घोघाबापा का प्रेत – 13

गतांक से आगे…

भेड़ों के विशाल झुण्ड के समान दहशत से भरी हुई, खांसती-काँखती यवन सेना, वन के अग्नि प्रभावित क्षेत्र से निकल कर वन्य रहित क्षेत्र में आ गई. सामने वन, कुञ्ज, लता, हरे-भरे वृक्षों से लदी हुई दो पहाड़ियां थीं, जिनके बीच से संकरी सी एक घाटी जैसा रास्ता था, जो कि इतनी बड़ी सेना के लिए कहीं से भी सुरक्षित रास्ता नहीं कहा जा सकता था.

घाटी से ही एक छिछली सी नदी बह रही थी जिसमें घुटनों भर जल बह रहा था. जल स्वच्छ और प्रचुर मात्रा में देख कर महमूद ने थकी-हारी, दिग्भ्रमित सेना को यहीं पड़ाव डालने का आदेश दे दिया तथा अपने गुप्तचरों और पथप्रदर्शकों को यहाँ से शीघ्र निकलने के लिए, घाटी के बजाए कोई दूसरा सुरक्षित, अपेक्षाकृत आसान रास्ता ढूंढने को कहा.

[घोघाबापा का प्रेत – 1]

उधर वन के अन्दर छिपी हुई प्रेतसेना की बैठक चल रही थी. यवन सेना को भरपूर क्षति पहुंचा कर भी सामन्त प्रसन्न नहीं था. महमूद के पुनः जीवित बच निकलने से वो स्वयं पर ही क्रोधित हो रहा था. उसने राजगुरु नंदीदत्त से आवेशित होकर अपनी बायीं हथेली पर दायाँ घूंसा मारते हुए पूछा, “ये हर बार महमूद जीवित क्यों बच जाता है बाबा? वो मरता क्यों नहीं?”

नंदीदत्त ने उसको समझाते हुए कहा, “पुत्र, अत्यधिक आवेशित क्रोध विवेक का शत्रु है, यह बुद्धि को खा जाता है. मन को शांत करो. वो मरता इसलिए नहीं है कि वो एक मलेच्छ मनुष्य भर नहीं है, वो हमारी ही बुराइयों द्वारा उत्पन्न हुआ दानव है जो हमारे विनाश के लिया आया है. सम्भवतः अभी हमारे पापों का फल और भुगतना है हमें. क्या पता यही महादेव की इच्छा हो.

[घोघाबापा का प्रेत – 2]

हमने भी तो अतीत में इन बर्बरों, पिशाचों पर आंख बन्द करके विश्वास किया है, गले लगाया है. और हमारे अपने ही आज स्वाभिमान बेचकर महमूद के टुकड़ों पर पलने को तैयार हैं, अपने ही सोमनाथ को नष्ट करने हेतु तैयार हैं. अपने ही वंश-भाइयों तथा संबंधियों के नाश और अपनी महिलाओं का शील-हरण करवाने को तैयार हैं.

हम समय रहते इन्हें समझा नहीं पाये या दण्ड न दे पाए. येन केन प्रकारेण हम सब भरतवंशियों की नीति, शिक्षा, चरित्र अब उत्तम कोटि की नहीं रह गई है. इसलिए स्वयं पर क्रोध करना अनुचित ही है पुत्र, क्योंकि तुमने अपना कार्य मन लगाकर पूरी श्रद्धा से किया. जो बीत गया उसे छोड़कर अब आगे की सोचो. समय अत्यंत ही कम है.“

[घोघाबापा का प्रेत – 3]

सामन्त ने थोड़े प्रयास में स्वयं को शांत करने की कोशिश की, तथा वहां उपस्थित सैनिकों की टुकड़ी से कहा, “अब यहाँ से हम लोग तीन टुकड़ियों में विभक्त हो जायेंगे. दो टुकड़ी दोनों पहाड़ियों पर चढ़कर घात लगाकर छुप जाएगी. अपने साथ पर्याप्त बड़े बड़े पत्थर, और अत्यधिक तीरों के साथ हर कोई चौकन्ना रहेगा. यवन सेना का एक भी गुप्तचर अगर दिख जाए तो वह कितनी भी क्षमा मांगे, जीवनदान मांगे, परन्तु उसे जीवित न छोड़ा जाय. तीसरी टुकड़ी मेरे साथ इसी वन में रहेगी. रात्रि के अँधेरे में हम पुनः आक्रमण कर देंगे, जिससे यवन सेना भयभीत होकर बिना कुछ सोचे विचारे, अति शीघ्रता में उस घाटी में प्रवेश कर जाय. फिर दोनों पहाड़ियों पर छिपे हमारे सैनिक घात लगाकर पत्थरों और तीरों की वर्षा करके, महमूद की सेना को छिन्न भिन्न कर देंगे. इसी भगदड़ का लाभ लेते हुए महमूद की पालकी को पत्थरों से निशाना बना दिया जायेगा.”

