काश्मीरीय शैव-दर्शन : भाग 3

प्रातः स्मरणीय, वंदनीय श्री म. महो. गोपीनाथ जी कविराज की पुस्तक का तीसरा अंश, गतांक से आगे

दो बातें आरम्भ करने से पहले जोड़ना उचित समझ रहा हूँ. प्रथम तो लेख का जो शीर्षक है उसी दृष्टि से सम्पूर्ण व्याख्या है. दूसरा जो आलोचना है, वो वृहद भारत के दार्शनिक भंडार का प्रत्यक्ष किये तत्व का अनुसंधान कर आगे प्रकाशित की है.

आप जैसे जैसे आगे पढ़ते जायेंगे, ये तुरंत ही समझ में आने लगेगा कि कितनी सुंदर और गरिमापूर्ण तरीके से अलग अलग पक्षों को रखकर आलोचना का ऐसा तरीका अपनाया गया है जिससे synchronization हो और बाधा के साथ समाधान भी उपस्थित हो.

ये अद्भुत भारतीय शैली है. मेरा प्रणाम श्री श्री गोपीनाथ जी की सरस्वती लेखनी को. मुझ जैसे कई लाभान्वित होते हैं. जय हो

5. ब्रह्मवाद और ईश्वराद्वयवाद में भेद

आचार्य गौड़पाद और शंकर के द्वारा प्रचारित अद्वैतवाद तथा श्रीमद्भिनवगुप्तादि द्वारा व्याख्याता परमेश्वराद्वयवाद ठीक एक ही प्रकार के नहीं हैं. ब्रह्मवाद माया को सत एवं असत दोनों से विलक्षण तथा अनिर्वचनीय मानता है.

किंतु, शैवाचार्य कहते हैं कि इससे द्वैत भंग नहीं होता. अवश्य ही परमार्थ दृष्टि से माया जब तुच्छ होती है, तब व्यवहार-भूमि को सत्यता तथा विचार-भूमि की अनिर्वचनीयता वस्तुतः ब्रह्म के अद्वैत दर्शन का स्पर्श नहीं करती है.

यह बात ठीक है; किंतु इससे अद्वैत तत्व में जो संकीर्णता आती है, उस संकीर्णता के हेतु का पता ढूंढने पर भी नहीं लगाया जा सकता. इस जीव-जड़ात्मक विश्व-वैचित्र्य का हेतु क्या है? मूल में जब एक ही अद्वय ज्ञान-तत्व है, तब यह द्वैत की स्फुरणा क्यों होती है, तथा किसके निकट होती है? अज्ञान का आश्रय कौन है, दृष्टा कौन है?

[काश्मीरीय शैव-दर्शन : भाग 1]

ईश्वरादि षटपदार्थों को अनादि और परम्परासिद्ध बतलाने का व्यवहार भी अनादि है. शुद्ध ब्रह्म विवर्त्तात्मक अनादि प्रवर्त्तमान व्यवहार का अधिष्ठान वा अधिकरण-मात्र है. उसका कर्त्तृत्व और स्वातंत्र्य कल्पित है, वास्तव में नहीं है. परंतु कल्पना कौन करता है? जीव अथवा ईश्वर… पर ब्रह्म नहीं करते हैं.

स्वरूप-दृष्टि से स्त्रष्ट्रत्वादी सभी धर्म उसी में आरोपित और अध्यस्त होते हैं. परंतु, वस्तुतः ब्रह्म से जीवभाव या ईश्वरभाव किस प्रकार से होता है, ये समझ नहीं आता. बस, यह प्रवाहरूप से अनादि है, यह कहकर चुप हो जाना पड़ता है. अज्ञान की प्रवृत्ति कहां से और क्यों होती है, इसका कोई उत्तर नहीं है.

