पथरीली देह पर गढ़ दी ‘अमिट’ रामायण

हमारी सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ है. हमारी संस्कृति इन्हीं किनारों पर फली-फूली है. सनातनियों ने अपनी संस्कृति आने वाली पीढ़ियों को बताने के लिए नदियों का सहारा लिया. नदियों द्वारा पोषित पत्थरों को तराशकर कहीं रक्षक शिव खड़े कर दिए तो कहीं नदी की शक्तिशाली पथरीली देह पर ‘अमिट’ रामायण गढ़ दी.

अब उन्हें कैसे बताए कि इस संस्कृति की अमृत धारा कबसे बह रही है, ये तो इसमें आकंठ तर सनातनी भी नहीं बता सकते. क्या उन सभ्यताओं ने ऑरेगन की झील ही चुनी होगी. क्या उनकी अनूठी शिल्प शैली विश्व में अन्यत्र प्रसारित न हुई होगी. इस सनातन सभ्यता के विश्वभर में इतने प्रमाण फैले हुए हैं कि मिटाते-मिटाते आपकी कई पुश्तें गुज़र जाएगी. हमारे वेदों का बहुत सा भाग तो सम्पूर्ण विश्व में पत्थरों पर लिखा हुआ पड़ा है. संस्कृत, पाली भाषा में लिखा अमिट इतिहास कहीं काई की परत के नीचे सांस ले रहा है तो कहीं रामायण के किसी प्रसंग को अपने अंतस में छुपाए कोई नदी प्रवाहमान है.

ऑरेगन के मिकी बेसिन की झील के तल में बना ‘श्रीयंत्र’ मलबे से ढांक दिया गया. सब चित्र और शोध नष्ट कर दिए गए. सभी के मन में सवाल है क्यों. वे अपने चौड़े सीने पर आर्यों का ठप्पा नहीं लगने देंगे. किसी कीमत पर भी नहीं. नदी/झील के कठोर तल को ज्यामितीय आकार में दोषरहित काट सके, ऐसा कौन हो सकता है. वे जानते हैं कि यदि ये कहानी बाहर आ गई तो दुनिया के घाघ विशेषज्ञों को क्या कहेंगे. ऐसी प्रवीणता से काम करने वाले हमारे पूर्वज झोपड़ियों में रहते थे. और सबसे बड़ी बात वे ईसाइयत के सामने कुछ न सुनेंगे न बर्दाश्त करेंगे.

अब वे कहेंगे कि ये सब अफवाह है. ऐसा कोई कर ही नहीं सकता. बेडरॉक को प्राचीन लोग बिना मशीन कैसे ड्रिल करते थे, वो भी नाप-तौल कर. बकवास है ये. सच है तो साबित करो. आज तीन कहानियां आई हैं जो सिद्ध करेगी कि ऐसी कारीगरी विश्व में और भी स्थानों पर घटित हुई है. उस कारीगरी के जीवंत प्रमाण प्रस्तुत कर रहा हूँ. पहली है कम्बोडिया से और दूसरी है इंडोनेशिया से. एक कहानी भारत के शाल्मला नदी से जुड़ी हुई है. तीनों ही कहानियों में नदियां हैं, वेद हैं, श्रीराम हैं, देवों के देव महादेव हैं.

कम्बोडिया(कंबुज) में अंगकोरवाट का हिन्दू मन्दिर एक विश्व विरासत है. ये संसार का सबसे बड़ा धर्म स्थल है. इस पर तो सबकी निगाह जाती है लेकिन यहाँ से 25 किमी दूर नदी में अचल खड़े आश्चर्य को देखने वाले कम ही हैं. इस नदी को केबल स्पिन कहा जाता है यानि बैल के मुख वाली नदी. इस नदी में एक हज़ार शिवलिंग पाए गए थे. युद्ध के समय घने जंगलों से घिरे होने के कारण ये बच गए लेकिन अंगकोरवाट समेत सम्पूर्ण मंदिर काम्प्लेक्स तबाह कर दिया गया था.

शाल्मला नदी

ये एक हज़ार शिवलिंग और अन्य मूर्तियां ‘बेडरॉक’ पर बनाई गई है. नदी के कठोर तल और चट्टानों पर एक हज़ार शिवलिंगों का निर्माण. ऑरेगन की झील को याद कीजिये, ड्रिलिंग याद कीजिये. इनका निर्माण महाराज सूर्यवर्मन और राजा उदयआदित्य के समय काल (लगभग11-12वीं सदी) का माना जाता है. उस काल में इसे ‘ ‘यशोधरापुर’ कहा जाता था. ये भी संभव है कि ये ‘सहस्रधारा’ सूर्यवर्मन से भी पहले के शैव शासकों ने बनवाई हो. ये खमेर शास्त्रीय शैली या उससे भी पहले की कोई अज्ञात स्थापत्य कला है. स्थानीय कृषक कहते हैं कि इन शिवलिंगों के प्रभाव से पानी मिट्टी को उपजाऊ बनाता है और मान्यता ये है कि ये सहस्रधारा अंगकोरवाट मंदिर की रक्षा के लिए सौ साल से भी ज़्यादा के समय में बनाए गए थे. ( शैली अज्ञात)

केबल स्पिन

इंडोनेशिया गणराज्य की सबसे बड़ी नदी है आइंग नदी. 68.5 किमी लंबी इस नदी में तो सम्पूर्ण रामायण उकेर दी गई है. नदी के कठोर चट्टानों को तराशकर रामायण के पात्र जीवंत कर दिए गए हैं. राम का जन्म, सीता स्वयंवर, वनवास, रावण वध समेत सारे अध्याय प्रतिमाओं के रूप में नदी के किनारों पर कई किमी के क्षेत्र में बने हुए हैं. दुखद ये है कि विश्व के इस आश्चर्य के बारे में न मीडिया रिपोर्ट्स हैं न ही कोई विस्तृत अध्ययन. ख़ास तौर से भारत के किसी भी विशेषज्ञ का कोई शोध अब तक नहीं हुआ है. प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ ये अद्भुत कार्य सञ्जय राजवंश के समय किया गया था. यहाँ भी मामला उलझा हुआ है. इन चमत्कारिक कामगारों के बारे में अधिकृत रूप से कुछ भी पता नहीं चलता. ( शैली अज्ञात)

उत्तर कन्नड़ जिले के सिरसी में शाल्मला नदी में 100 शिव लिंग मिले थे जिन्हे सहस्र लिंग भी कहा जाता है. यहाँ तट के आस पास तथा नदी के बीच में भी अनेको शिव लिंग है. हैरानी मुझे इस बात पर है कि जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग कम्बोडिया जाकर अंगकोरवाट के मंदिर को संवारने में महती भूमिका निभाता है लेकिन शाल्मला नदी में हज़ारों साल से अविचल खड़े इन शिवलिंगों को क्यों नहीं देखता. विश्व की श्रेष्ठ वास्तुकला आपके आंगन में है लेकिन सफाई करने दूसरे देश जाएंगे. आज तक इन शिवलिंगों के बारे में पुरातत्व विभाग के पास कोई जानकारी नहीं है. ( शैली अज्ञात)

– ऐसे कौनसे शक्तिशाली, अचूक औजार थे, जो नदी के कठोर तल को सही अनुपात में काट सकते थे
– इन अज्ञात कलाकारों और इन्हे बनवाने वालों की कोई जानकारी क्यों नहीं मिलती
– नदी में शिवलिंग बनाने के पीछे क्या विज्ञान था
– कम्बोडिया में पानी उन लिंगों के कारण शुद्ध कैसे हो जाता है

मलबे के नीचे दबा दी गई एक अद्भुत प्राचीन शिल्पकृति

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