[घोघाबापा का प्रेत – 4]

“आत्मघाती और मूर्खतापूर्ण योजना है यह.“ पीछे से एक गंभीर और तेजस्वी स्वर उभरा, “हममें से कोई भी जीवित नहीं बचेगा, और यवन सेना सुरक्षित निकल जायेगी.“

वहां उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति की दृष्टि उसी आवाज की दिशा में, नंदीदत्त के साथ बैठे व्यक्ति पर केन्द्रित हो गई.

[घोघाबापा का प्रेत – 5]

सामन्त ने देखा, वो एक जीवन के पांचवे दशक में पहुंचा, लम्बा और बलिष्ठ मनुष्य था. वह गौर वर्ण का था, तथा उसके श्वेत श्याम सिर और लम्बी दाढ़ी-मूंछ के केश उसकी उम्र को दर्शाते हुए, उसके आभामंडल को और भी उभार रहे थे. उसकी बाहें सुदृढ़ थीं, और मांसपेशियां उभरी हुई थी. मशालों की रोशनी में उसके मुखमंडल को देखकर यह समझ आ रहा था कि यह योद्धा एक तेजस्वी व्यक्तित्व का धनी है, तथा परिधान ब्राह्मणों जैसा है.

[घोघाबापा का प्रेत – 6]

इस तरह से अपनी योजना के बारे में ‘मूर्खतापूर्ण’ सुन कर पहले से ही आवेशित सामन्त और आवेश में आकर चिल्ला उठा, “तुम हो कौन? और मेरी योजना को ‘मूर्खतापूर्ण’ कहने का साहस कैसे किया तुमने?”

किसी और के कुछ बोलने से पहले नंदीदत्त ने क्रोधित होकर तीव्र स्वर में कहा, “सामन्त!! अविलम्ब अपनी धृष्टता के लिए इनसे क्षमा मांगों और सम्मानसहित वार्ता करो. इस महासंकट की घड़ी में इतना आवेश अच्छा नहीं है पुत्र, तथा अपनी राय रखने का अधिकार तुमने ही यहाँ सबको प्रदान किया है.“

[घोघाबापा का प्रेत – 7]

झटका सा लगा सामन्त को, फिर उसने अपने आचरण पर ध्यान देते हुए लज्जित होकर उस व्यक्ति से हाथ जोड़कर बोला, “मुझे क्षमा करें श्रीमान. महमूद के पुनः बच निकलने से मैं अपना नियंत्रण खो बैठा हूँ.“ फिर उसने नंदीदत्त की ओर देखकर कहा, “बाबा, कौन हैं ये तेजस्वी मनुष्य? कृपया परिचय देने की कृपा करें, क्योंकि ये जितने साधारण दिख रहे हैं, उससे कहीं अधिक उच्च प्रतीत होते हैं.“

नंदीदत्त ने हाथ जोड़ कर उस मनुष्य को प्रणाम किया, प्रत्युत्तर में उसने भी हाथ जोड़ा. फिर नंदीदत्त ने परिचय देना शुरू किया, “ये सोमनाथ मंदिर के आचार्य विष्णुदत्त हैं. वहां ये सन्यासियों को शास्त्र के स्थान पर शस्त्रज्ञान देते थे. सर्वप्रथम मुख्य पुजारी सर्वज्ञ जी ने अपने पश्चात् मुख्य पुजारी का पद इन्हीं को देने का प्रस्ताव रखा था क्योंकि ये नीति, निष्ठा और चरित्र में मंदिर के अन्य आचार्यों से उत्तम और योग्य थे. परन्तु वाममार्गी धूर्त कापालिकों को ये तनिक भी नहीं सुहाते थे, क्योंकि ये उनके इष्ट पूजा के नाम पर सारे अमर्यादित क्रियाकलापों के मुखर विरोधी थे. इसलिए वहां उपस्थित समिति के अधिकांश सदस्यों ने इनके नाम का विरोध किया और अपने बीच में से एक वामपंथी आचार्य शिवराशि का नाम मनोनीत कर दिया.“

[घोघाबापा का प्रेत – 8]