स्वप्रकाश चिरभास्वर ज्ञान-सूर्य को अकस्मात अज्ञानान्धकार कहाँ से आकर ढक लेता है. ज्ञान यों ही अवशभाव से उसके अधीन होकर जीव बनता है, अथवा अधीश्वर होकर ईश्वर बनता है. किंतु, अज्ञान का प्रथमाविर्भाव ही जब समझ में नहीं आता है, तब जीवत्व अथवा ईश्वरत्व के बीजकाल के मध्य में अन्वेषण करके आविष्कार करने की चेष्टा तो केवल पागलपन है.

ईश्वराद्वयवाद में भी अज्ञान है, माया है, किंतु उसकी प्रवृत्ति आकस्मिक नहीं है. वह आत्मा की स्वातंत्र्यमूलक, अर्थात स्वेच्छा-परिगृहीत रूप है. नट जिस प्रकार जानबूझकर नाना प्रकार के अभिनय करता है, परमेश्वर भी उसी प्रकार अपनी इच्छामात्र से नाना प्रकार की भूमि का ग्रहण करते हैं. वह स्वतंत्र है, अपने रूप को ढकने में भी समर्थ है. पर, जब वह अपने स्वरूप को ढकते हैं, तब भी उनका अनावृत रूप च्युत नहीं होता है.

[काश्मीरीय शैव-दर्शन : भाग 2]

अज्ञान उनकी स्वातंत्र्यशक्ति का विजृम्भण मात्र है. जिस प्रकार सवितृदेव अपने ही द्वारा सृजन किये हुए मेघ से आच्छादित रहते हैं, यह भी उसी प्रकार से होता है. परंतु, सूर्य आच्छादित होकर भी जैसे अनाच्छादित रहते हैं, क्योंकि वैसा न होने से मेघ को प्रकाशित कौन करता?

विश्व-वैचित्र्य भी इसी प्रकार अपने ही स्वरूप का विमर्शमूलक है. क्रीड़ा-परायण महेश्वर की लीला ही इसी प्रकार के अभिनय का कारण है. आत्माराम में स्पृहा ही कैसी?

यही स्वभाववाद है. ब्रह्मवादी स्वभाववाद को नहीं मानते हों, सो बात नहीं है. अज्ञान आत्मा की ही शक्ति है, इस बात को उन्हें भी स्वीकार करना पड़ता है. परंतु, ईश्वरवादी कहते हैं कि यह स्वातंत्र्यमूलक, स्वातंत्र्यात्मक, कर्तृत्वस्वरूप है, और ब्रह्मवादी कहते हैं कि यह शुद्ध साक्षी अथवा अधिष्ठान-चैतन्यात्मक है, यही दोनों में प्रधान भेद है.

अर्थात शांकर वेदान्त में आत्मा विश्वोत्तीर्ण, सच्चिदानन्द, एक, सत्य, निर्मल, निरहंकार, अनादि, अनंत, शांत, सृष्टि-स्थिति-संहार का हेतु, भावाभावविहीन, स्वप्रकाश, नित्यमुक्त है, किंतु उसके कर्त्तृत्व नहीं हैं.

परन्तु आगम-सम्मत अद्वैत मत से विमर्श ही आत्मा का स्वभाव है. ज्ञान और क्रिया उसके लिए एक से हैं. उसकी क्रिया ही ज्ञान है; क्योंकि वह ज्ञाता का धर्म है तथा उसके कर्त्तृ-स्वभाव होने के कारण उसका ज्ञान ही क्रिया है.

इस ज्ञान और क्रिया की उन्मुखता का नाम इच्छा है. इसी कारण वह इच्छामय है अथवा इच्छादि शक्तित्रय से युक्त, स्वातंत्र्यमय है. ऐश्वर्य, विमर्श, पूर्णाहंता प्रभृति इसी स्वातंत्र्य के नामांतर हैं.

