क्या मोदी के आने के बाद ही उद्योगपति बने अंबानी-अडानी!

जब भी मैं रचनात्मक विनाश के बारे में लिखता हूं तो कोई ना कोई व्यक्ति या तो मेरी वॉल पर या किसी अन्य मित्र जिन्होंने मेरी पोस्ट शेयर की है वहां पर अडानी, अंबानी का रिफरेंस देकर आत्ममुग्ध हो जाते हैं.

आखिर क्या बात है कि अडानी और अंबानी के नाम को लेकर इतना विवाद है, जैसे कि उन्होंने अभी पिछले तीन वर्षो में ही प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत में व्यवसाय शुरू किया है.

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इस लेख को लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य ना तो अंबानी और ना ही अडानी को डिफेंड करना है. आप उनकी आलोचना करने को स्वतंत्र है. लेकिन मैं इस लेख के जरिए यह बतलाना चाहता हूं कि नरेंद्र मोदी के गुजरात में मुख्यमंत्री और बाद में प्रधानमंत्री बनने के बहुत पहले से ही अडानी का साम्राज्य कांग्रेस के शासन में फल-फूल रहा था.

अंबानी के बारे में तो मोटे तौर पर सबको पता है. लेकिन क्या आपको पता है कि गौतम अडानी ने अपना निर्यात का व्यवसाय 1988 में कांग्रेस शासन में शुरू किया था जब केंद्र और गुजरात दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी!

1995 में उन्हें गुजरात में बंदरगाह बनाने की अनुमति मिली. उसी समय उन्होंने खाने का तेल बनाने की फैक्ट्री गुजरात में लगाई. आपको शायद पता ना हो लेकिन फार्च्यून ब्रांड का तेल अडानी का है.

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सन 2006 में उन्होंने इंडोनेशिया में माइनिंग का कार्य शुरु किया और 2010 में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में कोयले की खदानें खरीद ली. देखते-देखते वह भारत में कोयले के सबसे बड़े आयात करने वाली कंपनी हो गई.

2010 में उन्होंने उड़ीसा में कोयले की खदानों का अधिकार प्राप्त कर लिया. याद कीजिए कि उस समय उड़ीसा और दिल्ली में सत्ता पक्ष में कौन सी पार्टियां थी?

सन 2014 में वह भारत में बिजली के सबसे बड़े निजी क्षेत्र के उत्पादक बन गए. इसी तरह सूर्य ऊर्जा के क्षेत्र में भी सबसे बड़े उत्पादकों में से एक हैं. क्या महज इसी बात के लिए प्रधानमंत्री मोदी जी को दोष दे दिया जाना चाहिए.

2014 के चुनाव में उम्मीदवार के रूप में प्रधानमंत्री मोदी जी ने अडानी के निजी जहाजों में यात्रा की थी. लेकिन इस बात को स्पष्ट किया जा चुका है कि ऐसी यात्रा के लिए पार्टी ने अडानी ग्रुप को भुगतान किया था.

यह मत भूलिए कि हर राजनीतिक दल के लोग निजी क्षेत्र से हेलीकॉप्टर और हवाई जहाज लेते हैं और उसका उन्हें भुगतान करना पड़ता है. चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करता है कि उसका भुगतान किया जाए, अन्यथा उनकी उम्मीदवारी रद्द की जा सकती है.

मजे की बात यह है कि तकनीकी में निरंतर सुधार होने के कारण भारत में अब कोई भी नया कोयला या गैस पर आधारित पावर प्लांट नहीं बन रहा है. सूर्य, हवा और पानी से बनने वाली बिजली की दर कोयले से बनने वाली बिजली के बराबर या उससे कम हो गयी है.

अब मैं आता हूं मुख्य विषय पर. सन 2007 में तीन नए उत्पाद विश्व के बाजार में आए. पहला था एप्पल का iPhone या प्रथम स्मार्टफोन; दूसरा था गूगल का Android सिस्टम जिस पर अन्य सभी सेल फोन बने है.; तीसरा था फेसबुक का सेल फोन संस्करण जिसने फेसबुक को हर व्यक्ति के हाथों में ला दिया.

दस वर्षों में ही यह तीनों विश्व की सबसे बड़ी कंपनी हो गई हैं. क्या इसके लिए आप जॉर्ज बुश या ओबामा को ब्लेम करेंगे?

कहने का तात्पर्य है कि किसी नए प्रोडक्ट की परिकल्पना करना और उस व्यवसाय को शुरु करना भी एक प्रतिभा होती है. हर व्यक्ति यह कार्य नहीं कर पाता. अतः जो हमारे बड़े उद्यमी हैं उनका हमें समर्थन करना चाहिए.

हाँ, उन सभी उद्यमियों का विरोध करना चाहिए, आलोचना करनी चाहिए जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते है, उपभोक्ताओं का शोषण करते हैं, या फिर सरकार को घूस देकर के अनुचित लाभ लेते हैं.

किसी भी राष्ट्र को प्रगति के लिए बड़े, मंझले और छोटे उद्यमियों की आवश्यकता है. इन सभी उद्यमियों का देश की नींव सुदृढ़ करने में योगदान है और हमें इन सभी का अनुष्ठान और अभिनन्दन करना चाहिए.

हमें बस सरकार से तीन अपेक्षाएं करनी चाहिए : सभी नवयुवक और नवयुवतियों को बराबरी का अवसर दें; किसी उद्यमी को अनुचित लाभ ना दें; तथा हर व्यक्ति और हर उद्यम के प्रयासों को प्रोत्साहित करें.

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