ब्रह्माण्डीय मिलन है यह

सुनो शोना,
जब मैंने पहली बार टीवी पर देखा था न वो केरल का अथिरापल्ली फ़ॉल्स
तो मैंने सोचा था यह तो मैं तुम्हारे साथ ही देखूंगी

निआग्रा फ़ॉल्स अकेले देखा था, यह नहीं देखूंगी
यूँ तो तुम तब भी मेरे साथ ही थे
तुम बिन कहाँ होती हूँ मैं कभी भी
और एक पल ऐसा आया था जब लगा दुनिया बस यहीं थम जाए
यह साँस हो जाए आख़िरी साँस

कुछ पल के लिए सब मिट गया
सिर्फ धुंध ही धुँध
कानों में शिवोहम शिवोहम की ध्वनि
आँखों में आँसुओं की बाढ़

तुम भी पिघल गए थे मेरे साथ साथ, न तुम थे, न मैं थी
मेरा कुछ ठहरा हुआ है वहाँ अभी भी, तुम्हारा भी
जब भी हम कहीं जाते हैं कुछ अपना वहाँ छोड़ आते हैं कुछ वहाँ का अपने साथ ले आते हैं

यूँ ही ख़ाली होते जाते हैं, यूँ ही भरते जाते हैं
लगता है ब्रह्मांड मेरी सुनने लगा है
तभी तो तुम आज मेरे अंदर ही नहीं मेरे बाहर भी हो, मेरा हाथ कस के पकड़े हुए

ठंडी ठंडी हवा उड़ा रही है हमारी धड़कनों को अपने संग
अथिरापल्ली की फुहारों में भीग रहा है हमारा तन, मन
सारी कायनात सिमट आई है यहाँ
अथाह प्रेम, असीम आनंद
खुदा मेरे साथ भी मेरा हाथ थामे, खुदा मेरे सामने भी पहाड़ों में, घटाओं में
इन दैविय आबशारों में, इनके शोर में, इनके संगीत में

यूँ नहीं लगता शिव अभिषेक हो रहा हो जैसे
जब भी मैं झरनों को इतनी ऊँचाइयों से देखती हूँ चट्टानों पर पड़ते हुए
मुझे हमेशा ऐसा ही लगता है
यही तो जन्नत है, और किसे कहते हैं जन्नत

मेरी आँखों से भी झरने लगते हैं झरने
बाहों में भर लेते हो तुम मुझे, लगता है जैसे ब्रह्मांड ने अपनी आग़ोश में ले लिया हो
अरे, रो क्यूँ रही हो, पगली
अब तो मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम कहते हो

नन्हें कान्हा ने भी कहा था गंगा नाम की गोपी से
न जाने कितने जन्मों से इंतज़ार कर रही थी
‘अब तो मैं आ गया हूँ गंगा, अब क्यूँ रोती हो’
कृष्ण बन के छोटा सा कन्हैया मिलने आए तो ज़ार ज़ार रोने लगी
जन्मों का बिरहा, जन्मों की पीड़ा बह निकली आँसुओं में
रूह आनंद से, ख़ुशी से सरोबार और नयनों में मोतियों की बाढ़

कुछ लोग कहते हैं ऐसे आँसुओं से कर्म धूल जाते हैं, मन पाक साफ़ हो जाता है
जब मेरी आँखों से यूँ बहते हैं नीर, मैं मैं कहाँ होती हूँ तब
कुछ मर रहा होता है, कुछ ज़िंदा हो रहा होता है

शिव के सामने बहें जब आंनद के, मिलन के आंसू, तो शिव हो जाती हूँ
किसी आबशार के सामने तो आबशार हो जाती हूँ
तुम्हारी बाहों में बहें तो तुम हो जाती हूँ
और अब तो, इस पल, यहाँ सब है, आबशार, तुम, शिव
क्या ही सुहाना मिलन है, सब एकाकार है

तुम भी कहाँ रह गए हो तुम
न तुम हो, न मैं हूँ, एक शाहकार के सामने खड़े हम एक छोटे बिंदु
रूपांतरित हो चुके हैं
अनंत हो चुके हैं
ब्रह्माण्डीय मिलन है यह

खुदा कैसे साक्षात नज़र आता है न शोना,
क़ुदरत के ऐसे हसीन मंज़रों में
ज़र्रे को कभी आफ़ताब होते देखा है तुमने, मेरी सोनप्रिया

तुम इतनी देर से क्यूँ आए साजन
मैं तो कब से बाट जो रही थी
जानती थी नियति है आओगे तो ज़रूर एक दिन

तुम तो अपनी सृष्टि ख़ुद रचती हो, देवी, तुम कहते हो और मुस्कुराते हो…

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