अध्यक्ष न बन पाने के मलाल से निकले ये वक्तव्य!

कांग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग के संयोजक और पूर्व विधायक सिराज मेंहदी ने सोनिया गांधी को एक पत्र लिखा है जिसमें उन्होंने कपिल सिब्बल को भविष्य में कांग्रेस के लिये खतरनाक साबित होने के संबंध में चेताया है.

वैसे तो इसकी उम्मीद बहुत कम ही है कि कांग्रेस का आलाकमान सिराज के इस पत्र का कोई संज्ञान भी लेगा. लेकिन पत्र में कही गयी बातें कांग्रेस के लिये वाकई बहुत बड़ी सच्चाई दिखाने वाली हैं.

बहरहाल कांग्रेस में ऐसी सच्चाई को दबाने का एक लंबा इतिहास रहा है, लिहाजा सिराज का पत्र उनके लिये रद्दी से अधिक कुछ भी नहीं है.

खैर, कांग्रेस इस दिशा में सोचे या न सोचे, उसकी मर्जी, लेकिन गुजरात चुनावों के ठीक सर पर होने के दौरान कपिल सिब्बल की सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मामले को आगामी लोकसभा चुनावों तक टालने के संबंध में दी गयी दलील और मणिशंकर अय्यर द्वारा प्रधानमंत्री को “नीच” पुकारा जाना, अपने आप में सामान्य घटनाएं नहीं हैं.

सरसरी तौर पर तो इन्हें कांग्रेस के नेताओं की व्यक्तिगत दलील या विचारधारा माना जा सकता है, लेकिन इनके मंतव्य खुद कांग्रेस के लिये बहुत गंभीर हैं.

कपिल सिब्बल की दलील ऐसे समय में सामने आयी जब सुप्रीम कोर्ट राम मंदिर के मुकदमे की प्रतिदिन सुनवाई करने की तैयारी कर रहा था. सभी पक्षकार और कांग्रेस सहित देश की लगभग सभी राजनैतिक पार्टियां खुलकर सुप्रीम कोर्ट में मामले की प्रतिदिन सुनवाई के पक्ष में नजर आ रही थीं.

लेकिन मुवक्किल की मंशा के विपरित बतौर वकील सिब्बल कोर्ट में यह बयान दे आये कि इस सुनवाई को आगामी लोकसभा चुनावों तक टाल दिया जाय. वह भी तब जब गुजरात जैसे राज्य में चुनाव होने को हैं और 88% हिन्दू मतदाताओं को खुश करने के लिये राहुल गांधी रोजाना मंदिरों के घंटे बजा रहे हैं.

स्वाभाविक तौर पर भाजपा को एक बहुत बड़ा मुद्दा मिल गया और इसे ज़ोरशोर से प्रसारित भी किया गया.

ठीक वही हाल मणिशंकर अय्यर का भी है. सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी पर हमले करने का खामियाज़ा कांग्रेस पिछले लोकसभा से लेकर लगातार कई विधानसभा चुनावों में अपनी हार के रुप में भुगत चुकी है.

मौत के सौदागर, चायवाला और खून की दलाली जैसे जुमलों को मोदी ने अपने प्रचार में कैसे भुनाया यह कांग्रेस अच्छी तरह से देख चुकी है. इसीलिये गुजरात चुनावों में कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदली है और शीर्ष नेतृत्व मोदी पर सीधे तौर पर बयान देने में परहेज कर रहा है.

खुद राहुल गांधी ने चुनाव अभियान के शुरुआत में ही अपने सभी नेताओं और प्रवक्ताओं को चेतावनी जारी की थी कि मोदी पर सीधे हमले करने से बचा जाय.

लेकिन जब चुनाव एकदम नजदीक आ गये तो एकाएक मणिशंकर अय्यर द्वारा मोदी को “नीच” बोल दिया गया. मोदी ने लपककर इस शब्द को मुद्दा बना दिया. लिहाजा डैमेज कंट्रोल के लिये कांग्रेस को अय्यर से पीछा छुड़ाना पड़ा.

लेकिन क्या इन दोनों नेताओं के बयान सिर्फ फौरी तौर पर निकले वक्तव्य थे या इनकी सोची समझी रणनीति का हिस्सा. चुनावों से इतर कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति पर जब नजर डाली जाय तो इस प्रश्न के जवाब मिल सकते हैं.

सिब्बल और अय्यर सहित कांग्रेस के कुछ नेता ऐसे भी हैं जो कांग्रेस में अपनी काबलियत की वजह से तो हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि पार्टी में उनकी अहमियत अभी भी कुछ कम ही है.

सीधे तौर पर कहा जाय तो ये दोनों नेता खुद को पार्टी अध्यक्ष के लिये सबसे बेहतर मानते हैं. लेकिन कांग्रेसी संस्कृति के कारण गांधी परिवार ही अध्यक्ष का असल वारिस होता है, लिहाजा इनकी काबिलियत धरी की धरी रह जाती है.

चूंकि इनमें अभी भी वह हिम्मत नहीं है कि खुलकर वह गांधी परिवार के विरोध में आ सकें अथवा स्वयं किसी पद के लिये दावा ठोक सकें. लिहाजा अंदर ही अंदर कुढ़ते रहते हैं.

ताजा बयानों पर गौर किया जाय तो यह दोनों बातें तब सामने आयी हैं जब अध्यक्ष पद के लिये राहुल गांधी ने नामांकन दाखिल कर दिया है और उनकी ताजपोशी तय मानी जाने लगी है.

ये दोनों लोग राहुल को अध्यक्ष के रुप में स्वीकारने में खुद को असहज महसूस करते हैं. लिहाजा उन सभी बंदिशों और चेतावनियों को धता बता कर ऐसे शब्द बोल रहे हैं जो खुद राहुल गांधी को पसंद नहीं और उनका खेल बिगाड़ सकते हैं.

आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि गुजरात हार के साथ राहुल की ताजपोशी कितनी फीकी हो सकती है. चूंकि कपिल सिब्बल और मणिशंकर अय्यर राजनीति के पुराने खिलाड़ी रहे हैं, लिहाजा ये दोनों इस बात का अंदाज़ पहले ही लगा चुके हैं.

इसीलिये इनके द्वारा वह सारे बयान और काम सामने लाये जा रहे हैं जो कांग्रेस की हार में सहायक सिद्ध हो सकते हैं.

कांग्रेस का पार्टी अध्यक्ष तो ये लोग बन नहीं सकते, और राहुल गांधी के विरोध की हिम्मत इनमें है नहीं. लिहाजा हार की उदासी के बीच अध्यक्ष की ताजपोशी से ये अपने दिल की तसल्ली का इंतजाम कर चुके हैं.

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