पुरुष मन की स्वप्न सुंदरियां

।। पुरुष अपनी स्वप्नसुंदरियों को ही उकेरते हैं, रंगों, पत्थरों और शब्दों में। सामान्य स्त्रियों को वे देख कर भी अनदेखा करते हैं। ।।

एक अमेरिकी शिल्पी ने अपने स्त्री शिल्पों की आलोचना से आहत होकर, 1940 में यह विचार प्रस्तुत किया था. थोड़ी बहुत चर्चा हुई और पुरुष कलाकार फिर अपनी मनस्विनियों को गढ़ने में लग गए. स्त्री कलाकार भी शांत होकर उसी तरह न्यूड चित्र या मूर्तियाँ बनाने में जुट गईं.

दुर्गा- पूजा के अवसर पर बंगाल में भी मिट्टी घास और रंगों से दुर्गा और अन्य देवियों की मूर्तियां बनाई जाती हैं. इन को भी नग्न ही बनाया जाता है, रंग या कपड़े बाद में पहनाए जाते हैं. इन मूर्तियों में चेहरे तो बहुत सुन्दर बनाए जाते हैं, लेकिन स्त्री शरीर बहुत स्थूल बनाए जाते हैं.

देख कर जो तर्क समझ में आता है, कि ये कुम्हार टोली के कलाकार बहुत स्वप्नजीवी नहीं हैं. मूर्तियों के चेहरे बनाने उन्होंने परंपरागत तरीके से सीखे हैं, किन्तु वे स्त्री शरीर वैसे ही बनाते हैं जैसे कि उन्होंने अपने जीवन में देखे हैं. बंगाल में सामान्य महिलाएं स्थूलवक्षा और नितम्बिनी ही होती हैं, तो यहाँ कलाकार उन्हें, शारीरिक गठन भी वही देते हैं.

इस अमेरिकी कलाकार को ज़रूर ग्रीस के कलाकारों से जलन हुई होगी, काश वह भारतीय मूर्तिकला को देख लेती जो कोणार्क और खजुराहो में अपने उत्कर्ष पर है. वहाँ हमारी नायिकाएँ ज़ीरो साइज़ नहीं हैं.

कई बार मुझे भी लगता है कि मुझे भी मूर्तिकला या चित्रकला में हाथ आजमाना चाहिए था. पर भारत में जन्म लेने के कारण, रोजी रोटी की खोज में ही बहुत सारा जीवन गुज़र गया.

फिर भी मैंने खुद से एक काल्पनिक सवाल पूछा – मिस्टर वशिष्ठ, क्या आपकी कला में स्त्री शरीर यथार्थवादी होते हैं?

सोचने के बाद, मैं जवाब देता हूँ, मेरी स्त्री, मेरे मन में ही रहती है, दुनिया में होते हुए भी, जब मैं उसे अपने मन के कैनवास पर उकेरता रहता हूँ, तब मैं उसका मिलान उसके भौतिक शरीर से नहीं करता.

सच कहूँ तो मुझे स्त्रियों के शरीर याद भी नहीं रहते. इसलिए अगर मैं मूर्तिकार होता तो, मेरी स्त्री मूर्तियाँ सुंदरता की अदम्य मिसाल होतीं. उन्हें दुनिया में खोजना आसान नहीं होता. मनस्विनी ही मूर्त होती, जैसा कि मेरी कविताओं में होता है. आप इसे यथार्थ से पलायन कहें, पर मैं ऐसा ही हूँ.

सॉरी, मार्था, हम पुरुष ऐसे ही होते हैं, किसी ख़ूबसूरत स्त्री को हम अपनी आँखों से कम, मन की आँखों से ज़्यादा देखते हैं.

चित्र : मार्था विलियम्स, 1940

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