आगमसम्मत आत्मा सर्वदा ही पंचकृत्यकारी है. यह उसका असाधारण स्वभाव है. *1

सृष्टि, स्थिति, संहार, अनुग्रह एवं विलय को ही पंचकृत्य के नाम से पुकारते हैं. शांकर मत से ब्रह्म इस प्रकार के स्वभाव वाला नहीं है. इसलिए, ब्रह्मवाद में आत्मा का स्व-स्फुरण वैसा न होने के कारण वह सत्य होते हुए भी असत्कल्प है. महेश्वरानंद कहते हैं –
‘तत्र हि अद्वैतमाग्रहेणोपपाद्यमानमपि द्वैतकक्ष्यामेवाधिरोहति, यदत्र सत्यासत्यव्यवस्थाया हेयोपादेयकल्पनायां तेनैवाकारेण द्वैतमर्यादापर्यवसायित्वमनिवार्यम्.’

त्रिकदर्शन अत्यंत कट्टर अद्वैतवादी है, उस अद्वैतवाद के सामने ब्रह्माद्वैत-सिद्धांत मानो म्लान-सा जान पड़ता है. जान पड़ता है मानो शंकर मत में द्वैताभास वस्तुतः वर्जित नहीं है. संविदुल्लास में लिखा है –

‘द्वैतादन्यदसत्यकल्पमपरैरद्वैतमाख्याते
तद द्वैते वत पर्यवस्यति कृतं वाचाटदुर्विद्यया.
एते ते वयमेवमभ्युदयिनो: कस्यापि कस्याश्चिद-
प्यालस्योज्झितमैकरस्यमुभयोरद्वैतमाचक्ष्महे.’

जान पड़ता है, मानो शाङ्कर वेदान्त द्वैत से भीत और त्रस्त है, इसी कारण उनके मत में अद्वैत द्वैत से विलक्षण है, अतएव यह असत्कल्प है. यह विचार से द्वैत कोटि में आ जाता है.

आगम के मत में अद्वैत शब्द का अर्थ है – दो का नित्य सामरस्य. शंकर ब्रह्म को सत्य और माया को अनिर्वचनीय कहते हैं. इसलिए वाक्य द्वारा जितना ही अद्वैतभाव का उत्कर्ष दिखाने की चेष्टा की गई है, उतना ही पूर्णभाव के प्रकाश में बाधा पड़ी है.

ये माया को सत्य नहीं मान सकते, इसी से उनका अद्वैतभाव व्यावृतिमूलक (exclusive), सन्यासमूलक (based on renunciation and elimination) है, अनुवृत्ति किंवा ग्रहणमूलक (all embracing) नहीं है.

माया ब्रह्मशक्ति, ब्रह्माश्रित, पर ब्रह्म ही सत्य है, परंतु विचारदृष्टि से माया सदसद् विलक्षण है. किंतु, माया को स्वीकार कर उसको ब्रह्ममयी, नित्या और सत्यस्वरूपा मानने से ब्रह्म और माया की एकरसता हो जाती है. यह एकरसता माया को त्याग कर या तुच्छ समझ कर नहीं, बल्कि उसको अपनी ही शक्ति समझने में है.

बादल के द्वारा दृष्टि शक्ति के ढंकी जाने पर हम कहते हैं कि मेघ ने सूर्य को ढक लिया है, किंतु यह मेघ क्या स्वयमेव सूर्य से ही उत्पन्न नहीं है? क्या मेघ सूर्य की ही महिमा नहीं है? सुतरां जो सूर्य है, वही मेघ है; क्योंकि यह उसी की शक्ति है.

मायामेघ भी इसी प्रकार ब्रह्म से आविर्भूत होता है, उसी के आश्रय में आत्मप्रकाश करता है और उसी में विश्राम लाभ करता है. जो माया है वही ब्रह्म है. ब्रह्म स्वयं ही मानो अपने को अपने द्वारा अर्थात अपनी शक्ति-माया के द्वारा ढक लेते हैं, परन्तु ढकने पर भी पूर्णतः ढक नहीं जाता; क्योंकि वह अनावृत रूप है.

अतः कहना पड़ता है कि वही आवरक (ढकने वाला) है और वही अपना उन्मीलक (खोलने वाला) है. उसके सिवा और है ही क्या?