सभी लोग स्तब्ध होकर सुन रहे थे, नंदीदत्त ने आगे कहना जारी रखा, “चूंकि अब अधिकतर लोग कापालिकों के साथ ही भोग-विलास में लिप्त रहते थे, अतः इनके पास शस्त्र विद्या लेने कोई नहीं आता था. इसलिए विष्णुदत्त जी बिना किसी को सूचना दिए, एक रात्रि सोमनाथ मंदिर से सदा के लिए प्रस्थान कर गए. वे यहीं पीछे की पहाड़ियों पर स्थित एक वन्य ग्राम में अज्ञातवास करते हुए, यहाँ के ग्रामीण युवकों को शस्त्र शिक्षा देते थे. परन्तु अब जब सोमनाथ पर संकट आया है, तो इन्होने मुझसे संपर्क किया और अपने 30 धनुर्धर शिष्यों के साथ, मलेच्छों के विरुद्ध युद्ध करने की इच्छा प्रकट की. तुम सब अग्निकांड में व्यस्त थे, इसलिए मैंने उस समय कोई व्यवधान नहीं पहुँचाया तुम्हें. वैसे दूर के रिश्ते में मैं इनका अग्रज हूँ. मैंने घोघाराणा की सहायता के लिए युद्ध में अपने इकलौते पुत्र को भेजकर उसको मातृभूमि पर न्योछावर किया, आज मैं अपने सगे अनुज समान भाई को तुम्हें सौंप रहा हूँ. इस वृद्ध नंदीदत्त की यह सहायता स्वीकार करो पुत्र सामन्त.“

[घोघाबापा का प्रेत – 9]

वहां उपस्थित सारा समुदाय हाथ जोड़ कर “साधु साधु” कर उठा. लेकिन सामन्त ने कसमसाते हुए कहा, “मेरे घोघा बापा ने गौ, ब्राह्मण और धर्म की रक्षा हेतु ही मेरा निर्माण किया है. पुरोहित जी, आपने हमारी 4 पीढियां देखी हैं. मैं आपके चरणों की सौगंध खाकर कहता हूँ कि, जहां कोई भी ब्राह्मण होगा, वहां तक मेरे जीवित रहते एक भी म्लेच्छ न पहुंच सकेगा. क्षत्रियों का धर्म ही गौ, ब्राह्मण और धर्म की रक्षा है, घोघा बापा ने यही सिखाया है. अतः एक ब्राहमण को, आचार्य, ऋषि मुनि को मैं अपने साथ युद्ध में नहीं ले जा सकता. यह उनका कार्य नहीं, हमारा कार्य है. क्षत्रियों के रहते यदि ब्राह्मण को शस्त्र उठाने पड़ें तो धिक्कार है उस क्षत्रियत्व पर.“

[घोघाबापा का प्रेत – 10]

आचार्य विष्णुदत्त ने पुनः रौद्र रोष में कहा, “सामन्त, तुम्हारे इसी अहंकार को देखकर मैंने तुम्हें मूर्ख कहा था. सत्य यह है कि पवित्र कर्मों तथा समाज के उत्थान में रत ब्राह्मण को किसी के आदेश या साथ की आवश्यकता नहीं होती. धर्म रक्षा हेतु किसी निमंत्रण पत्र की प्रतीक्षा नहीं करता ब्राह्मण. विश्वामित्र किसी के निमंत्रण पर अयोध्या नहीं गए थे. यह अधर्म का विनाश अवश्य ही ब्राह्मणों का ही कार्य है. निमित्त किसी को भी बनाये, पर उत्तरदायित्व उन्हीं का है. पूर्वजों ने हजारों वर्ष तपस्याएं की हैं, वह इसलिए नहीं की थीं कि आज मैं उनकी तपस्या की गरिमा और मान का अपमान करूँ. मुझे उनकी तपस्या का मान बढ़ाना है, उनको कलंकित नहीं करना है.”

[घोघाबापा का प्रेत – 11]

जयघोष की तरह प्रचंड आवाज में आचार्य ने पुनः कहा, “जब तक कल्कि नही आते, तब तक हम ही कल्कि हैं.” यह ओजपूर्ण हुँकार सुनकर समस्त जन मानस की शिराओं का सारा रक्त उबल पड़ा, “कल्कि किसके हेतु आएंगे यदि हम भरतवंशी ही जीवित न रहेंगे तो… ? हम जीवित रहेंगे, हम सबको सुरक्षित करेंगे, भरतवंशियों की सुरक्षा हेतु आज हम साक्षात कल्कि बनकर ही लड़ेंगे और उनकी भांति ही प्रलय मचा देंगे युद्ध में. हमारे अंश जीवित रहें उनके हेतु एक स्वस्थ समाज का निर्माण हमें ही करना होगा.“

