – यदि धर्म की रक्षा न की गई तो धर्म भी हमारी रक्षा नहीं कर सकेगा – धर्मो रक्षति रक्षितः!

समाचार आधार : https://www.deccanchronicle.com/nation/current-affairs/111217/honnavar-tense-as-saffron-leaders-give-death-a-communal-colour.html

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