वहां जन्नत उल बाक़ी ध्वस्त, यहां रास्ते के बीचोबीच गड़े किसी अनजान मुर्दे के लिए धार्मिक उन्माद

मक्का और मदीना इस्लाम के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल रहे हैं. इस्लाम के इतिहास के सारे महत्वपूर्ण पात्र इन्हीं दो शहरों में जन्में, बसे, और चल बसे! उन की अंत्येष्टि भी इन्हीं शहरों के कब्रिस्तानों में की गई.

इतिहास के शासकों ने और धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों ने उन पात्रों के कब्र पर विशाल मजारें बना दी. जन्नत उल बाक़ी नाम से एक प्रमुख कब्रिस्तान में बहुत सी ऐतिहासिक हस्तियों की कब्रें है.

1806 में नज्द के वहाबियों द्वारा मक्का और मदीना पर विजय पाने की बाद उन्होंने इन दो शहरों के बड़े सारे धार्मिक इमारतों को नष्ट किया, जिन में मजारें और मस्जिदें भी शामिल है. जन्नतुल बाक़ी और अन्य सारे कब्रिस्तानों का यही हाल हुआ. बड़ी बड़ी इमारतें नष्ट की गई और उस में से मूल्यवान चीजें लूट ली गई.

अल-सउद कबीले ने 1924-25 में हिजाज़ प्रान्त (जिस में मक्का-मदीना शामिल है) पर पुनः नियंत्रण स्थापित किया. उस के अगले वर्ष ही कादीअब्द अल्लाह इब्न बुलेहिद के धार्मिक सहमति से सुल्तान इब्न सउद ने इस विध्वंस को आगे चलाने की अनुमति दी.

21 एप्रिल 1926 को इख्वान नामक एक वहाबी धार्मिक संगठन द्वारा इस विध्वंस की शुरुआत हुई. इस में साधारण से साधारण कब्र के सिरहाने के पत्थर को भी छोड़ा नहीं गया.

एल्डन रटर नामक एक ब्रिटिश मुस्लिम के कथनानुसार “सारे कब्रगाह में जहां तक नजर दौड़ाओ, मिटटी-पत्थर, लकड़ी, सरिया, फर्श, ईंटों के ढेर फैले हुए थे.”

इस दूसरे विध्वंस की ईरान के संसद मजलिस-ए-शूरा-ए-मिल्ली में चर्चा हुई और एक प्रतिनिधि मण्डल इस बारे में खोज-खबर के लिए हिजाज़ भेजा गया. ईरानी धार्मिक विद्वानों और राजनयिकों ने हाल में इन कब्रिस्तानों के और कब्रगाहों के पुनरुद्धार के लिए प्रयास किया है.

सुन्नी और शिया दोनों ने ही इस विध्वंस का विरोध किया और इस दिन को ‘यौमे-गम’ (ग़म की रात) के रूप में मनाया जाता है. सुन्नी और शिया विचारकों ने कब्रिस्तानों की इस दयनीय अवस्था की कड़ी निंदा की है, लेकिन सऊदी सरकार ने इन इमारतों के पुनरुद्धार की गुजारिशों को अब तक कोई तवज्जो नहीं दी है, बल्कि उन्हें कड़ाई से ख़ारिज किया है.

इन दिनों शायद जन्नतुल बाक़ी की हालत उन दिनों से कुछ बेहतर है, लेकिन उन पुराने दिनों के मुकाबले वह कुछ भी नहीं है!

जन्नत अल-मुअल्ला नाम से एक अलग कब्रिस्तान में मुहम्मद की पत्नी, दादा और अन्य रिश्तेदारों को दफनाया गया है. इस कब्रिस्तान की मजारें भी 1925 में सुल्तान इब्न सऊद के आज्ञा से नष्ट की गई.

इस्लाम का जहां जन्म हुआ, जो जहां पला-बढ़ा, शतकों तक खलीफाओं ने विस्तार किया और सारे इस्लामी धर्म और संस्कृति की उपज हुई, वहां क्या मस्जिदे, क्या मजारें, क्या कब्रगाहें… सारे बेदर्दी से नष्ट किए गए.

इस के मद्देनजर यहाँ भारत में रास्ते के बीचोबीच गड़े किसी अनजान मुर्दे को वहीं दबा रखने के लिए धार्मिक उन्माद फैलाना कहाँ तक जायज है? एक अति पवित्र मंदिर को ढहाकर बनाए गए एक अपमान प्रतीक मस्जिद को ढहाने के बाद वहां एक मस्जिद ही बनाने का हठ कहाँ तक जायज है?

भारत के मलेच्छ तो धार्मिक कट्टरता में अपने बाप का बाप बनने की कोशिश कर रहे है. लेकिन बाप बाप होता है, और बेटा बेटा. इस वाले बेटे को तो बाप अपनी औलाद मानने से तैयार नहीं है, और ये जिस की गोदी में बैठे और पले बढ़े हैं, उसे बाप मानने के लिए तैयार नहीं है!

इस विचित्र मनःस्थिति से भारतीय इस्लाम जितने जल्द उबरेगा, अपने उन्माद को छोड़ राष्ट्रीय मुख्य धारा में शामिल हो कर भारतीय संस्कृति से जुड़ेगा, उतनी ही जल्द वह समाज खुशहाल और संपन्न जीवन से लाभान्वित होगा.

सन्दर्भ : https://khwajagharibnawaz.org/2017/05/10/janna-ul-baqi-before-19251926-and-after/

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