“मैं ब्राह्मण हूँ, शास्त्र और शस्त्र मेरे रक्त में बहते हैं. धर्म प्रदत्त मर्यादाओं का अनुसरण और रक्षण मेरे रक्त की अंतिम बूंद द्वारा किया जाएगा.“ आचार्य ने बाएं हाथ से अपना धनुष और दायें से तलवार लहरा कर कहा,
“अग्रतः चतुरो वेदाः, पृष्ठतः सशरं धनु: .
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ..“
(अर्थात् “चतुर्वेद हमारे अग्र भाग में रहते हैं (मौखिक याद हैं), पीठ पर धनुष-वाण सुशोभित है, हमारे अन्दर ब्राह्मतेज और क्षात्रतेज दोनों हैं. कोई भी धर्म की हानि करेगा, उसे श्राप देकर अथवा बाण से दण्डित किया जायेगा.)

[घोघाबापा का प्रेत – 12]

आचार्य का गर्वीला दमकता तेज देखकर प्रत्येक प्रेतसैनिक को यही भान हुआ जैसे साक्षात् भगवान परशुराम ही उनके बीच सम्मुख हैं. सामन्त तो एकदम भौंचक्का सा खड़ा था.

उसने विनीत भाव से पूछा कि, “हे विप्रश्रेष्ठ, आपके आने से हम धन्य हुए. आपको समझने में भूल हुई, इसके लिए पुनः दंडवत क्षमाप्रार्थी हूँ. परन्तु मेरे दो प्रश्न हैं कृपया उनका समाधान करें. पहला यह कि मैंने आचार्यों से सुना हुआ है कि महर्षि विश्वामित्र क्षत्रिय थे परन्तु आपने अभी उनको ब्राह्मण बोला है. यह कैसे? तथा राम-रावण युद्ध में तो वह वहां उपस्थित ही नहीं थे, तो उनकी सहभागिता क्या और कितनी हुई? मानता हूँ कि यह समसामयिक प्रश्न नहीं है, केवल जिज्ञासा वश यह प्रश्न पूछा है मैंने. अगर कुछ त्रुटि हो तो उसे भी क्षमा करें.“

सामन्त के अति विनीत वचन सुनकर आचार्य की मुद्रा धीरे-धीरे शांत और सौम्य हुई. वे आगे बढ़े और सामन्त के पास जाकर वात्सल्य भाव से उसको ह्रदय से लगा लिया. सामन्त को बहुत दिनों बाद प्रेम की अनुभूति हुई, और आचार्य की नागपाश जैसी जकड़ से उसको अपने स्वर्गीय पिता ‘सज्जन चौहान’ याद आ गए. अपने पिता का स्नेहालिंगन याद आते ही उसकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे.

आचार्य का सीना जब उसके आंसुओं से गीला हुआ तो आचार्य ने उसको अपने से अलग करते हुए वात्सल्य की प्रेमपूर्ण झिड़की देते हुए कहा, “छिः, यह पाषाण जैसा कठोर प्रेत रोता हुआ अच्छा लगता है क्या?” यह कहने के पश्चात् उसके कन्धों पर एक घूंसा जमाया, और उसके आँसू पोंछने लग गए.

सामन्त ने नन्हें अबोध बालक की भांति, हिचिकयों के साथ रोते हुए कहा, “आचार्य, मैंने दृढ़ निश्चय किया था कि अब मैं आजीवन कभी किसी के समक्ष, किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं पडूंगा. मुझे अब लगने लगा था कि अपने मनोभावों को मैंने जीत लिया है. परन्तु पिताश्री की याद आते ही मेरे मन की प्रतिज्ञा एक तुच्छ तिनके की भांति टूट गई. मैं क्या करूँ आचार्य, मैं क्या करूँ?” कहकर सामन्त और बुरी तरह रोने लग गया.

“सामन्त, ऐसी प्रतिज्ञाओं का पालन तो श्रेष्ठ योगीजन भी नहीं कर पाते. हम सब तो साधारण मनुष्य हैं. संसार में बहुत कम लोग अपने मन पर ऐसा विजय प्राप्त कर पाते हैं. भगवान कृष्ण जो सोलह कलाओं के अवतार थे, वो भी मन का ही एक भाव “क्रोध”, को विजित नहीं कर पाए थे. अभी मैं भी रोष में आ ही गया था. सत्य यही है कि मनोभावों से भरे रहने को ही मनुष्य जन्म मिलता है. यह कोई दोष नहीं है, यह तो नैसर्गिक गुण है मानव का. और फिर जिसका समस्त कुल ही अचानक काल के गाल में समा गया हो, उसके विछोह की कोई सीमा ही नहीं है. इसलिए प्रतिज्ञा टूटने का पश्चाताप न करो पुत्र.“

