वृद्ध वही सुन्दर होता है जिसने वास्तव में पूरा जीवन जीया

तुम अपने बच्चों को पकड़ते हो, सम्हालते हो, बड़ा करते हो. तुम सोचते हो–बड़ा प्रेम है. तुम गलती में हो. मनोवैज्ञानिक कहते हैं, बच्चों के माध्यम से तुम अमर होना चाहते हो. मैं तो मर जाऊंगा, लेकिन मेरा बेटा रहेगा. इसलिये इस देश में तो जब तक बेटा न हो जाए तब तक बड़ी बेचैनी होती है–जाओ, पूजा करो, पाठ करो, हनुमान-चालीसा पढ़ो, ज्योतिषियों से मिलो, भृगुसंहिता दिखवाओ, कुछ करो!… हवन-यज्ञ, जादू-टोना! मगर बेटा तो होना ही चाहिए!

बिना बेटा के मर गए तो व्यर्थ मर गए. क्यों? क्योंकि बेटे के आधार से एक झूठी अमरता मिल जाती है : मैं तो न रहूंगा, लेकिन मेरा बीज रहेगा. यह देह तो चली जाएगी, मगर मेरा कोई अंश रहेगा. मेरा कोई नाम-लेवा रहेगा. कोई तो होगा जो हर साल श्राद्ध करवा देगा. कोई तो होगा जिसके कारण मेरा कोई चिह्न इस जगत में छूट जाएगा.

स्मरण रखो भय यानी मृत्यु का भय, फिर बहाने कुछ भी हों. तुम्हारे मन में इसने वृद्धावस्था का बहाना ले लिया. वृद्धावस्था में क्या भय की बात हो सकती है? वृद्धावस्था का तो अपना सौंदर्य है. वृद्धावस्था तो एक शिखर है. जीवन जब पक जाता, जीवन के अनुभव जब पक जाते, जीवन की वासनाओं के उद्दाम वेग जा चुके, जीवन की आपाधापी समाप्त हो गई, जीवन की महत्वाकांक्षाएं विदा हो गईं, वासना – तृष्णा का ज्वर चला गया– वृद्धावस्था तो एक परम शांत दशा है! वृद्धावस्था तो बड़ी सुंदर है.

रवींद्रनाथ ने कहा है : वृद्धावस्था तो ऐसे है जैसे हिमालय के उत्तुंग शिखर, जिन पर कुंवारी बर्फ सदियों-सदियों से छायी है. ऐसे ही जब किसी बूढ़े के सिर पर सफेद बाल होते हैं… हिमाच्छादित शिखर!

वृद्धावस्था का सौंदर्य तुमने गौर से देखा? हां, मैं जानता हूं कि बहुत कम वृद्ध सुंदर हो पाते हैं. उसका कारण यह नहीं है कि वृद्धावस्था में कोई खराबी है. उसका कारण यही है कि जीवन-भर गलत जीये, जीवन-भर व्यर्थ जीये. तो वृद्धावस्था व्यर्थ हो जाती है. अगर जीवन को थोड़ा सार्थक ढंग से जीये होते, थोड़ा काव्यपूर्ण, थोड़ा रसपूर्ण, थोड़ा आनंदपूर्ण, थोड़ा प्रभु का स्मरण किया होता, थोड़ा ध्यान साधा होता, थोड़ा काम-ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन किया होता–तो वृद्धावस्था बड़ी सुंदर अवस्था है.

वृद्धावस्था तो निचोड़ है तुम्हारे जीवन का, पराकाष्ठा है. तुम्हारी पूरी कथा है.

वृद्ध के चेहरे पर पड़ी हुई झुर्रियों में वेद छिपे हैं, अगर कोई ठीक से जीया हो तो. गलत जीया हो तो निश्चित ही उन झुर्रियों में कुछ भी नहीं है–सिर्फ जीवन का विषाद है, सिर्फ जीवन की हार है. उन झुर्रियों में फिर विजय की कोई चमक नहीं है. लेकिन जब भी कोई ढंग से जीता है, सम्यकरूपेण जीता है तो वृद्धावस्था प्रमाण होती है. और जिसका वृद्धावस्था का काल सुंदर होता है उसे मृत्यु आती ही नहीं. दूसरों को दिखाई पड़ती है उसकी मृत्यु आयी है, उसके लिये तो अमृत का ही द्वार खुलता है.

सब सुंदर हो सकता है. बचपन सुंदर हो सकता है; वह नहीं हो पाता– क्योंकि शिक्षक हैं, मां-बाप हैं, समाज है, वे बचपन को कुरूप करवा देते हैं. पंगु कर देते हैं.

