श्रीराम मंदिर और सुप्रीम कोर्ट : मामले को सुलझाने नहीं, सुलाने की है तैयारी

हमारे शहर इंदौर में एक रिवाज है. जब भी अदालत में कोई जघन्य प्रकरण जैसे बच्ची के साथ बलात्कार आदि होते हैं तो आरोपी को वकील खोजना मुश्किल हो जाता है. एक तो वकील नहीं मिलता दूसरे पेशी पर वकील सामूहिक कुटाई करते हैं सो अलग ही है.

वकील का पेशा है वकालत करना. चाहे वह किसी भी पक्ष की ओर से हो. लेकिन एक वकील में देश के, समाज के प्रति भी एक जवाबदेही होती है. कपिल सिबल का बचाव ये कहते हुए करना कि ये तो उनका पेशा है, सरासर नंगई का प्रदर्शन है.

दृश्य ये बन रहा है कि देश के एक वर्ग के सामने आप सीना फुलाये घूमेंगे कि देखो राम मंदिर की राह में हमने फिर रोड़ा अटका दिया और दूसरे वर्ग के सामने पेशा और पार्टी वाले बचकाने तथ्य बेशर्मी के साथ पेश करेंगे.

आपको हिन्दू समाज के वोट चाहिए तो क्यों न कपिल सिबल साहब इस मुकदमे से हट जाते. आपसे तो ज्यादा इंसानियत तो हमारे इंदौर के वकीलों में है.

फरवरी 2018 की नई तारीख मिलने से एक पक्ष बहुत प्रसन्न है. उसे ये मुगालता है कि 2019 में उसका ‘नकारात्मक वोट’ भाजपा को सत्ता में आने नहीं देगा और उसके बाद मंदिर का मामला ठंडा पड़ जाएगा. इस ‘प्रसन्नता’ को कांग्रेस वोट में बदलना चाहती है.

सरकार को गरियाने से कुछ नहीं होगा. उसकी मंशा न होती तो मामला यहाँ तक पहुँचता ही नहीं. न इस मामले में कपिल सिबल को इतना महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए. ये तारीख तो सुप्रीम कोर्ट ने तय की है.

माननीय उच्चतम न्यायालय चाहता तो इस पर जल्द ही तारीख दे सकता था. हिन्दुओं की अगरबत्ती-नारियल तक का संज्ञान लेने वाले हमारे शुभचिंतक, श्रीराम मंदिर मामले में चाहते तो आधी रात सुनवाई कर सकते थे. लेकिन फर्क है श्रीराम और याकूब मेमन में. माननीय ने याकूब के लिए अपने दरवाज़े रात तीन बजे खोल दिए थे लेकिन श्रीराम तो बाहर ही खड़े रह जाते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने तब तक केस से जुड़े 19950 पन्नों के दस्तावेज जमा करवाने के आदेश दिए हैं.

इससे पहले सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से पैरवी करते हुए कपिल सिब्बल ने कोर्ट से कहा कि उन्हें सभी कागजात नहीं दिखाए गए हैं. अब वे दस्तावेजों और सबूतों की जांच करना चाहते हैं, उनका अनुवाद करने में समय बर्बाद करना चाहते हैं. मामले को लंबा तूल देने की तैयारी है.

मामले की सुनवाई के लिए वकील कपिल सिब्बल, राजीव धवन और अन्य याचिकाकर्ताओं ने इसके लिए कम से कम 7 न्यायाधीशों की एक बड़ी बेंच की मांग की है.

मामले की सुनवाई कर रहे जजों में एक जज न्यायमूर्ति अब्दुल नज़ीर भी हैं. वे धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हैं. उन्होंने तलाक प्रथा जैसे गैर धार्मिक मुद्दे को भी दखल देने योग्य नहीं माना था. फिर हिन्दुओं का तो घोर धार्मिक मामला है. उनको तो कम से कम रामजी को भीतर आने देना चाहिए.

खैर आपके लिए हर धर्म को लेकर मापदंड अलग-अलग हैं, नहीं तो देश में लाखों बकरों का खून धर्म के नाम पर बहना बंद हो जाता.

अब आगे क्या. न्याय का आदर आपको, हमको, संत समाज को और सरकार को झक मारकर करना है. सरकार चाहे तो भी कुछ नहीं हो सकता. देश ये भी नहीं पूछ सकता कि हिन्दू धर्म के लिए अति संवेदनशील मामले को लेकर आपने अगले वर्ष फरवरी की तारीख क्यों दे दी, रात को ही कोर्ट क्यों नहीं खुलवाए.

वकील मित्रों से करबद्ध निवेदन है कि इस मामले में एक ऑनलाइन याचिका दायर करने की व्यवस्था की जाए. राष्ट्रपति इसमें पहले ही सुप्रीम कोर्ट को धीमी गति के कारण फटकार लगा चुके हैं. उनको सीधी अपील की जाए.

तैयारी इस मामले को सुलझाने नहीं, सुलाने की है. संवैधानिक विवशताएं सरकार को कुछ करने नहीं देगी. न्यायालय आपके साथ नहीं है. अब पार्टी को चेतावनी देने का समय आ गया है. इतनी विवशता अब सही न जाएगी. जिस दिव्य पुरुष ने संसार में कानून का राज लाया, आज कानून ने उसे भी फरियादी बनाकर खड़ा कर दिया है.

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