पर सामन्त रोता ही रहा, चुप ही न हुआ. सब लोग असहाय हो गए उसका रुदन सुन कर, सबकी ही आँखों की कोर गीली हो गई. उसके इस प्रकार रुदन और चीत्कार से वातावरण अत्यधिक बोझिल हो गया
.
अचानक सामन्त की टुकड़ी का प्रेतसैनिक और मित्र ‘महा’ खड़ा हुआ और बोला, “मुझे पता है इसके हृदय का विछोह कैसे कम होगा.“ यह कहकर वो विनोद भरी कुटिलता से मुस्कुराने लगा.

ऐसी भावभीनी घड़ी में उसको मुस्कुराते देखकर आचार्य ने समझ लिया कि यह सैनिक होते हुए भी सामन्त का मित्र है. उसके दुःख को कम करने के लिए, इस दुःख, बोझिलता और तनाव भरे वातावरण को दूर करने के लिए अवश्य ही कोई विनोदी बात कहना चाहता है.

उन्होंने महा को प्रोत्साहित करते हुए बोले, “हाँ-हाँ महा, तुम बोलो. कैसे इसका विछोह दूर किया जा सकता है?”

“इसका विवाह करा दिया जाय.“

“क्या?” सबके ही मुंह ऐसी परिस्थिति में ऐसा सुनकर आश्चर्य में भाड़ सा खुल गया.

“हाँ, इसका विवाह करा दिया जाय, किसी अत्यंत रूपवती कन्या से.“ महा के मुंह से यह शब्द निकलते ही सब लोग उसके ऐसा कहने का आशय समझ कर, दुःख भूलकर मुस्कुराने लगे. कुछ लोग तो खिलखिला भी उठे. सामन्त भी इस अगंभीर वातावरण से अछूता न रह सका. उसकी हिचकियाँ बंद होने लगीं.

आचार्य ने मुस्कुरा कर आगे बात बढ़ाई, “ये तो अच्छा है पुत्र. महमूद पर विजय पाते ही इस शुभकार्य को सम्पूर्ण किया जाएगा. परन्तु तुम ये तो बताओ महा, कि ऐसी परम सुंदरी कन्या कहाँ मिलेगी, जो सामन्त जैसे पाषाण हो चले मनुष्य को भी पिघला दे?“

महा उसी कुटिल मुस्कराहट से बोला, “यवनों की सेना में नृत्य-संगीत, कविता-शायरी इत्यादि करने वाले लोग भी हैं. यहाँ तक कि बहुत सारी यवन कन्यायें भी हैं, जिनके बाल सुनहले हैं और नैन नीले हैं. वो अतिशय गोरी हैं. हुआ ये कि कल जब हम लोग अग्निकांड कर रहे थे, तो मैं और सामन्त बहुत ढूंढ कर महमूद के खजाने को भी चिह्नित किया था. ख़जाना बचाने के चक्कर में ही पश्चिम दिशा की तरफ आग की मात्रा न्यूनतम रखी थी हमने. उसी समय मुझे सेना का सर्वाधिक सुरक्षित और सुरुचिपूर्ण हिस्सा दिखा. ध्यान देने पर मुझे ये उपरोक्त जानकारी मिली.”

“फिर एक यवन को दबोच कर मैंने तलवार की नोक पर पूछा, तो उसने बताया कि वो हिस्सा सुलतान का ‘वक्ती हरम” कहलाता है. जहाँ नृत्य-संगीत इत्यादि होते हैं. और उसी हिस्से में कुछ इतिहासकार भी रहते हैं, जो महमूद की वीरता, महानता इत्यादि को बढ़ा चढ़ा कर लिखते चलते हैं. जिनमें से एक इतिहासकार का नाम ‘अल बरुनी’ है. तो, महमूद को मारने के बाद उन युवतियों में से जो सबसे ज्यादा सुन्दर कन्या होगी, उसी से सामन्त का विवाह करा देंगे. वैसे कन्यायें सारी एक से बढ़कर हैं.“ कहकर उसने फिर से सामन्त की ओर देखकर मुस्कुरा दिया.

महा सफल रहा, अब तक दुःख का वातावरण हास्य में बदल चुका था. सामन्त ने सप्रयास मुस्कुरा कर महा से कहा, “बंधु, यह अच्छी कही तुमने. अब क्या घोघागढ़ के सामन्त की यह दशा हो गई है कि महमूद की भोगी हुई स्त्री से विवाह करूँ? उसके पतित हरम की युवती घोघागढ़ की महारानी कहलाये?”

महा ने अपनी बत्तीसी चमकाते हुए कहा, “हाँ, तो न करना विवाह. केवल प्रेम कर लेना. अब घोघागढ़ के तुम्हीं महाराज हो. और राजे-महराजे तो ऐसे अनगिनत प्रेम करते ही हैं जीवन में.“

महा ने तो यह कहकर जैसे ठहाकों का मटका फोड़ दिया इस सभा में. सारे लोग दुःख भूलकर अपना पेट पकड़-पकड़ कर हँसने लगे. सामन्त ने झूठा क्रोध दिखाते हुए अपनी म्यान सहित तलवार, महा की ओर फेंक मारी. महा ने तलवार को दक्षता से लपक लिया और सामन्त की ओर ‘खी खी खी’ कर के अपना अंगूठा दिखा दिया. इस पर सामन्त ने अपने पैरों में से अपना जूता निकाला और चिल्लाते हुए महा को मारने को दौड़ा.

अच्छे-खासे कौतुहल का दृश्य उत्पन्न हो गया अब तो, महा आगे-आगे और सामन्त पीछे-पीछे, दोनों उस सभा का गोल गोल चक्कर काटते हुए दौड़ने लगे. सामन्त चिल्लाता जा रहा था, “ठहर जा नीच, दुष्ट, पापी, नराधम. आज तुझे जीवित न छोडूंगा. मुझे अनीति सिखाता है,.. मैं ऐसा नीच कार्य करूँगा?,…..”

दोनों गोल गोल दौड़ते जा रहे थे, और सारी सभा के लोग जमीन पर गिर कर पेट पकड़-पकड़ कर हँसते जा रहे थे. पुरोहित नंदीदत्त और आचार्य विष्णुदत्त भी ठहाका लगाने से स्वयं को रोक नहीं पाए.

कुछ समय पश्चात् जब सब लोग भरपूर हँस लिए, सामन्त भी महा को पकड़ कर भातृभाव से उसको दो-चार जूते मारने के बाद उसको पकड़ कर हँस चुका, तो नंदीदत्त ने कहा,

“आज महा ने बहुत महान कार्य किया है. देखो तो कैसे क्षण भर में ही सम्पूर्ण वातावरण परिवर्तित कर दिया! अच्छा, एक बात बताता हूँ जो बहुत कम लोगों को ही पता होगी, कि हमारे चेहरे में ऐसी अनगिनत मांसपेशियां और तंतु होते हैं, कि ठठा कर हँसने से उनके द्वारा शरीर के प्रत्येक अंग-प्रत्यंग में रक्त का प्रवाह तेज हो जाता है. इससे हमारे शरीर को नई उर्जा प्राप्त होती है. इसलिए समय निकाल कर हँसते रहना चाहिए.“

वहां उपस्थित सभी सैनिक युवक ही थे, इस नई जानकारी से उनका ज्ञानवर्धन हो जाने के बाद आचार्य विष्णुदत्त ने वार्ता का सिरा अपने हाथ में लेते हुआ कहा,

“हाँ तो, चूँकि हमारे पास समय का अभाव है इसलिए वार्ता को अब आगे बढ़ाते हैं. हाँ तो सामन्त, पुत्र तुम ऐसा कार्य कर रहे हो जिस पर भारत को युगों-युगों तक गर्व होता रहेगा. तुम्हारे पासंग बराबर भी क्षत्रियता अगर हर क्षत्रिय दिखाता तो इसके पहले सोलह बार वो मलेच्छ महमूद गजनवी भारत भूमि को कलंकित करके जीवित वापस नहीं जा पाता. तुम अतुलनीय कार्य कर रहे हो, परन्तु मैं चाहता हूँ कि खुद को ही धरती का परम शक्तिशाली योद्धा समझ कर अभिमान में आकर कोई ऐसी भूल न कर बैठो, जिससे तुम्हारा यश कलंकित हो. अब पुनः बताओ कि तुम्हारा प्रश्न क्या था?”

सामन्त ने अपना प्रश्न दुहराया, “मैंने आचार्यों से सुना हुआ है कि महर्षि विश्वामित्र क्षत्रिय थे. और आपने अभी उनको ब्राह्मण बोला है. यह कैसे? तथा राम-रावण युद्ध में तो वह वहां उपस्थित ही नहीं थे, तो उनकी सहभागिता क्या और कितनी हुई?”

