मसीही धर्म शिक्षा भाग – 8 : ‘बाईबल’ को जानिये

चार canonical Gospels में सबसे पहली है “गॉस्पेल अकॉर्डिंग टू मैथ्यू”. इसके बारे में बताया जाता है कि ये ईसा मसीह के एक शिष्य मैथ्यू की लिखी है पर इस गॉस्पेल के अंदर जो भाषा है वो स्पष्ट करती है कि ये किसी भी रूप में मैथ्यू की रचना नहीं हो सकती. इस गॉस्पेल के अंदर ईसा और मैथ्यू की पहली मुलाक़ात का जो वर्णन आया है वो इस तरह है –

“वहां से आगे बढ़कर यीशु ने मत्ती नाम एक मनुष्य को महसूल की चौकी पर बैठे देखा, और उस से कहा, मेरे पीछे हो ले। वह उठकर उसके पीछे हो लिया.” (मैथ्यू : 9:9)

[मसीही धर्म शिक्षा भाग – 1 : ‘बाईबल’ को जानिये]

इन पंक्तियों से ही स्पष्ट है कि इसे लिखने वाला ईसा और मैथ्यू से इतर और कोई ही इंसान है जो ईसा और मैथ्यू को कहीं से देख रहा है. इस ओर सबसे पहले जिस इंसान ने खुलकर लिखा था उनका नाम था जे बी फिलिप्स. उन्होंने एक लेख में मैथ्यू के इस गॉस्पेल के बारे में लिखा था –

“Early Tradition Ascribed This Gospel To The Apostle Matthew, But Scholars Nowadays Almost Reject This View”.

[मसीही धर्म शिक्षा भाग – 2 : ‘बाईबल’ को जानिये]

यानि सुसमाचार लिखने वाले कौन है ये आज तक अज्ञात हैं, ये गॉस्पेल ईसा के जाने के चालीस साल लिखे जाने शुरू हुये और उसके बाद करीब अगले पचास सालों तक लिखे जाते रहे.

जिन सामाग्रियों का उपयोग कर इन्हें लिखा गया उसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है और तो और सबसे रोचक ये है कि ये चारों ही गॉस्पेल आपस में एक-दूसरे की बातों को काटते हैं यानि इनमें विरोधाभासी बातें भरी पड़ी है.

[मसीही धर्म शिक्षा भाग-3: ‘बाईबल’ को जानिये]

इन सबका अर्थ ये है कि मसीह ईसा की शिक्षायें हम तक ठीक उसी रूप में नहीं पहुँची जो मसीह ने सिखाया था.

इन सबका अर्थ ये भी है कि ईसा की मूल शिक्षा को बदलकर उसे अपने फ़ायदे के हिसाब से भुनाया गया और इसका एक अर्थ ये भी है कि बाईबिल ‘ईश्वरीय प्रेरणा’ से नहीं रची गई जैसा दावा वेटिकन करता रहा है.

[मसीही धर्म शिक्षा भाग – 4 : ‘बाईबल’ को जानिये]

ऐसा मैं नहीं कह रहा बल्कि ऐसा कहने वाले कई ईसाई विद्वानों में एक रेव. ई ग्रिफिथ जोन्स भी थे जिन्होने ‘The bible – Its Meaning & Aim’. अपने एक लेख में ‘गॉस्पेल ऑफ़ मैथ्यू’ के बारे में लिखा था –

“Secondly, the Bible as we have it is a much edited body of literature and the various editors have treated their earlier sources with considerable freedom: nor have they always been very skilful in their treatment.”

[मसीही धर्म शिक्षा भाग – 5 : ‘बाईबल’ को जानिये]

फिर उन्होंनें Gospel of Luke के बारे में लिखा –

“On his own admission luke has carefully compared and edited existing material, but it would seem that he had access to a good deal of additional material, and we can reasonably guess at some of the sources from which he drew.”

[मसीही धर्म शिक्षा भाग – 6 : ‘बाईबल’ को जानिये]

रेव. ई ग्रिफिथ जोन्स की बातों की पुष्टि Gospel of Luke की शुरूआती वचनों से ही हो जाती है जिसमें वो लिखते हैं –

(1) इसलिये कि बहुतों ने उन बातों को जो हमारे बीच में होती हैं इतिहास लिखने में हाथ लगाया है

(2) जैसा कि उन्होंने जो पहिले ही से इन बातों के देखने वाले और वचन के सेवक थे हम तक पहुंचाया

(3) इसलिये हे श्रीमान थियुफिलुस मुझे भी यह उचित मालूम हुआ कि उन सब बातों का सम्पूर्ण हाल आरम्भ से ठीक ठीक जांच करके उन्हें तेरे लिये क्रमानुसार लिखूं.

इसका स्पष्ट अर्थ है कि Luke ने कई लोगों की लिखी सामग्रियों को अपने हिसाब से कम्पाइल किया.

[मसीही धर्म शिक्षा भाग – 7 : ‘बाईबल’ को जानिये]

जॉन के सुसमाचार के बारे में मैंने कल लिखा ही था. इसी तरह का लोचा ‘मार्क के सुसमाचार’ के साथ भी है.

कुछ एवेंजलिस्ट हिन्दुओं से ये सवाल पूछ्ते हैं कि आपकी किताबों में से ‘हिन्दू’ शब्द लिखा दिखाओ तो ऐसा आप भी उससे पूछ सकतें हैं क्योंकि पूरी ‘बाईबल’ में एक जगह भी न तो ‘बाईबल’ शब्द आया है, न ‘नया-नियम’ शब्द आया है, न ‘पुराना-नियम’ शब्द आया है और तो और ईसाईयत या christian शब्द भी कहीं प्रयुक्त नहीं हुआ है.

जारी…

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