ब्रह्म और माया एक ही वस्तु हैं. ब्रह्म सत्य, माया मिथ्या, ऐसा कहने पर प्रकारान्तर से द्वैताभास आ ही जाता है. जिस अवस्था में माया मिथ्या है; क्योंकि माया को मिथ्या अनुभव करते ही माया की सत्ता को स्वीकार करना अपरिहार्य हो जाता है, और माया को मिथ्या अनुभव करने से ही उस अवस्था में जो ब्रह्मबोध होता है, वह मायाकल्पित वस्तु है. ये बात वेदांती को भी किसी-न-किसी प्रकार स्वीकार करनी ही पड़ती है.

इधर माया को सत्य समझने में ब्रह्म भी सत्य हो जाता है. माया की विचित्रता के अनुसार यह ब्रह्मबोध भी विचित्र ही होगा और वह सभी बोध समानरूप से सत्य होंगे. उस समय जगत के यावत् पदार्थ ब्रह्मरूप में प्रतिभात होंगे. “सर्वे खल्विदं ब्रह्म”, यह उपनिषद वाक्य उस समय सार्थक हो जाएगा.

माया अथवा तत्प्रसूत जगत का त्याग करके नहीं, वरन् उसको साक्षात ब्रह्मशक्ति और उसके विकास-रूप में अनुभव करने से, आलिंगन करने से ही जीवन की सार्थकता संभव है. शक्ति सत्य है, सुतरां जीव और जगत भी सत्य है, मिथ्या नहीं है, इसलिए सभी वस्तुतः शिवमय है.

यह वैचित्र्य एक ही का विलास है, भेद अभेद का ही आत्मप्रकाश है, शक्ति-रूप किरण-राशि शिव-रुप सूर्य का अपना ही स्फुरण-मात्र है, अन्य कुछ भी नहीं है.

भगवान शंकराचार्य के ‘तमःप्रकाशवद्विरुद्धयोः’ पद की यथार्थता स्वीकार करके भी यह बात कही जा सकती है कि प्रकाश से ही घर्षण के द्वारा अंधकार का आविर्भाव होता है और अंधकार ही घर्षण के द्वारा प्रकाश में पर्यवसित होता है. दोनों ही नित्यसंयुक्त हैं, स्वरूप में समरस-भावापन्न हैं. घर्षण से प्राधान्य का विकास होता है. इस प्राधान्य के अनुसार व्यपदेश होता है. आगमशास्त्र का यही सिद्धांत है.

पुरुष से प्रकृति, किंवा प्रकृति से पुरुष एकान्ततः पृथक नहीं हैं, हो भी नहीं सकते. जो ऐसा करते हैं, वह केवल विचार (logical abstraction) के द्वारा तत्वविश्लेषण मात्र करते हैं.

वस्तुतः सांख्य के प्रकृति-पुरुष-विवेक का अर्थ भी पृथककरण नहीं है, इसके प्रमाण सांख्यकारिका और योगभाष्य में स्पष्ट पाए जाते है. इसकी आलोचना किसी दूसरे समय की जा सकती है. स्पंदशास्त्रकार कहते हैं –

‘इति वा यस्य संवित्ति: क्रीड़ात्वेनाखिलं जगत्
स पश्यन् सततं युक्तो जीवनमुक्तो न् संशयः’

इसका तात्पर्य यही है कि जीवन्मुक्त जगत भर को ही आत्मक्रीड़ा, अर्थात आत्मशक्ति के विलास-रूप में देखते हैं, उनकी योगावस्था कभी मग्न नहीं होती. भेद और अभेद, व्युत्थान और निरोध दोनों के अंदर साम्यदर्शन होने पर और कोई आशंका नहीं रह जाती; क्योंकि दोनों एक के ही दो प्रकार हैं. इसी को शिवशक्ति का सामरस्य या चिदानंद की प्राप्ति कहते हैं. यही ईश्वराद्वयवाद की विलक्षणता है.

क्रमशः

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