“सही प्रश्न” आचार्य ने सहज होकर बोला, “विश्वामित्र धर्म की रक्षा के प्रति अपना राजपाट छोड़कर तपस्या में रत रहे. अपने सद्कर्मों से महर्षि का पद प्राप्त किया. वो उसी प्रकार ब्राह्मण कहे जा सकते हैं, जैसे कोई जन्मना ब्राह्मण भी यदि नीच कार्य करे तो ब्राह्मण नहीं मलेच्छ कहलायेगा. सब कर्मों पर है पुत्र. यद्यपि यहाँ बैठे जितने भी सैनिक हैं, सब अलग-अलग ग्राम से हैं और निम्न मानी जाने वाली जातियों से भी हैं. परन्तु ये धर्मरक्षा हेतु अपने प्राण निछावर करने को तैयार हैं, तो अब यह सब क्षत्रिय हैं. मैं अभी तुम्हें उपदेश दे रहा हूँ तो मैं ब्राह्मण हूँ, ज्यों ही हथियार उठा कर तुम्हारे साथ चल पडूंगा, क्षत्रिय हो जाऊंगा.“

आचार्य ने ठहर कर सबके चेहरों पर दृष्टि डाली, सभी के सिर सहमति की मुद्रा में हिल रहे थे, तो आचार्य आगे बढ़े,

“रही बात कि राम-रावण युद्ध में विश्वामित्र के योगदान की, तो एक बात ध्यान दो पुत्र कि सत्यता में, युद्ध तो विश्वामित्र और रावण का ही था. भगवान् राम निमित्त भर थे. भगवान् को राम के भेष में आना पड़ा, क्योंकि वे यदि राम के भेष में न आते तो किसी और भेष में आते. रावण धर्म का विनाश कर रहा था, और विश्वामित्र धर्म के सजग प्रहरी थे. तो युद्ध तो इन्हीं दोनों का था. और महर्षि इस युद्ध को इतनी चतुराई से लड़े कि हजारों वर्ष बाद आज भी यह राम कथा सुनते समय किसी को नहीं ध्यान रहता है कि ये युद्ध राम-रावण का नहीं वरन विश्वामित्र और रावण का था. महाराज रघुवीर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम युद्ध के लिए तैयारियां करते रहे और सुदूर कहीं महर्षि विश्वामित्र यज्ञ कर-कर के श्रीराम की शक्तियां बढ़ाते रहे. विश्वामित्र का राम-रावण युद्ध में न यश हुआ न ही श्रेय… परन्तु मछली की आँख पर निशाना तो विश्वामित्र का ही था.“

“हम सबको भी अपना यश और श्रेय, ‘शून्य’ समझ करके ही कार्य करना है… ताकि हम जब पुन: जन्म लें तो अपने द्वारा दी गई आहुतियों से निर्मित एक धर्म आधारित समाज की अच्छाइयों का आनन्द ले सकें.”

“दशरथ के राम बनो..
कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा के राम बनो..
सिया के राम बनो..
वसिष्ठ और विश्वामित्र का राम बनो…
केवट और गुह का भी बनो..
शबरी का राम भी बनो..
जटायु का राम भी बनो..
हनुमान का राम भी बनो..
विभीषण, सुग्रीव का भी राम बनो..
बाली के भी राम बनो..
और… जब समय आये तो रावण का राम भी बनने हेतु …समर्थ बनो, सक्षम बनो… प्रवीण बनो, दक्ष बनो.“

वहां उपस्थित हर सैनिक सहित सामन्त भी आचार्य को दंडवत कर बैठा. सामन्त उठ कर गया और अपने पुरोहित नंदीदत्त के भी पैर छूकर कहने लगा, “बाबा, आज आपने दूसरी बार मुझे नया जीवनदान दिया है. पहली बार तब, जब मैं अपने कुल के शोक में प्राण त्यागने वाला था, और दूसरी बार आज इन आचार्यश्रेष्ठ विष्णुदत्त जी का मुझे कृपापात्र बनाकर. अब आप हम सबको आशीर्वाद दें कि हम अपने लक्ष्य वेधन में सफल हों.“

नंदीदत्त ने अपनी शक्ति भर कस कर उसे गले लगाया और उसके मस्तक पर तिलक लगा कर आशीर्वाद देते हुए कहा… “जाओ सामन्त… मृत्यु का ऐसा सामना करो कि यमराज भी कहने को विवश हो जाए कि वाह… किस शूरवीर से पाला पड़ा है.”