अभी परसों ही एक युवती ने मुझे कहा कि मेरे बेटे को कुछ कहिये–वह बेटे को साथ लेकर आई थी. बेटा प्यारा है! मैंने पूछा : इसकी क्या तकलीफ है? उसने कहा कि यह बहुत ज्यादा शोरगुल, नाचकूद, भागदौड़ मचाये रखता है. इसे कुछ समझाइये.

मैंने कहा कि तू गलत आदमी के पास ले आयी. यही होना चाहिये! यही क्षण हैं नाचने-कूदने के. अगर यह बहुत उछल-कूद करता है तो इसको नृत्य सिखाओ. आखिर सक्रिय ध्यान किसके लिये है? कुंडलिनी सिखाओ. बजाये नाचना-कूदना बंद करवाने के इसके नाचने-कूदने को कला दो, कुशलता दो.

फर्क समझ रहे हो? इसको आज्ञा दो कि बैठो शांत, एक कोने में. यह नहीं बैठ सकेगा. और अगर बैठ गया तो इसकी ऊर्जा मर जाएगी. इसकी ऊर्जा बैठ जाएगी, फिर जिंदगी भर नहीं उठेगी. ना, इसकी ऊर्जा को दिशा दो, अवरुद्ध मत करो. अगर यह उछलता-कूदता है तो इसके उछलने-कूदने को नृत्य बनाओ. फिर नृत्य सुंदर हो गया.

अगर यह शोरगुल मचाता है तो शास्त्रीय संगीत किसके लिये है? तो इसको आलाप भरवाओ, इसकी आवाज को शास्त्रीय संगीत में रूपांतरित करो. अगर यह शांत नहीं बैठ सकता तो वृक्षों पर चढ़ना सिखाओ, पहाड़ों पर चढ़ाओ, नदियों में तैराओ, समुद्रों में उतारो. यह मौका चूकने का नहीं है. इसको बचपन को इसकी पूरी गरिमा में जीने दो, क्योंकि इसी गरिमा के बाद इसका यौवन आयेगा. और तब इसका यौवन भी प्रगाढ़ होगा, गहन होगा.

जिसका बचपन रूखा-सूखा हो गया, उसका यौवन भी दीन-हीन हो जाता है. जिसका यौवन दीन-हीन हो गया उसका बुढ़ापा रुग्ण हो जाता है. जब यह जवान हो जाए तो इसे मत सिखाना व्यर्थ की बातें. इसको सिखाना जीवन का रंग, जीवन का रस. जब यह युवा हो जाये तो इसे कहना कि सारे रंग, पूरा इंद्रधनुष तेरा है. और, सारे स्वर तेरे हैं, सारा सरगम तेरा है. नाच, जी! भरपूर जी! कुछ छोड़ मत देना अधूरा. हर क्षण को पूरा का पूरा पी जा, ताकि जवानी जाते-जाते जवानी की दौड़ और जवानी की महत्वाकांक्षा और जवानी की तृष्णा सब अनुभव से गिर जाये.

इसको जवानी में संतोष मत सिखाना. इसे जवानी में संघर्ष सिखाना. इसे जवानी में कहना: कर ले जितनी विजय की यात्राएं करनी हों, क्योंकि फिर बुढ़ापा आता है. फिर बुढ़ापे में बैठना मौन. फिर बुढ़ापे में होना शांत. फिर वृद्धावस्था में प्रभु-स्मरण, सुरति.

ऐसे अगर क्रम से जीवन चले तो वृद्धावस्था अपूर्व है, अद्वितीय है. और, हमने ऐसे वृद्ध जाने थे, इस देश में. इसीलिये तो हमने वृद्धों को इतना सम्मान दिया. वृद्धावस्था सम्मानित हो गई थी इस देश में, क्योंकि हमने बड़े प्यारे वृद्ध लोग जाने थे. वे केवल उम्र से बूढ़े नहीं थे, वे अनुभव से परिपक्व थे. इस देश में वृद्धों को ही अधिकार था कि वे शिक्षक हों, गुरु हों क्योंकि उन्होंने जीवन जीया है, सब उतार चढ़ाव देखे, अंधेरी रातें देखीं, अमावस्याएं देखीं, पूर्णिमाएं देखीं. सुख देखे, दुख देखे! कांटे चुने, फूल चुने. उन्होंने सब जाना है. वे सब तरह से पक गये हैं.

उन्हीं के पास हम बच्चों को भेजते थे, क्योंकि उनके जीवन-भर की दौलत; काश, बच्चों को मिल जाये तो बच्चे अभी से समृद्ध होने लगें. जो ठीक-ठीक वृद्ध हुआ है–और ठीक-ठीक वही वृद्ध होता है जो ठीक-ठीक पूरा जीवन जीया है….

ओशो
सहज योग

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY