अलीबाबा और 32 ठग

देश में कुछ चंद नेहरूवियन सेक्यूलरिस्टों का नाम लेकर देखें तो आम तौर पर दिमाग में जो नाम आते हैं उनमें एक विलियम डैलरिंपल का भी होगा. भले ही अंग्रेज हों पर ज्यादा जीवन दिल्ली में गुजारा है.

इतिहासकार हैं और अतीतजीवी भी. उनकी नजर में भव्यता और दिव्यता सिर्फ इस्लामी आर्किटेक्चर और भांति भांति के कबाब में ही है. फिर भी मैं उनकी कलम का कायल हूं.

पर जो पहली किताब पढ़कर उनका प्रशंसक हुआ वह मुगलों के बारे में नहीं थी बल्कि एक यात्रा वृत्तांत था- from the holy mountains : A Journey Among the Christians of the Middle East. इस किताब में उन्होंने बाइजैंटाइन साम्राज्य काल के एक ईसाई संत जॉन मोस्कोस की यात्राओं को दोहराया और ग्रीस के एक पहाड़ से मिस्र तक की यात्रा की.

बाइजैंटाइन बाद में इस्लाम के उदय के बाद आटोमन साम्राज्य के नाम से नाम से जाना गया. यह इस्लामी साम्राज्य दूर दूर तक विस्तारित था पर खास तौर से तुर्की, सीरिया, लेबनान और आधुनिक इजराइल जिसे लेवांत कहते हैं, इसके केंद्र में थे. इस्लाम के उदय से पहले यह क्षेत्र ईसाइयत का केंद्र था.

तो डैलरिंपल ने यात्रा शुरू की. प्रशिक्षण से इतिहासकार हैं इसलिए गली मोहल्ले के भी दो हजार साल के अतीत की जानकारी रखते हैं. कुछ पता नहीं था तो बस वर्तमान का. सो उन्होंने उन इलाकों की सूची और नक्शा बना कर यात्रा शुरू की जो ईसाइयत के गढ़ होते थे. पर यह पूरी यात्रा निराशा की थी.

मध्य पूर्व में ईसाइयत के दौर के जो भी महान शहर थे, अब उनका कोई नामलेवा तक नहीं बचा था. किसी जमाने में मध्य पूर्व में ईसाइयों के तीन बड़े शहर थे. कांस्टेनटिनोपोल (अब इस्तांबूल), अंक्यारा (अब अंकारा) और अलेक्जेंड्रिया (अब सिकंदरिया. मिस्र में सिकंदर ने बसाया था इस शहर को). इन तीनों शहरों में अब ईसाई ढूंढने से भी नहीं मिलते.

ये तो बड़े शहरों की बात थी. डैलरिंपल की सूची में ईसाइयों के विभिन्न उप संप्रदाय और उनके ठिकाने भी थे. उनकी यह यात्रा उनका हाल चाल जानने के लिए ही थी. पर जहां जहां गए, एक ईसाई नहीं मिला. जगह जगह पता किए पर सवाल का जवाब एक था- उनको खोजते यहां क्यों आ गए? अधिकतर तो लंदन में ही रहते हैं. बाकी यूरोप के अन्य शहरों व अमेरिका-आस्ट्रेलिया में हैं.

अब डैलरिंपल आखिरी चरण में मिस्र पहुंचे कॉप्टिक ईसाइयों का हाल लेने. वहां का हाल ऐसा ही है मानों उमर का सुलहनामा अभी तक जारी हो. किसी चर्च के दरवाजे टूट गए हों, छत गिरने वाली हो, या पेंट कराना हो, इन तमाम चीजों के लिए राजधानी काहिरा जाना होगा और वहां अर्जी डालनी होगी. नाक रगड़ लो पर अनुमति कभी नहीं मिलेगी. कॉप्टिक धरोहर इस तरह से जर्जर होकर गिर रही है. रही सही कसर सुव्यवस्थित लव जिहाद ने पूरी कर दी है.

हैरानी यह है कि डैलरिंपल साहेब इससे कतई विचलित नहीं दिखते. बल्कि इस्लामी सहिष्णुता रेत में भी खोज लेते हैं कि किस तरह सीरिया के एक चर्च में निस्संतान दंपति भी बच्चे की मन्नत मांगने पहुंच जाते हैं.

सेक्यूलर कल्पनाएं ब्रह्मांड के पार भी जा सकती हैं और बुद्धि विलास को महान मानवतावादी स्वरूप भी दिया जा सकता है. पर आखिर में कितने भी तर्क दे लें, तथ्य यह है कि ईसाइयत अब विस्थापित धर्म है. लेबनान में चंद समूहों को छोड़ दें तो अपने उद्गम स्थल में अब इसका कोई नामलेवा तक नहीं रहा.

सिर्फ लेवांत की हालत ही ऐसी नहीं है. अपने यहां भी बंटवारे के बाद पाकिस्तान में 18 प्रतिशत हिंदू थे पर अब दो प्रतिशत भी नहीं रहे. तो बाकी कहां गए? बंगालियों का आमार सोनार बांग्लादेश थोड़ा लिबरल माना जाता था. पर वहां भी अगर पलायन की मौजूदा दर जारी रहती है तो बांग्लादेश में 30 साल बाद कोई हिंदू नहीं बचेगा.

2016 नवंबर में बांग्लादेश के जाने माने अर्थशास्त्री और ढाका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डा. अब्दुल बरकत ने अपनी ही किताब की समीक्षा करते हुए वहां के एक अंग्रेजी अखबार में लिखा कि रोजाना 632 अल्पसंख्यक यानी हिंदू देश छोड़कर भाग रहे हैं और यह प्रक्रिया 1949 (1946-47 पता नहीं क्यों?) से जारी है. पलायन की यही रफ्तार रही तो बांग्लादेश में तीन दशक बाद कोई हिंदू नहीं बचेगा.

आखिर में कभी तो सच को समझा जाए और सच को सच कहा जाए. नग्न सत्य यह है कि जहां इस्लाम है वहां कोई सहअस्तित्व संभव नहीं है. सिर्फ इस्लाम रहेगा, बाकी कोई नहीं. आप या तो स्पेन के Reconquesta का रास्ता अपनाएं या खत्म हो जाएं.

डैलरिंपल के जिन 32 अनुयायी ठगों ने सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका डाली है कि अयोध्या मामले में किसी के पक्ष में फैसला नहीं दिया जाए नहीं तो हिंसा होगी, दरअसल स्टाकहोम सिंड्रोम से पीड़ित हैं.

इन पांचसितारा ठगों के लिए जो चीज मायने रखती है वह है उनका कम्फार्ट ज़ोन. पर ठग भूल रहे हैं कि कभी कांस्टेंटिनोपेल (अब इस्तांबूल) का उनका लुटियन ज़ोन फेनार अब एक झुग्गी बस्ती है. घुटने टेक लो या लेट जाओ, धिम्मियों के साथ रियायत की कोई रवायत ही नहीं है वहां.

पर ठगों को यश की लालसा है. इस लालसा की आंच में घी डालने वाले मुल्लों को जब मैं टीवी पर लोकतंत्र और सेकुलरिज्म के लिए दिन रात छाती पीटते देखता हूं तो लगता है कि संसार सचमुच मिथ्या है, धरती तो ठगों और अल तकैय्या वालों के लिए आरक्षित हो चुकी है.

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