सामन्त ने विष्णुदत्त से कहा, “अब मेरा दूसरा प्रश्न यह था आचार्य कि मेरी योजना में क्या कमी है? कृपया मार्गदर्शन करें.“

“हाँ, यह प्रश्न अत्यधिक महत्वपूर्ण है.“ विष्णुदत्त ने कहा, “क्योंकि तुम्हारा शत्रु कोई ऐसा-वैसा कमजोर और स्वभाव से कायर शत्रु नहीं है सामन्त, कि हर बार तुम्हारी ही विजय हो. वो सोलह बार भारत को लूट कर जा चुका है. दुनिया के अनगिनत देशों में उसने अपनी विजय पताका फहरा कर अपने शत्रुओं को निर्दयता से मारा है. तुम्हारी योजना में छोटी छोटी लेकिन गंभीर गलतियाँ हैं, जो तुम अपनी अग्निकांड की जीत के पश्चात् उत्साहित होकर करने जा रहे थे. तुम ज्यों ही अपने सैनिकों की तीसरी टुकड़ी लेकर ‘सम्मुख’ युद्ध करने जाओगे तो वे तुरंत समझ जायेंगे कि ‘प्रेतसेना’ एक छलावा थी, एक रचा प्रपंच मात्र था और ये तो मुट्ठी भर युवकों की टुकड़ी है. क्या तुम घोघागढ़ के 800 सैनिकों सहित सबकी पराजय भूल गए? एक बार ‘मायावी प्रेत’ का भ्रम टूटा तो यवन सेना की समुद्र जैसी विशालता तुम्हें भी लील जाएगी.”

विष्णुदत्त गंभीरता से कहते चले गए, “और तुम रात में वार करना चाहते हो तो भी अब वे भयभीत होने की वजह से मशालों की रोशनी करके, बुरी तरह सतर्क तथा चौकन्ने होंगे. इसलिए भी तुम और तुम्हारे सैनिक छिप नहीं पाएंगे. पहाड़ियों पर हमारी दो टुकड़ी, पत्थर और तीरों को लेकर बैठे, इससे मैं सहमत हूँ. छोटा सा बदलाव मैं यह चाहता हूँ कि तीसरी टुकड़ी भी स्वयं सामने जाकर वार न करे, बल्कि वन में ही अदृश्य रहे. बस छिप कर महमूद के पथप्रदर्शकों और गुप्तचरों को समाप्त करती रहे. महमूद को स्वयं निर्णय लेने दिया जाय कि उस घाटी से ज्यादा सुरक्षित और कोई राह नहीं है. यह तो तय है कि वो इतनी बड़ी सेना के साथ, अनजान घाटी में दिन के प्रकाश में ही आगे बढ़ना चाहेगा, इससे तुम्हारे सैनिकों को भी उसके हाथी और पालकी को निशाना बनाना रात की अपेक्षा अधिक आसान रहेगा.“

“तो तीसरी टुकड़ी का कार्य केवल गुप्तचरों को मारना ही रहेगा?” सामन्त ने सोचपूर्ण प्रश्न किया.

“नहीं, तीसरी टुकड़ी का कार्य यह रहेगा कि जब महमूद की सारी सेना घाटी में उतर जाए, तो पीछे से आक्रमण करके उसके खजाने को हथिया लेना है. महमूद या तो आगे रहेगा, या बीच में. अधिक सम्भावना उसके आगे ही रहने की होगी. परन्तु खजाना, घायल, स्त्रियाँ और कवि-इतिहासकार जैसे लोग कड़ी सुरक्षा में पीछे ही रहते हैं. उनकी सेना के चलने के समय हमें किसी पहाड़ी से महमूद और खजाना दोनों की स्थिति पर पल-पल ध्यान रखना अति आवश्यक रहेगा. मेरे विचार से इस कार्य के लिए महा और उसका दल सुयोग्य रहेगा. यह भी महत्वपूर्ण और वीरतापूर्ण कार्य होगा, क्योंकि यदि महमूद किसी भी प्रकार सुरक्षित निकल जाता है, तो उसका ख़जाना लूट लेने से उसकी बहुत सी शक्तियां कम हो जाएँगी. इसी खजाने से ही तो वो सैनिक और विश्वासघातियों को क्रय करता (खरीदता) है. उस खजाने से हम भी तो उसकी तरह सैनिक और हथियार खरीद सकते हैं.“

सभी लोग योजना सुनकर हर्षातिरेक में चीख उठे. सामन्त ने दोनों हाथ जोड़, सिर नवाते हुए मुस्कुरा कर विनोदी भाव से कहा, “आचार्य, आपका नाम तो ‘विष्णुदत्त’ नहीं ‘विष्णुगुप्त’ होना चाहिए था. एक परिपूर्ण और सुव्यवस्थित योजना बनाने में तो आप ही ‘चाणक्य’ के सच्चे उत्तराधिकारी हैं.“

उपस्थित सभी जन पुनः एक बार ठहाका लगाने लगे.

क्रमशः…

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