आखिर कौन और क्यों अब भी कतरा रहा है कैशलेस व्यवस्था से

नोटबंदी के बाद कैशलेस पेमेंट की वकालत शुरू हुई. वैसे तो भुगतान का यह तरीका नोटबंदी से पहले भी प्रचलन में था. लेकिन उसके बाद इसका प्रचलन बढ़ा और उत्तरोत्तर इसमें बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही है.

अर्थशास्त्री तो इस बात का भी अंदाजा लगा रहे हैं कि इस बार के बजट में कैशलेस पेमेंट से संबंधित कुछ और विशेष घोषणाएं भी हो सकती हैं. माने कुल मिलाजुला कर कहा जा सकता है कि सरकार ने नोटबंदी के बाद कैशलेस पेमेंट कराने का भी पूरा मन बना लिया था लिहाजा वह उसे विभिन्न तरीकों से प्रोत्साहित कर रही है.

ऐसे में संभव है कि जैसे रातोंरात पांच सौ और हजार के नोट बंद हुये वैसे ही आगामी दिनों में कुछ सेवाओं को भी पूरी तरह से कैशलेस मोड में बदल दिया जाय.

बहरहाल जब कैशलेस की चर्चा शुरू हुई तो गली मुहल्लों से लेकर सोशल मंच भी इसके गवाह बनने लगे. कुछ लोग इसे बेहतर भविष्य की तैयारी बता रहे थे तो कुछ परेशानी का सबब.

कुछ लोगों के लिये यह पेमेंट का आसान तरीका नजर आता था तो कुछ इसके सुरक्षा संबंधित खामियों को सुनकर ही डरे हुये थे. कुछ को लगता था कि भ्रष्टाचार में इससे कमी आयेगी तो कुछ लोग देश में किसी साइबर नीति की कमी को गिनाने में लगे हुये थे.

वैसे यह अभी भी समाप्त नहीं हुई है और गाहे-बगाहे इस संबंध में कुछ न कुछ दिखता ही रहता है.

वैसे पक्ष वाले इसके समर्थन में हैं, इसे ठीक मानते हुये, तो मैं उन लोगों को भी सही मानता हूँ जो इसके विरोध में बात करते हुये इसकी कमियां बताते हैं. चूंकि समाज के लिये यह एक नयी चीज है.

अब तक समाज के एक बड़े वर्ग ने इसका नाम तक नहीं सुना था. ऐसे में संभव है कि जानकारी में कमी के कारण वह कभी ठगा भी जा सकता है. फिर जो इसकी कमियां बताते हैं उससे लोगों को सुरक्षा संबंधित सीख भी मिलती है.

इन सबके बावजूद समाज का एक बड़ा वर्ग अभी भी इसके खिलाफ आवाज तेज कर रहा है. वह लोग बता रहे हैं कि इस तरीके से कुछ लोगों को परेशानी हो रही है.

भाई परेशानी तो होगी, लेकिन किसे और कैसी परेशानी होगी? इस बात की पड़ताल के लिये जब ध्यान दिया जाय तो पता चलता है कि उस बड़े वर्ग में असाक्षर, मजदूर, किसान, छोटे दुकानदार, रेहड़ी-खोमचे वाले तथा इस तरह के अनेकों असंगठित समूहों के लोग नहीं हैं.

मतलब ये ऐसे लोग हैं जो यह कहते मिल जायेंगे कि शिक्षा तथा जागरूकता की कमी के कारण इन्हें अभी कैशलेस पेमेंट करने नहीं आता लेकिन वह इसे सीखने की कोशिश करेंगे और कर भी रहे हैं. क्योंकि यह उनके लिहाज से एक अच्छा कदम है.

नोटबंदी के साल भर से अधिक होने पर अगर कैशलेस पेमेंट पर नजर डाली जाय तो छोटे कस्बों और गांवों में भी इसका व्यापक प्रसार हुआ है और छोटे दुकान तथा उद्योग वाले भी इसे सहजता से स्वीकार करने की ओर अग्रसर दिख रहे हैं.

लेकिन कैशलेस से परेशान लोगों की कतार देखी जाय तो उसमें कुछ डाक्टर, वकील, स्कूल संचालक, एनजीओ संचालक, मझोले और बड़े उद्योग वाले तथा इसी तरह के संगठित क्षेत्रों की रहनुमाई करने वाले लोग दिखते हैं जो अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के लिये तो कैशलेस पेमेंट का खूब इस्तेमाल करते हैं लेकिन अपने पेशे में उसे स्वीकार करने से अभी भी कतरा रहे हैं.

आखिर पढ़ा लिखा और जागरूक तबके से ताल्लुक रखने वाला एक खास वर्ग इसे स्वीकार करने से क्यों कतरा रहा है? कुछ लोग तो अभी भी सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ कैंपेन चलाये हुये हैं और कैश में पेमेंट की वकालत करते हुये लोगों से किसी खास दिन बैंक से अपनी सारी नकदी निकालने की अपील करते रहते हैं.

आमतौर पर अपने आपको वामपंथ के पैरोकार बताने वाले लोग इस कतार में सबसे अधिक दिखते हैं. बाकी समाज में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपने आर्थिक हित के लालच में इनके पीछे कतार लगाये नजर आते हैं.

बहुत बड़ा अर्थशास्त्री तो नहीं हूं, फिर भी देशभर के सभी खातेदारों द्वारा एक ही दिन में बैंक से कैश उतारने पर आने वाली दिक्कतों को कुछ हद तक समझ सकता हूं. बाकी बैंकिंग और अर्थशास्त्र की समझ रखने वाले मित्र इस पर विस्तार से प्रकाश डाल सकते हैं.

बहरहाल इन विरोध करने वालों और इनके विरोध के तरीकों को देखकर ही आपको इस बात का जवाब मिल जायेगा कि ये लोग ऐसा क्यों चाहते हैं? ऐसे में इन्हें भी कैशलेस करने के लिये सरकार के साथ समाज को भी दबाव बनाना होगा.

जब समाज के अधिसंख्य लोग इस मोड का उपयोग करने लगेंगे तो मजबूरी में उन लोगों को भी इसमें शामिल होना ही पड़ेगा जो अब तक इससे बचने के लिये लाख परेशानियां गिनाकर लोगों को डराने में लगे हैं.

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